भारत में अब तक फैमिली प्लानिंग को लेकर दो बच्चों का नियम और छोटा परिवार रखने की सलाह दी जाती रही है. लेकिन क्या बदलते समय के साथ इस सोच को बदलने की जरूरत है? क्या देश में अब दो बच्चों के बजाय तीन बच्चे होने चाहिए? ये सवाल इसलिए चर्चा में है, क्योंकि 4 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में जन्म दर लगातार कम हो रही है और आबादी का संतुलन बदल रहा है. ऐसे में दो बच्चों की सीमा से जुड़े पुराने नियमों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है.

इस बहस के पीछे सिर्फ बच्चों की संख्या नहीं, बल्कि देश का भविष्य भी जुड़ा है. एक तरफ भारत में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ जन्म दर में गिरावट आ रही है. इसका असर आने वाले समय में काम करने वाले लोगों की संख्या, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं और पेंशन पर पड़ सकता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2036 तक देश में 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या बढ़कर 23 करोड़ होने का अनुमान है.

सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों के नियम पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले से जुड़ा मामला सुनवाई के लिए आया था. उन्हें तीसरा बच्चा होने की वजह से पंचायत चुनाव के पद से अयोग्य कर दिया गया था. इसी मामले में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने दो बच्चों की शर्त पर सवाल उठाए.

दोबारा बेंच के पास भेजा फैसला

कोर्ट ने कहा कि जिस समय दो बच्चों का नियम बनाया गया था, उस समय जनसंख्या बढ़ने की चिंता ज्यादा थी. लेकिन अब देश में जन्म दर काफी कम हो गई है. कोर्ट की तरफ से आगे कहा गया कि ऐसे में दो से ज्यादा बच्चे होने पर लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की आज के समय में प्रासंगिकता पर विचार करना जरूरी है.

कोर्ट ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा मामले में दिए गए फैसले को भी दोबारा देखने के लिए बड़ी बेंच के पास भेजा है. उस फैसले में दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले नियम को सही माना गया था.

भारत में जन्म दर को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े?

भारत में पिछले दो दशकों में बच्चों के जन्म की औसत संख्या में कमी आई है.

  • 2003 में जन्म दर: उस समय भारत में प्रति महिला औसतन करीब 3 बच्चे पैदा हो रहे थे.
  • 2024 में जन्म दर: यह घटकर 1.9 रह गई. यानी औसतन एक महिला के 2 से भी कम बच्चे हो रहे हैं.
  • रिप्लेसमेंट रेट: किसी देश में आबादी का स्तर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जन्म दर जरूरी मानी जाती है.
  • NFHS5 के आंकड़े: 201921 के सर्वे में भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 दर्ज की गई थी.

2036 तक 23 करोड़ हो जाएंगे बुजुर्ग, क्या है चिंता?

भारत में जन्म दर कम होने के साथ बुजुर्गों की संख्या बढ़ना भी बड़ी चिंता बन रहा है. केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 24 मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 2011 में करीब 10 करोड़ थी. अनुमान है कि 2036 तक यह बढ़कर 23 करोड़ हो जाएगी. इसका मतलब है कि आने वाले समय में देश में बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और बच्चों की हिस्सेदारी कम होगी. इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, देखभाल और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है.

आंकड़ों के मुताबिक:

  • 2011 में बुजुर्गों की आबादी कुल जनसंख्या का 8.4% थी.
  • 2036 तक इसके बढ़कर 14.9% होने का अनुमान है.
  • 15 साल से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी 2011 में 30.9% थी.
  • 2036 तक बच्चों की आबादी का अनुपात घटकर 20.1% रह सकता है.

NFHS5 सर्वे में क्या सामने आया?

भारत में परिवार, बच्चों और महिलाओं की सेहत से जुड़े आंकड़े जुटाने के लिए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कराया गया था. ये सर्वे 2019 से 2021 के बीच हुआ, इसमें देश के करीब 6.1 लाख घरों को शामिल किया गया था. सर्वे में 7,24,115 महिलाओं और 1,01,839 पुरुषों से जानकारी ली गई थी.

सर्वे के मुताबिक, भारत में हर महिला बच्चों की औसत संख्या 2.0 दर्ज की गई. वहीं, हर 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1,020 रही. अस्पतालों में बच्चों के जन्म का आंकड़ा बढ़कर 89% हो गया, जबकि 12 से 23 महीने के बच्चों में पूरा टीकाकरण करीब 77% दर्ज किया गया. ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में फैमिली प्लानिंग और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हुआ है. साथ ही, अब परिवारों में पहले के मुकाबले बच्चों की संख्या भी कम हो रही है.

कम जन्म दर का रोजगार पर क्या असर पड़ेगा?

कम जन्म दर का असर सिर्फ आबादी पर नहीं, बल्कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी पड़ सकता है. किसी भी देश के विकास में काम करने वाली आबादी की बड़ी भूमिका होती है. अगर आने वाले सालों में युवाओं की संख्या कम होती है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है, तो काम करने वाले लोगों पर ज्यादा जिम्मेदारी आ सकती है.

फाइनेंशियल ईयर 202425 के आर्थिक सर्वे के मुताबिक, भारत में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की बेरोजगारी दर 201718 के 6% से घटकर 202324 में 3.2% रह गई. वहीं, काम करने या रोजगार तलाशने वाले लोगों की हिस्सेदारी 49.8% से बढ़कर 60.1% हो गई.

आर्थिक सर्वे में ये भी बताया गया कि भारत को 2030 तक हर साल औसतन 78.5 लाख गैरकृषि नौकरियां पैदा करने की जरूरत होगी. ऐसे में आने वाले समय में युवाओं की संख्या, रोजगार और बुजुर्गों की देखभाल तीनों अहम मुद्दे होंगे.