गाड़ी चलाते समय गूगल मैप की हिंदी आवाज सुनाई देती है आगे से दाएं मुड़िए. लेकिन, दिल्ली की कुछ सड़कों के नाम बोलते हुए डिजिटल असिस्टेंट की जुबान भी लड़खड़ा सकती है. जैसेआर्कबिशप मकारियोस मार्ग, अलेक्जेंडर दुबचेक मार्ग या जोसिप ब्रोज टीटो मार्ग.

क्या आप जानते हैं ये नाम किसी भारतीय शहर या शख्सियत के नहीं, बल्कि दुनिया के अलगअलग देशों के नेताओं और ऐतिहासिक हस्तियों के हैं. आइए, जानें कि दिल्ली की सड़कों के इन विदेशी नामों की के पीछे कहानी क्या है? क्या ये सिर्फ नाम हैं या भारत के पुराने इंटरनेशनल रिलेशनशिप की निशानी भी हैं?
दोस्ती और कूटनीति के नाम पर सड़कें
दिल्ली के इतिहासकार विवेक शुक्ला बताते हैं कि मित्र देश एकदूसरे के बड़े नेताओं, लेखकों, कवियों और ऐतिहासिक हस्तियों के नाम पर सड़कों और सार्वजनिक जगहों का नाम रखते हैं. महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर दुनिया के कई देशों में सड़कें मिलती हैं. दिल्ली में विदेशी नामों वाली सड़कें भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं.
आर्कबिशप मकारियोस मार्ग लोधी रोड के पास ये सड़क साइप्रस के पहले राष्ट्रपति मकारियोस तृतीय के नाम पर है. वह साइप्रस के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता थे. भारत और साइप्रस के बीच उनके दौर में मजबूत रिश्ते बने. दिल्ली में 1983 के गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन के आसपास कई विदेशी नेताओं के नाम पर सड़कों का नामकरण हुआ. मकारियोस मार्ग पहले गोल्फ लिंक्स रोड कहलाता था.
गामल अब्देल नासिर मार्ग ये मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर है. नासिर और पंडित जवाहर लाल नेहरू गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे. कोल्ड वॉर के दौर में इस आंदोलन ने उन देशों को एक साझा मंच दिया, जो अमेरिका या सोवियत संघ के नेतृत्व गुटों में शामिल नहीं होना चाहते थे. इसी दौर की अंतरराष्ट्रीय दोस्ती दिल्ली की सड़कों पर दर्ज हुई.
जोसिप ब्रोज टीटो मार्ग यूगोस्लाविया के नेता टीटो ने नेहरू और मिस्र के नासिर के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आगे बढ़ाया.
हो ची मिन्ह मार्ग ये वियतनाम के फ्रीडम स्ट्रगल के अहम नेता के नाम पर है. ये सड़कें भारत की उन इंटरनेशनल दोस्तियों की पहचान हैं, जो आजादी और अपनी मर्जी से फॉरेन पॉलिसी तय करने की सोच पर बनी थीं.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क मार्ग चाणक्यपुरी के वीआईपी इलाके की ये सड़क तुर्की के संस्थापक राष्ट्रपति मुस्तफा कमाल पाशा के नाम पर है.जिन्हें वहां के लोग प्यार से ‘अतातुर्क’ यानी ‘तुर्कों का पिता’ कहते हैं. उन्होंने तुर्की को पुराने धार्मिक ढर्रे से निकालकर मॉडर्न और सेक्युलर देश बनाया था. भारत इस प्रोग्रेसिव सोच का सम्मान करता है इस ग्लोबल मैसेज के लिए इस सड़क का नाम इन तुर्की नेता के नाम पर रख दिया गया.
अलेक्जेंडर दुबचेक मार्ग चेकोस्लोवाकिया के नेता के नाम पर है. 1968 में दुबचेक ने राजनीतिक उदारीकरण की कोशिश की, जिसे प्राग स्प्रिंग के नाम से जाना जाता है. सोवियत नेतृत्व वाली सेना के दखल ने ये आंदोलन दबा दिया. दिल्ली की सड़कें सिर्फ मित्र देशों के नेताओं को ही नहीं,राजनीतिक बदलाव और स्वतंत्रता की कोशिशों को भी याद करती हैं.
नेल्सन मंडेला मार्ग साउथ दिल्ली का ये मार्ग साउथ अप्रीका के रंगभेद विरोधी नेता और पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर है.
ओलोफ पाल्मे मार्ग ये स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री की याद दिलाता है, जिनकी 1986 में हत्या कर दी गई थी. ये नाम भारत के कूटनीतिक दायरे को एशिया से आगे अफ्रीका और यूरोप तक ले जाते हैं.
अंग्रेजों के नाम हटे, नए नाम आए
दिल्ली की सड़कों के नामकरण की कहानी विदेशी नेताओं तक सीमित नहीं है. ब्रिटिश शासन में कई सड़कों और चौकों के नाम अंग्रेज अधिकारियों के नाम पर रखे गए थे. विवेक शुक्ला बताते हैं कि गोल मार्केट के आसपास टेलर स्क्वायर, अलेक्जेंडर स्क्वायर और लेक स्क्वायर जैसे नाम प्रचलित थे. अंग्रेजों के जाने के बाद नाम बदलने का सिलसिला शुरू हुआ. विवेक शुक्ला दिल्ली का पहला प्यार कनॉट प्लेस और विभाजन किताबों के लेखक भी है.
अल्बुकर्क रोड का नाम बदलकर 30 जनवरी मार्ग किया गया. इसी तरह क्वींसवे आगे चलकर जनपथ बना. कोपरनिकस मार्ग का पुराना नाम लॉर्ड लिटन रोड था. नए नामों से कॉलोनियल पास्ट से दूरी बनाने और भारतीय पहचान देने की कोशिश हुई.
हालांकि, दिल्ली में हर विदेशी नाम किसी राजनेता का नहीं है. दरियागंज के पास कर्नल आर ई ग्रांट गोवन मार्ग ब्रिटिश बिजनेसमैन और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पहले अध्यक्ष ग्रांट गोवन के नाम पर है. टॉल्स्टॉय मार्ग रूसी साहित्यकार लियो टॉल्स्टॉय की याद दिलाता है, कोपरनिकस मार्ग पोलैंड के साइंटिस्ट निकोलस कोपरनिकस के नाम पर है.
नाम बदलते हैं, इतिहास रह जाता है
विवेक शुक्ला कहते हैं सड़कों के नाम स्थायी नहीं होते. समय और सत्ता के साथ बदल सकते हैं. सरकारें अक्सर अपने आदर्शों, नायकों और ऐतिहासिक प्राथमिकताओं के हिसाब से नामकरण करती हैं.
दिल्ली की इन सड़कों को देखें, तो इनके नामों में भारत की फॉरेन पॉलिसी, आजादी के बाद की डिप्लोमेसी, कॉलोनियल हेरिटेज और साइंसलिटरेचर के प्रति सम्मान की झलक मिलती है. गूगल मैप पर मुश्किल लगने वाले ये नाम वर्ल्ड हिस्ट्री का हिस्सा है. इनके पीछे की कहानी जानेंगे तो ये रास्ते आपको इतिहास तक भी ले जा सकते हैं.



