दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह ने एक ऐसा बयान दिया है जो सुर्खियों में आ गया है. उनका कहना है कि भारतीय सेना को अपने बैंड द्वारा मोहम्मद इकबाल का लिखा गीत ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाना बंद कर देना चाहिए. उन्होंने ये बयान सोमवार को एक एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान दिया. उन्होंने कहा कि भले ही मोहम्मद इकबाल ने यह गीत लिखा था, लेकिन बाद में उनके विचार और रुख देश के विभाजन का समर्थन करने वाले हो गए थे.

दरअसल कुलपति योगेश सिंह ने सोमवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ सदस्य आर. हरि द्वारा लिखित पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ़ वंदे मातरम’ के विमोचन कार्यक्रम में पहुंचे थे. इसी कार्यक्रम में उन्होंने यह बयान दिया. यह कार्यक्रम RSS के वैचारिक प्रकोष्ठ प्रज्ञा प्रवाह की दिल्ली इकाई ने इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के सहयोग से आयोजित किया था.

DU के कुलपति ने उठाए सवाल

कार्यक्रम में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए DU के कुलपति योगेश सिंह ने समाज के एक खास वर्ग के ‘वंदे मातरम’ और इकबाल की रचना ‘सारे जहां से अच्छा’ के प्रति अलगअलग रवैये पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि कुछ लोग इक़बाल की देशभक्तिपूर्ण रचना को तो गर्व से गाते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ गाने से इनकार कर देते हैं.

‘सेना को ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाना बंद करना चाहिए’

कुलपति ने आरोप लगाया कि इकबाल ने देश के बंटवारे से जुड़े विचारों का समर्थन किया था. उन्होंने भारतीय सेना के बैंड में ‘सारे जहां से अच्छा’ के लगातार इस्तेमाल पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा ‘सेना को अपने बैंड में इस गीत को बजाना बंद कर देना चाहिए’.

पूर्व राज्यपाल ने जताई असहमति

वहीं इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कुलपति योगेश सिंह के बयान पर असहमति जताई. उन्होंने तर्क दिया कि भले ही समय के साथ इकबाल के विचार बदल गए हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब वो भारत से गहरा प्रेम करते थे. यह रेखांकित करते हुए कि किसी व्यक्ति के विचार समय के साथ बदल सकते हैं, पूर्व राज्यपाल ने कवि की राजनीतिक और बौद्धिक यात्रा को एक अलग नजरिए से पेश किया.

‘वंदे मातरम हमारी सभ्यतागत पहचान’

पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा ‘वंदे मातरम केवल एक देशभक्ति गीत नहीं है, यह हमारी सभ्यतागत पहचान, स्वतंत्रता के लिए हमारे संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के लिए हमारी सामूहिक आकांक्षा का एक स्थायी प्रतीक है’.

‘कांग्रेस वंदे मातरम का श्रेय नहीं ले सकती’

इस बीच, ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में ऐतिहासिक रूप से वंदे मातरम को सीमित करके केवल दो पदों तक ही सीमित कर दिया गया था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस वंदे मातरम का श्रेय नहीं ले सकती. उन्होंने 2026 को इस गीत के लिए एक बार फिर से प्रमुखता हासिल करने वाले समय के रूप में बताया और कहा कि यह सार्वजनिक चर्चाओं में एक मजबूत वापसी कर रहा है.

मोहम्मद इकबाल द्वारा 1904 में रचित ‘तरानाएहिंदी’ को भारत में एक पारंपरिक और लोकप्रिय देशभक्ति गीत के रूप में जाना जाता है, जिसे भारतीय सशस्त्र बलों के बैंड द्वारा भी मार्चिंग धुन के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है.