टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टियों के कार्यकाल को लेकर लगातार नए अपडेट आ रहे हैं. ये इश्यू हर रोज बड़ा होता जा रहा है. अब जो बड़ा अपडेट आया है, वो काफी हैरान करने वाला है. मामले से परिचित लोगों ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि टाटा ट्रस्ट्स ने अपने ट्रस्टियों के कार्यकाल को लेकर होने वाले बदलाव को टाल दिया है. ये फैसला कानूनी सलाह के आधार पर लिया गया गया है. कानूनी सलाह के अनुसार महाराष्ट्र के हालिया अध्यादेश में यह साफ तौर पर नहीं कहा गया है कि इसमें अनिवार्य किए गए बदलाव पिछली तारीख से लागू होंगे.

महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स अध्यादेश, 2025 ने ट्रस्टों को कंट्रोल करने वाले कानून में एक नई धारा, 30A जोड़ी है. इसने स्थायी ट्रस्टियों की संख्या को ट्रस्ट की कुल क्षमता के एकचौथाई तक सीमित कर दिया है. इसका सर रतन टाटा ट्रस्ट और टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट पर तत्काल प्रभाव पड़ेगा, जहां कम से कम आधे ट्रस्टियों के पास स्थायी दर्जा है. नया नियम 1 सितंबर, 2025 से लागू हुआ और इसके तहत मौजूदा ट्रस्टों को हर समय इस सीमा को बनाए रखना जरूरी है.
ट्रस्टियों की नियुक्तियों की गहन जांच
टाटा ट्रस्ट्स का यह हालिया रुख एक कानूनी राय पर आधारित है, जो उसने अपने अधीन सभी ट्रस्टों के लिए मांगी थी. यह ऐसे समय में आया है जब इस महीने की शुरुआत में मेहली मिस्त्री द्वारा प्रक्रियागत उल्लंघनों, पिछले प्रस्तावों पर चुनिंदा निर्भरता, बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी, हितों के टकराव और न्यासी जिम्मेदारी में चूक के आरोपों के बाद ट्रस्टियों की नियुक्तियों की गहन जांच की जा रही है. ऊपर बताए गए लोगों ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि टाटा ट्रस्ट्स को अधिकारियों से इस मामले पर कोई पूछताछ नहीं मिली है, और यदि अधिकारी इस मामले पर औपचारिक रूप से उनसे संपर्क करते हैं, तो वे उचित जवाब देंगे. कानूनी विशेषज्ञ इस अध्यादेश के दायरे को लेकर बंटे हुए हैं.
मौजूदा नियुक्तियों पर अध्यादेश लागू होता है या नहीं?
कैप्स्टोन लीगल के मैनेजिंग पार्टनर आशीष के. सिंह ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि अध्यादेश में यह नहीं कहा गया है कि यह केवल भविष्य की नियुक्तियों तक ही सीमित है. उन्होंने कहा कि प्रावधान विशेष रूप से मौजूदा ट्रस्ट डीड और कार्यकाल का रेफ्रेंस देते हैं. उन्होंने रिपोर्ट में कहा कि यह अध्यादेश पिछली नियुक्तियों को भी शामिल करता है.
उन्होंने कहा कि यह एक सामान्य नियम है कि, जब तक विशेष रूप से उल्लेख न किया गया हो, किसी भी अध्यादेश को प्रकृति में भविष्यगामी माना जाता है. हालांकि, अध्यादेश का मूल पाठ मौजूदा ट्रस्ट डीड के संबंध में वर्तमान और भविष्य की नियुक्तियों का विशेष रूप से उल्लेख करता है. टाटा ट्रस्ट्स की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
कार्यकारियों ने कहा कि SRTT और TEDT के बोर्डों द्वारा लिए गए निर्णयों की वैधता पर कानूनी परिणाम हो सकते हैं. टाटा ट्रस्ट्स की ग्रुप की होल्डिंग कंपनी, टाटा संस में 66 फीसदी नियंत्रक हिस्सेदारी है. इसका ज्यादातर हिस्सा SRTT और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास है. मेहली मिस्त्री ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के कामकाज की देखरेख के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति की मांग की थी.
टाटा के ट्रस्ट में कौन हैं ट्रस्टी
SRTT में अभी पांच ट्रस्टी हैं, जिनमें से तीन के पास स्थायी दर्जा है—जिमी टाटा, नोएल टाटा और जहांगीर जहांगीर. जिमी टाटा 1989 से सेवा दे रहे हैं, जबकि बाकी दो 2019 में शामिल हुए. TEDT में भी तीन आजीवन ट्रस्टी हैं—जहांगीर मिस्त्री, मेहली मिस्त्री और नोएल टाटा. वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह का कार्यकाल जून में रिन्युअल के लिए आएगा. वेणु श्रीनिवासन, जिन्हें अक्टूबर 2025 में आजीवन ट्रस्टी नियुक्त किया गया था, को नवंबर 2025 में तीन साल के कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया, क्योंकि ट्रस्ट का कहना था कि संशोधित कानून सितंबर 2025 के बाद पारित किसी भी प्रस्ताव से ऊपर है.
क्या भविष्य की नियुक्तियों पर लागू होगा कानून?
सर्वांक एसोसिएट्स की मैनेजिंग पार्टनर अंकिता सिंह ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि कानूनी व्याख्या का स्थापित सिद्धांत यह है कि कानूनों को भविष्यलक्षी माना जाता है, जब तक कि उन्हें स्पष्ट शब्दों या स्पष्ट संकेत के माध्यम से भूतलक्षी न बनाया गया हो. उन्होंने कहा कि जहां कोई अध्यादेश उन पदों पर कार्यकाल की सीमाएं लगाता है जो पहले आजीवन थे, वहां अदालतें आम तौर पर मौजूदा पदधारियों को अपने आप हटाए जाने से बचने के लिए भविष्यलक्षी प्रयोग का पक्ष लेती हैं. सिंह ने कहा कि यदि अध्यादेश मौजूदा कार्यकालों पर लागू होने को लेकर चुप है, तो इसे आम तौर पर एक भविष्यलक्षी के रूप में देखा जाता है जो नई नियुक्तियों या भविष्य की रिक्तियों पर लागू होती है, न कि उन लोगों को तुरंत हटाने के एक साधन के रूप में जो वर्तमान में पद पर हैं.



