भारत में पहली बार ट्रायल इन एब्सेंशिया के तहत मुकदमा चलाने का प्रॉसेस शुरू होने वाला है. यह ट्रायल पाकिस्तानी आतंकी सरगनाओं हाफिज सईद और उसके छह साथियों के खिलाफ उनकी गैर मौजूदगी में चलेगा. यह मुकदमा 26/11 मुंबई हमले से जुड़ा है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत यह ट्रायल शुरू होगा. पहले की व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि जब तक आरोपी अदालत के सामने नहीं आता था, तब तक ट्रायल नहीं शुरू हो सकता था. उसके खिलाफ अनेक अन्य कार्रवाई होती थी लेकिन ट्रायल नहीं हो पाता था. नई व्यवस्था में किये गए बदलाव के तहत यह संभव हो पा रहा है.

आइए, इसी बहाने जानते हैं कि क्या है ट्रायल इन एब्सेंशिया? बिना अदालत में पेश हुए कैसे सुनाई जाएगी सजा? पहले क्या प्रावधान थे?सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि भारतीय न्याय प्रणाली में किसी भी आपराधिक मामले की सुनवाई आमतौर पर आरोपी की उपस्थिति में किये जाने की परंपरा रही है. संविधान के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार हर नागरिक और आरोपी को है. लेकिन अब भारतीय कानूनों में हुए बदलाव के बाद यह संभव हो पा रहा है कि आरोपी अदालत में आए या न आए, ट्रायल होगा. उसे सजा भी होगी.

पहले कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती रही हैं जब आरोपी कानून से बचने के लिए देश छोड़कर भाग जाता है, जानबूझकर अदालत में हाजिर नहीं होता या लंबे समय तक फरार रहता है. ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया को गति देने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए ट्रायल इन एब्सेंशिया का नियम लागू किया गया है, जो बेहद मजबूत कदम माना जाना चाहिए.

26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपियों पर कैसे लागू होगा यह नियम?

26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई आतंकी हमले के मुख्य साजिशकर्ता हाफिज सईद, जकीउर रहमान लखवी, साजिद मीर, अबू अलकामा, अबू काहफा और मेजर रहमान पाशा पाकिस्तान में मौजूद हैं. पाकिस्तान इन आरोपियों को भारत को सौंपने में लगातार आनाकानी कर रहा है. भारत के नए आपराधिक कानून यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 356 के तहत ऐसे घोषित अपराधियोंपर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने का विशेष प्रावधान किया गया है.

इस प्रक्रिया के तहत अदालत सबसे पहले आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करेगी. इसके बाद प्रमुख समाचार पत्रों और इंटरनेट के माध्यम से सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित की जाएगी. नोटिस जारी होने के नब्बे दिनों तक यदि आरोपी अदालत में पेश नहीं होते हैं, तो अदालत उन्हें अनुपस्थित घोषित करेगी. इसके बाद उनके बिना ही गवाही, वैज्ञानिक साक्ष्य और दस्तावेजों के आधार पर मुकदमा आगे बढ़ेगा. दोष साबित होने पर सजा भी सुनाई जा सकेगी.

26/11 अटैक की तस्वीर.

आरोपी के कोर्ट में न आने पर कैसे होगा पूरा ट्रायल?

नियम के अनुसार जब कोई आरोपी जानबूझकर अदालत से गैरहाजिर रहता है, तब अदालत एक व्यवस्थित चरणबद्ध प्रक्रिया का पालन करती है. सबसे पहले अदालत आरोपी के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करती है. यदि आरोपी फिर भी नहीं मिलता, तो उसे भगोड़ा अपराधी घोषित किया जाता है. इसके बाद आरोपी को अदालत में पेश होने के लिए नब्बे दिनों की कानूनी समय सीमा दी जाती है. यह सूचना उसके अंतिम ज्ञात पते पर चस्पा की जाती है और स्थानीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित किया जाता है.

यदि नब्बे दिन बीतने के बाद भी आरोपी उपस्थित नहीं होता, तो अदालत ट्रायल इन एब्सेंशिया की प्रक्रिया शुरू कर सकती है. अदालत निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आरोपी की ओर से पैरवी करने हेतु एक सरकारी वकील या न्यायमित्र नियुक्त करती है. यह वकील गवाहों से जिरह करता है और साक्ष्यों का परीक्षण करता है. अभियोजन पक्ष अपने सभी दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और गवाहों के बयान अदालत के सामने प्रस्तुत करता है. अदालत सभी सबूतों का गहन मूल्यांकन करने के बाद अपना अंतिम निर्णय और सजा सुना सकती है. सजा सुनाए जाने के बाद दोषी की भारत में मौजूद संपत्तियों को कुर्क और जब्त करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है.

अनुपस्थिति में सुनवाई की पुरानी और नई कानूनी व्यवस्था

भारत में पुराने कानून यानी दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 299 के तहत फरार आरोपियों के खिलाफ केवल गवाहों के बयान दर्ज करने की अनुमति थी. उस व्यवस्था में अंतिम फैसला या सजा आरोपी के पकड़े जाने तक रुकी रहती थी. एक जुलाई 2024 से लागू हुए नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 356 ने इस कमी को पूरी तरह दूर कर दिया है. नए कानून के अनुसार गंभीर अपराधों और आतंकी गतिविधियों के मामलों में घोषित अपराधियों के खिलाफ पूरा ट्रायल चलाकर अंतिम फैसला और सजा दोनों सुनाई जा सकती है.

भारत में ऐसे मामलों की प्रमुख मिसालें

भारत में अनुपस्थिति में साक्ष्य दर्ज करने और आर्थिक मामलों में कार्रवाई के कई बड़े उदाहरण मौजूद हैं. लेकिन बिना आरोपी या आरोपियों के अदालत में हाजिर हुए 26/11 मुंबई हमले का पहला मामला चलेगा.

  • मुंबई बम धमाके 1993 के मामले में मुख्य साजिशकर्ता दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन भारत छोड़कर फरार हो गया था. उस समय की कानूनी सीमाओं के तहत टाडा अदालत ने धारा 299 के अंतर्गत गवाहों के बयान उनकी अनुपस्थिति में दर्ज किए थे ताकि गवाहों के निधन या मुकरने से केस कमजोर न पड़े.

    विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी.

  • भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम 2018 के तहत विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को अदालत में उपस्थित न होने के बावजूद भगोड़ा घोषित किया गया और उनकी अरबों रुपये की घरेलू संपत्तियों को जब्त किया गया.
  • 26/11 मुंबई हमले की साजिश में शामिल डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर राणा के मामले में भी भारतीय अदालतों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और विदेशी कानूनी संधियों के जरिए अहम साक्ष्य दर्ज किए हैं.

ट्रायल इन एब्सेंशिया का कूटनीतिक और कानूनी महत्व

एडवोकेट दुबे कहते हैं कि अनुपस्थिति में मुकदमा चलाकर सजा सुनाने से भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत कानूनी आधार मिल सकता है. जब किसी अदालत द्वारा किसी व्यक्ति को विधिवत ट्रायल के बाद दोषी करार दिया जाता है, तो इंटरपोल के जरिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी करवाना और आसान हो जाता है. यह प्रक्रिया प्रत्यर्पण संधियों के तहत विदेशी सरकारों पर दबाव बनाने में मददगार हो सकती है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश स्पष्ट रूप से जाता है कि भारत आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई को अधूरा नहीं छोड़ेगा. ट्रायल इन एब्सेंशिया देश की कानून व्यवस्था को सशक्त बनाने और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने की दिशा में एक बेहद प्रभावी कदम है.