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सोशल मीडिया पर छाया फॉर्च्यूनर वाला सफाईकर्मीImage Credit source: X/@TeluguScribe

सोशल मीडिया पर इन दिनों कर्नाटक के बंटवाल से आई एक ऐसी खबर छाई हुई है, जो दिल को छू लेने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर देती है. बीसी रोड पर जब एक चमचमाती सफेद रंग की टोयोटा फॉर्च्यूनर आकर रुकी, तो सबको लगा कि कोई बड़ा अफसर या नेता उतरा होगा. लेकिन गाड़ी का दरवाजा खुला, तो हाथ में झाड़ू थामे और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान लिए सेसप्पा बाहर निकले.

एक वक्त ऐसा भी था, जब कफन तक के पैसे नहीं थे

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आज फॉर्च्यूनर में घूमने वाले सेसप्पा की जिंदगी हमेशा ऐसी नहीं थी. उनका अतीत बहुत दर्दनाक और संघर्षों से भरा रहा है. साल 1996 में जब उन्होंने बंटवाल नगर परिषद में नौकरी शुरू की थी, तब उन्हें रोजाना सिर्फ 50 रुपए दिहाड़ी मिलती थी.

महज तीसरी क्लास तक पढ़े सेसप्पा का परिवार इतनी गरीबी में था कि कई बार भूखे पेट सोना पड़ता था. उनके जीवन का सबसे काला दिन तब आया, जब उनके पिता का निधन हो गया. परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे. मजबूरी में उन्हें अपने पिता के पार्थिव शरीर को नेत्रावती नदी के किनारे ले जाकर खुद विसर्जन करना पड़ा था. उस दिन उन्होंने ठान लिया कि हालात चाहे जैसे हों, वे अपने परिवार को इस लाचारी से बाहर निकालकर रहेंगे.

एक पुलिसवाले की सलाह ने बदल दी तकदीर

गरीबी और तनाव की वजह से एक वक्त सेसप्पा को शराब की लत लग गई थी. लेकिन साल 2005 में बंटवाल के तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर के.यू. बेलियप्पा की एक बात ने उनकी जिंदगी पलट दी. उन्होंने तुरंत शराब छोड़ दी और अपनी पूरी ताकत मेहनत करने में झोंक दी.

नगर निगम की ड्यूटी के बाद वे खाली नहीं बैठते थे. उन्होंने खेती की, दूध बेचने का काम किया और पंचायत में पानी सप्लाई का जिम्मा भी उठाया. वे अपनी छोटी-छोटी बचत और लोन के जरिए धीरे-धीरे आगे बढ़े. उन्होंने पहले मारुति 800 और फिर स्कॉर्पियो जैसी गाड़ियां चलाईं और आखिरकार मेहनत के दम पर एक सेकंड हैंड फॉर्च्यूनर खरीद ही ली.

‘काम कोई छोटा नहीं होता’

नगर निगम के अधिकारी भी सेसप्पा की सादगी और मेहनत के कायल हैं. सुबह-सुबह अपनी लग्जरी गाड़ी से आने के बाद भी वे बिना किसी अहंकार के झाड़ू उठाते हैं और पूरी ईमानदारी से अपनी सफाई की ड्यूटी निभाते हैं.