शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एनके कौल ने सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश की. उन्होंने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 2011 के शिवसेना संविधान के बाद कोई भी संविधान कभी चुनाव आयोग को सौंपा गया था. एनके कौल ने कहा कि चुनाव आयोग ने खुद दो आदेशों में कहा है कि उसके पास पार्टी का जो एकमात्र संविधान मौजूद था और वह 2011 का संविधान ही था, जिसे चुनाव आयोग की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया था.

सीनियर एडवोकेट एनके कौल ने आगे कहा, ‘हमने इसे नियमों के मुताबिक बनाया. उस समय लीडरशिप का यही निर्देश था. इसे 2011 में चुनाव आयोग की इच्छा के अनुसार बनाया गया था. समस्या तब शुरू हुई जब आपने संविधान को बदलने, उसे वापस अस्थायी स्तर पर लाने और फिर यह कहने की कोशिश की कि इसे चुनाव आयोग को सौंप दिया गया था. चुनाव आयोग ने कहा कि हमें यह कभी नहीं मिला. उनके द्वारा संलग्न हर पत्र में पार्टी चुनावों की बात कही गई है. जब वो चुनाव आयोग को पत्र लिखते हैं, तो वो कभी भी संविधान को संलग्न नहीं करते हैं. ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह पता चले कि कोई नया संविधान चुनाव आयोग को सौंपा गया था’.

‘लोकतांत्रिक पिरामिड का आधार होती हैं पार्टियां’

एनके कौल ने कहा, ‘सुभाष देसाई का कहना है कि हम उस संविधान को मानेंगे जो EC के पास है. EC ने दो आदेशों में कहा है कि उसके पास मौजूद एकमात्र संविधान 2011 का संविधान है, जिसे EC के निर्देशों के अनुसार तैयार किया गया था. अब मैं अर्जुन सिंह बनाम अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मामले पर आता हूं. मुख्य बात यह है कि राजनीतिक दलों को पार्टी के भीतर लोकतंत्र का पालन करना चाहिए. पार्टियां लोकतांत्रिक पिरामिड का आधार होती हैं और उन्हें आंतरिक रूप से लोकतंत्र का पालन करने में सबसे आगे होना चाहिए, न कि सबसे पीछे’.

उन्होंने कहा कि समयसमय पर चुनाव न कराने और पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बनाए न रखने से राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने के राजनीतिक दल के दावे पर सवाल उठते हैं. सीनियर एडवोकेट एनके कौल ने कहा कि अयोग्यता की अर्जी दाखिल करना और उसका अंतिम नतीजा क्या होगा, ये दो बिल्कुल अलगअलग बातें हैं. उस दिन तक आपको अपने सभी अधिकारों का इस्तेमाल करने का पूरा हक है.

‘चुनाव आयोग की मंशा और नीयत पर शक’

उन्होंने कहा कि दोतीन बिंदुओं पर ऐसी दलीलें दी गई हैं जिनसे चुनाव आयोग की मंशा और नीयत पर शक पैदा होता है. एक बात यह है कि आपने किसी पार्टी के संविधान की जांच करने का एक नया तरीका या नजरिया अपनाया है, जो आपने पहले कभी नहीं किया. मैंने दिखाया है कि चुनाव आयोग ने इसपर काफी पहले से ही गौर करना शुरू कर दिया था.

‘चुनाव चिह्न पर फैसला होना जरूरी’

एनके कौल ने कहा कि दूसरी बात यह तर्क दिया गया कि EC ने अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला होने का इंतजार किए बिना चुनाव चिह्न के मामले पर फैसला लेने में जल्दबाजी की. शिवसेना से जुड़े मुकदमे के दौरान हाईकोर्ट के सिंगल जज, डिवीजन बेंच और फिर इस कोर्ट के सामने बारबार यही कोशिश की गई कि EC को आगे नहीं बढ़ना चाहिए, वह राहत नहीं दी गई. आखिरकार सुभाष देसाई का कहना है कि आप EC को आगे बढ़ने से सिर्फ इसलिए नहीं रोक सकते कि अयोग्यता याचिका लंबित है. कोई संवैधानिक क्रम नहीं है. स्पीकर के फैसले में लंबा समय लग सकता है और EC को चुनाव चिह्न के विवाद पर फैसला करना ही होगा, क्योंकि चुनाव चिह्न एक ऐसा मुद्दा है जिस पर फैसला होना जरूरी है.

कौल ने आगे कहा, ‘तीसरी बात, यह कहने की कोशिश की जा रही है कि यह रेट्रोस्पेक्टिव है. यह मुद्दा अब ‘रेस इंटेग्रा’ नहीं रहा. सुभाष देसाई का कहना है कि यह प्रोस्पेक्टिव है, रेट्रोस्पेक्टिव नहीं. राणा मामले की एक लाइन को संदर्भ से पूरी तरह हटकर और बिल्कुल अलग तथ्यों के आधार पर इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि यह कहा जा सके कि यह रेट्रोस्पेक्टिव है’.

उन्होंने कहा, ‘मैं वह संदर्भ बताऊंगा जिसमें यह बात कही गई थी. यह प्रोस्पेक्टिव है. यह उस दिन से लागू होता है जिस दिन घटना होती है. आज ये बातें स्पष्ट रूप से तय हो चुकी हैं. यह कहना कि इसका संबंध पिछली तारीख से है और इसलिए EC को अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला होने तक इंतजार करना चाहिए था, संविधान पीठ और पहले के फैसलों के बिल्कुल उलट है’.