हिमाचली खबर: भारतीय जनता पार्टी से हाल ही में इस्तीफा देने वाले अन्नामलाई ने नए राजनीतिक आंदोलन वी द लीडर्स का ऐलान किया है. उन्होंने इसी बैनर पर आने वाले चुनावों में भागीदारी की जानकारी भी देश की दी है. उनके इस कदम से तमिलनाडु में एक राजनीतिक भूचाल सा दिखाई दे रहा है. IIM लखनऊ से एमबीए करने वाले IPS अधिकारी के रूप में काम करने के बाद इस्तीफा देकर राजनीति में उतरने वाले अन्नमलाई तमिलनाडु में एक मेहनती राजनेता के रूप में देखे जाते हैं. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि आखिर कोई कैसे बना सकता है पॉलिटिकल पार्टी, कौनकौन सी शर्तें जरूरी, शर्तें नहीं मानी तो क्या होगा? राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की शर्तें क्या हैं?

भारत में नई राजनीतिक पार्टी बनाना कानूनी रूप से संभव है. यह काम पंजीकरण से शुरू होता है. इसके बाद चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर मान्यता मिलती है. पंजीकरण और मान्यता, दो अलगअलग बातें हैं. कई बार लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं.
सबसे पहला कदम उद्देश्य और पार्टी का नाम
सबसे पहले अपना उद्देश्य साफ लिखें. आप किन मुद्दों पर काम करेंगे, यह तय करें. आपके पास एक छोटी, भरोसेमंद टीम होनी चाहिए. टीम में संगठन, कानून, लेखा और मीडिया समझने वाले लोग रखें. शुरुआत में ज्यादा बड़े दावे न करें. छोटे लक्ष्य बनाएं. फिर धीरेधीरे विस्तार करें.
नाम छोटा और याद रहने वाला तय करें. नाम ऐसा हो जो समाज में भ्रम न फैलाए. पहले से मौजूद किसी पार्टी के नाम से बहुत मिलताजुलता नाम न रखें. नाम में भड़काऊ या नफरत फैलाने वाले शब्द न हों. नाम तय करने से पहले एक सूची बनाएं. दोतीन वैकल्पिक नाम भी रखें. इससे आवेदन में सुविधा रहती है.
अन्नमलाई तमिलनाडु में एक मेहनती राजनेता के रूप में देखे जाते हैं. फोटो: PTI
पंजीकरण कहां होता है?
राजनीतिक दल का पंजीकरण भारत निर्वाचन आयोग के पास होता है. पंजीकरण के बाद पार्टी चुनाव लड़ सकती है. पर इससे पार्टी राष्ट्रीय या राज्य पार्टी नहीं बन जाती. यह केवल कानूनी पहचान देता है. इसके बाद आपकी जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं.
पार्टी का संविधान क्यों जरूरी है?
पार्टी का अपना संविधान होना जरूरी है. इसमें पार्टी का लक्ष्य लिखा हो. सदस्यता की शर्तें लिखी हों. आंतरिक चुनाव और पदों का नियम हो. अनुशासन की प्रक्रिया स्पष्ट हो. शिकायत और अपील का तरीका लिखा हो. संविधान जितना साफ होगा, कालांतर में विवाद उतना कम होगा.
पार्टी का प्रतीक चिन्ह कैसे मिलता है?
भारत निर्वाचन आयोग अपने नियमों के आधार पर प्रतीक चिन्ह आवंटित करता है. नई पार्टी को शुरुआत में आरक्षित चिन्ह नहीं मिलता. अक्सर चुनाव के समय उपलब्ध मुक्त चिन्हों में से चुनना पड़ता है. कुछ राज्यों में एक चुनाव के लिए एक जैसा चिन्ह मिलने की व्यवस्था भी हो सकती है. यह पूरी तरह नियमों और उपलब्धता पर निर्भर करता है. इसलिए चिन्ह को लेकर पहले दिन से बहुत बड़े निष्कर्ष न निकालें.
सदस्यता और संगठन की बुनियाद
पार्टी को जमीनी कार्यकर्ता चाहिए. केवल सोशल मीडिया से पार्टी नहीं चलती. सदस्यता अभियान चलाएं. सदस्यों का रिकॉर्ड रखें. नाम, पता और संपर्क सही रखें. सदस्यता फीस लेते हैं तो उसकी रसीद रखें. पारदर्शिता भरोसा बनाती है. बिना भरोसे के वोट नहीं मिलते.
आवेदन के समय कौन से कागजात चाहिए?
आयोग को आवेदन देते समय कई जानकारियां देनी होती हैं. पार्टी का नाम और पता देना होता है. पदाधिकारियों की सूची देनी होती है. पार्टी संविधान की कॉपी लगती है. कार्यालय का पता और संचार का माध्यम देना होता है. कई बार शपथपत्र या घोषणाएँ भी माँगी जा सकती हैं. इसलिए कागज पूरे और सही रखें. गलत जानकारी बाद में मुश्किल बनती है.
बैंक खाता, चंदा और हिसाबकिताब
पार्टी के नाम से अलग बैंक खाता रखें. पार्टी के खर्च और आय का रिकॉर्ड रखें. बड़े लेनदेन बैंक के माध्यम से करना बेहतर रहता है. चंदा किससे आया, कितना आया, यह लिखित रखें. खर्च कहाँ हुआ, यह भी दर्ज करें. हिसाब साफ रहेगा तो विवाद कम होंगे और कानूनी जोखिम भी घटेगा.
