Telangana News: दशहरे के दौरान तेलंगाना के करीमनगर जिले में मटन की कीमतें आसमान छू रही हैं. बढ़ी हुई कीमतों से मांसाहारी लोग काफी निराश हैं, जो त्योहार के दौरान मांस खाना नहीं छोड़ते. खुले बाजार में मटन की कीमत 900 से 1000 रुपये प्रति किलो हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 1100 से 1200 रुपये तक पहुंच गई है. वहीं, बकरी का मांस रिकॉर्ड 1400 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है.

इस स्थिति का मुख्य कारण स्थानीय स्तर पर भेड़ और बकरी के पालन में गिरावट आना है. तेलंगाना की संस्कृति में, दशहरे के दौरान मांसाहारी भोज बहुत खास होते हैं. दशहरा और आयुध पूजा के दौरान बकरियों और मेमनों के मांस की मांग सामान्य दिनों की तुलना में अधिक होती है. वर्तमान में, खुले बाजारों में जीवित पशुओं की कीमतों में लगभग 40 से 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

लोग त्योहार में मटन छूने से भी डर रहे हैं

यहां तक ​​कि एक छोटा मेमना भी, जो पहले किफायती दामों पर उपलब्ध था, अब 12 से 14000 रुपये से कम में नहीं बिक रहा है. इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि मध्यम और गरीब वर्ग के लोग त्योहार के दौरान बकरियों और भेड़ों मटन को छूने से भी डर रहे हैं. एक समय की बात है, करीमनगर जिले के गांवों में किसान और पशुपालक बड़ी संख्या में भेड़बकरियां पालते थे.

पशुओं की संख्या में काफी कमी आई

ग्रामीण क्षेत्रों में चरागाहों की उपलब्धता के कारण पशुपालन लाभदायक था. हालांकि, वर्तमान स्थिति में, मैदानी क्षेत्रों में कमी और खेती के विस्तार के कारण चारे की बढ़ती कमी एक बड़ी समस्या बन गई है. दूसरी ओर, नई पीढ़ी के युवाओं के पशु पालन न कारण पशुओं की संख्या में काफी कमी आई है. स्थानीय स्तर पर पर्याप्त पशुओं की कमी के कारण व्यापारी महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों की ओर रुख करने को मजबूर हैं.

मांस व्यापारियों की है ये शिकायत

वहां खरीद मूल्य थोड़ा कम है, लेकिन दूरदराज के स्थानों से पशुओं को लाने में डीजल और अन्य परिवहन लागत बहुत अधिक है. स्थानीय व्यापारी शिकायत करते हैं, “हम दूसरे राज्यों से ऊंचे दामों पर पशुओं को खरीदकर ला रहे हैं. परिवहन लागत घटाने के बाद हमें मुनाफा नहीं होता.” बकरियों और भेड़ों के कारण मटन की बढ़ी कीमतों के कारण उपभोक्ता अपनी खरीदारी कम कर रहे हैं.

लोगों का कहना है कि जो लोग एक किलो मांस खरीदते थे, उन्हें आधा किलो से ही संतोष करना पड़ रहा है. दशहरे के दौरान भी कीमतें कम होने की उम्मीद नहीं है, इसलिए मांसाहारी लोग चिकन या मछली की ओर रुख कर रहे हैं.