हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में काफी कमी आई है. उसके बाद भी आम लोगों को इस फायदा होने की उम्मीद नहीं है. इंडस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के जल्द ही फ्यूल की रिटेल कीमतें कम करने की संभावना नहीं है. रिफाइनर वेस्ट एशिया में हुए संघर्ष के दौरान हुए भारी नुकसान की भरपाई करना चाहते हैं और साथ ही शांति समझौते के लागू होने पर भी नजर रखे हुए हैं.

एक एनालिस्ट ने नाम न बताने की शर्त एमसी की रिपोर्ट में कहा कि सरकारी तेल कंपनियों के तुरंत कीमतें बदलने की संभावना नहीं है. वे शांति समझौते के नतीजों का इंतज़ार करेंगे और देखेंगे. उन्हें होने वाला नुकसान बहुत जयादा था पहले यह रोजाना 1,000 करोड़ रुपए था, जो बाद में घटकर 500600 करोड़ रुपए रोज़ाना हो गया. चूंकि उनका नुकसान बहुत ज़्यादा है, इसलिए सरकार OMCs को नुकसान की भरपाई के लिए कुछ समय दे सकती है.

मई में कंपनियों को हुआ 1000 करोड़ का नुकसान

मई में, OMCs को पेट्रोल, डीज़ल और LPG की बिक्री पर रोज़ाना कुल 1,000 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा था. बाद में, सरकार द्वारा पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद यह नुकसान घटकर 500600 करोड़ रुपए रोज़ाना रह गया. मार्चमई 2026 के दौरान पेट्रोल, डीजल और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस पर कुल अंडररिकवरी का अनुमान लगभग 1 लाख करोड़ रुपये है.

क्रिसिल इंटेलिजेंस में कच्चे तेल के मामलों के जानकार सेहुल भट्ट ने कहा कि अगर भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहती है, तो मौजूदा स्तर से अंडररिकवरी में कोई खास बढ़ोतरी होने की संभावना नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि शांति समझौते को लागू करने को लेकर अनिश्चितताओं के कारण एनर्जी मार्केट में उतारचढ़ाव बना रह सकता है.

LPG की कीमतों में भी तेजी

इस संघर्ष के कारण इंटरनेशनल LPG की कीमतों में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. क्रिसिल इंटेलिजेंस के अनुसार, भारत में LPG इम्पोर्ट के लिए बेंचमार्क माने जाने वाले सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस में फरवरीजून 2026 के दौरान 46% की बढ़ोतरी हुई. मार्केट ने सप्लाई में रुकावट के जोखिम और ज़्यादा फ्रेट कॉस्ट को कीमतों में शामिल कर लिया था. दिल्ली के मामले में, मई 2026 में घरेलू सिलेंडर पर अंडररिकवरी बढ़कर 651 रुपये हो गई. जहां कमर्शियल LPG की कीमतें मार्केट की स्थितियों के हिसाब से तेज़ी से बदलीं, वहीं घरेलू ग्राहकों पर इसका असर सीमित रहा. खरीद लागत में हुई बढ़ोतरी का एक हिस्सा तेल मार्केटिंग कंपनियों ने खुद उठाया, जिससे मार्चमई 2026 के दौरान LPG पर कुल अंडररिकवरी लगभग 22,000 करोड़ रुपये हो गई. यह जानकारी क्रिसिल के डेटा से मिली है.

सप्लाई में अभी भी कमी

जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया का युद्ध बहुत गंभीर था, जिसने ग्लोबल मार्केट से हर दिन 1011 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई खत्म कर दी थी. विश्लेषक ने कहा कि देश अब आगे की लड़ाई या जियोपॉलिटिकल झटकों से होने वाले जोखिम को कम करने के लिए कच्चे तेल का स्टॉक जमा करेंगे. विश्लेषक ने कहा, “तेल की 6 mbd की कमी रही है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, सदस्य देशों ने अपने स्ट्रैटेजिक रिजर्व से 4 mbd तेल सप्लाई मार्केट में जारी की थी. देश अब बफर स्टॉक बनाने और लड़ाई या किसी जियोपॉलिटिकल तनाव के फिर से पैदा होने की स्थिति से निपटने के लिए अपनी इन्वेंट्री जमा करेंगे और 6 mbd के नुकसान की भरपाई करेंगे.

क्या कीमतों में होगा इजाफा

जानकारों का यह भी कहना है कि कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं क्योंकि ग्लोबल स्तर पर तेल की इन्वेंट्री कम हो रही है. ऐसे हालात में, OMCs द्वारा जल्द ही रिटेल फ्यूल की कीमतें कम करने की संभावना नहीं है. S&P ग्लोबल एनर्जी के अनुसार, 2026 की दूसरी छमाही में इंटरनेशनल कच्चे तेल की कीमतें 8090 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की उम्मीद है, क्योंकि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण सप्लाई में रुकावट के बाद ग्लोबल तेल इन्वेंट्री में गिरावट जारी है. हालांकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के फिर से खुलने से एनर्जी फ्लो में सुधार और मार्केट का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन मार्केट में शामिल लोग अभी भी यह मान रहे हैं कि मार्केट के सामान्य होने और इन्वेंट्री को फिर से भरने में समय लगेगा.

कंपनियों का मार्जिन हुआ कम

ICRA के वाइस प्रेसिडेंट और कॉर्पोरेट रेटिंग्स के कोहेड प्रशांत वशिष्ठ ने भी कहा था कि सप्लाई और कच्चे तेल की कीमतों के युद्ध से पहले के लेवल पर आने में कम से कम दो तिमाही या एक साल तक का समय लगेगा. भारत में रिटेल पेट्रोल और डीजल की कीमतें अप्रैल 2022 की शुरुआत से काफी हद तक स्थिर रही हैं, जिससे मार्केटिंग मार्जिन कम हुआ है और OMC की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ा है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों से पता चला है कि ग्लोबल स्तर पर ऊंची कीमतों के बीच, मई में रिफाइनरों द्वारा आयात किए गए तेल की औसत कीमत 106.23 डॉलर और अप्रैल में 114.48 डॉलर थी.