कल शाम मैं एक मोमोज स्टॉल के पास खड़ा था। तभी एक पति-पत्नी वहां पहुंचे। महिला ने दुकानदार से पूछा, “भैया, एक प्लेट मोमोज कितने की है?”

दुकानदार ने जवाब दिया, “₹120 की, 8 पीस।”

महिला ने फिर पूछा, “और बिना स्टीम किए?”

दुकानदार बोला, “₹90।”

इतना सुनने के बाद दोनों वहां से चले गए। मुझे लगा कि बात खत्म हो गई है, लेकिन करीब 10 मिनट बाद महिला दोबारा लौटी। इस बार उसके हाथ में फ्रोजन मोमोज का एक पैकेट था।

उसने वह पैकेट दुकानदार के सामने रखते हुए कहा, “ये मुझे ₹48 के पड़े हैं। आप ₹30 ले लो और बस इन्हें स्टीम करके सॉस के साथ प्लेट में दे दो।”

दुकानदार कुछ पल तक उसे देखता रहा। फिर बिना कुछ कहे मोमोज स्टीम करके प्लेट तैयार कर दी।

इसके बाद महिला मुस्कुराते हुए अपने पति से बोली, “देखा, ₹120 वाली प्लेट सिर्फ ₹78 में पड़ गई। पैसे बचाने हों तो थोड़ा दिमाग लगाना पड़ता है।”

महिला की बात सुनकर उसका पति कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “शायद यही वजह है कि छोटे दुकानदार कभी बड़े नहीं बन पाते। लोग उनकी मेहनत और खर्च नहीं देखते, सिर्फ उनका मुनाफा गिनते हैं।”

महिला ने जवाब दिया, “तो क्या ग्राहक बेवकूफ बने? जहां सस्ता मिले वहां से खरीदना गलत है क्या?”

पति ने कहा, “गलत नहीं है, लेकिन एक बात अजीब है। मोलभाव और बचत का हिसाब अक्सर उसी व्यक्ति के साथ लगाया जाता है जो सड़क किनारे खड़े होकर अपनी रोजी-रोटी कमाता है।”

इस घटना ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि क्या हम सिर्फ कीमत देखते हैं या फिर उस मेहनत और सेवा की भी कद्र करते हैं जो किसी चीज़ को हमारे सामने परोसने तक पहुंचाती है?

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है?