राजनीतिक दल का पंजीकरण भारत निर्वाचन आयोग के पास होता है. फोटो: PTI
शर्तें मानना जरूरी क्यों हैं?
नियम इसलिए हैं ताकि चुनाव निष्पक्ष रहें और जनता का भरोसा बना रहे. एक पार्टी अगर नियम तोड़ेगी, तो बाकी दल भी वही करेंगे. फिर चुनाव व्यवस्था कमजोर होगी. इसलिए आयोग नियमों पर ध्यान देता है. पार्टी को भी नियमों को गंभीरता से लेना चाहिए.
शर्तें न मानें तो क्या हो सकता है?
यदि कागजात अधूरे हों तो आवेदन अटक सकता है. यदि जानकारी गलत हो तो आवेदन रद्द हो सकता है. नियमों का उल्लंघन गंभीर हो तो कार्रवाई बढ़ सकती है. कई बार पार्टी को चेतावनी मिलती है. कई बार पंजीकरण पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए काम चलाऊ तरीके से फॉर्म न भरें. किसी भी असुविधा से बचने को शुरू से ही सही प्रक्रिया का पालन करें.
चुनाव लड़ने की तैयारी, टिकट, उम्मीदवार
पार्टी बनते ही चुनाव जीतना जरूरी नहीं है. पहले संगठन बनाएं. स्थानीय मुद्दे उठाएं. उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी रखें. टिकट वितरण में मनमानी से नुकसान होता है. प्रचार में भाषा संयमित रखें. व्यक्तिगत आरोपों से बचें. मुद्दों पर बात करें. इससे पार्टी की साख बनती है.
राज्य पार्टी की मान्यता कैसे मिलती है?
राज्य पार्टी बनने के लिए किसी एक राज्य में अच्छा प्रदर्शन जरूरी होता है. सामान्य रूप से वैध मतों का 6 फीसदी मिले. कम से कम दो सीटें जीतने में कामयाब हों. लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वैध मतों का छह फीसदी मत मिला हो. एक सीट जीत ली हो. सरल शब्दों में बात करें तो आपको एक राज्य में ठोस जनसमर्थन दिखाना पड़ता है. केवल रैली या सोशल मीडिया ट्रेंड पर्याप्त नहीं होते. चुनाव परिणाम ही असली पैमाना है. राज्य विधानसभा की कुल सीटों का तीन फीसदी सीट जीतने पर भी राज्य की मान्यता मिल सकती है.
राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता कैसे मिलती है?
राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए प्रदर्शन चार से अधिक राज्यों में होना चाहिए. लोकसभा या विधान सभा चुनाव में पड़े कुल वैध मतों का छह फीसदी या उससे ज्यादा वोट पाने वाले दल को मान्यता मिल सकती है. आयोग आम तौर पर वोट शेयर और सीटों की शर्तें देखता है. लोकसभा की कुल सीटों का दो फीसदी कम से कम तीन राज्यों से जीतने पर भी राष्ट्रीय मान्यता मिल सकती है. कम से कम चार राज्यों में राज्य स्तरीय मान्यता हो, तब भी राष्ट्रीय दल के रूप में आयोग मान्यता देता है. निष्कर्ष साफ है कि राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए बहुराज्यीय आधार जरूरी है.
राष्ट्रीय पार्टी बनने के फायदे क्या होते हैं?
राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता मिलने पर पार्टी को कुछ विशेष सुविधाएं मिलती हैं. प्रचार और पहचान में मदद मिलती है. चुनाव चिन्ह की स्थिरता से फायदा होता है. पार्टी की स्थिति मीडिया और जनता के बीच स्पष्ट होती है. पर, लाभ के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है. गलत बयान या गलत कदम का असर देश भर में पड़ता है.
अन्नामलाई भी जमीन से जुड़े नेता हैं. फोटो: PTI
अन्नामलाई की पहल चर्चा में क्यों?
अन्नामलाई की ताजी पहल की चर्चा की कई वजह हैं. जमीजमाई पार्टियों को हटाकर पहली बार में चुनाव में शामिल विजय थलपति की पार्टी ने जीत दर्ज की. आज वे सीएम हैं. अन्नामलाई भी जमीन से जुड़े नेता हैं. पढेलिखे हैं. इसलिए उनके इस पहल की चर्चा तेज है. प्रतिस्पर्धा भी बढ़ने वाली है. ऐसे में राजनीतिक स्वाभाविक है. नया विकल्प आते ही वोट बंट सकते हैं. पुराने गठबंधन टूट सकते हैं. नए गठबंधन बन सकते हैं. मीडिया का फोकस बदल सकता है. कार्यकर्ता भी इधरउधर हो सकते हैं. तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह असर और तेज दिखता है. क्योंकि वहाँ क्षेत्रीय पहचान और नेतृत्व का प्रभाव बहुत गहरा है.
सही प्रक्रिया, साफ नीयत, लगातार मेहनत
अपनी राजनीतिक पार्टी बनाना बड़ा कदम है. इसमें कानूनी प्रक्रिया भी है और सामाजिक जिम्मेदारी भी है. शर्तें पूरी करें. कागज सही रखें. हिसाब साफ रखें. फिर चुनाव में धीरेधीरे आगे बढ़ें. राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता एक दिन में नहीं मिलती. यह लगातार प्रदर्शन से मिलती है. यदि लक्ष्य साफ हो और मेहनत लगातार हो, तो नई पार्टी भी बड़ा प्रभाव बना सकती है.



