Basti Blind Sculptor Ram Pal: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक छोटे से गांव में हर साल आने वाले ये नेत्रहीन मूर्तिकार, रामपाल, बिना आंखों की मदद के गणेश जी और दुर्गा देवी की मूर्तियांबनाते हैं. पिछले 25 वर्षों से यह काम कर रहे रामपाल ने अब पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है. रामपाल का जीवन इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण है कि कला को समझने के लिए आंखों की जरूरत नहीं होती, बल्कि सिर्फ बुद्धि और अनुभव की जरूरत होती है.

पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश में आकर बसे 50 वर्षीय रामपाल जन्म से ही नेत्रहीन हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने नेत्रहीनता को बाधा नहीं माना. वो छूकर, मन और कल्पना के माध्यम से भगवान की मूर्तियों को जीवंत करते आ रहे हैं. रामपाल हर साल पश्चिम बंगाल के निकुंज शहर से उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बाबुरहावा गांव की यात्रा करते हैं. यह वार्षिक यात्रा लगभग 25 वर्षों से जारी है.

त्योहार समाप्त होने के बाद बंगाल लौट जाते हैं रामपाल

वे दशहरा और नवरात्रि के त्योहारों से लगभग छह महीने पहले गांव पहुंचते हैं. यहां वे मिट्टी से दुर्गा देवी और गणेश सहित विभिन्न देवीदेवताओं की मूर्तियां बनाते हैं. त्योहारों का मौसम समाप्त होने के बाद वे पश्चिम बंगाल लौट जाते हैं. बाकी साल वे मिट्टी के बर्तन, खिलौने और विभिन्न सजावटी सामान बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं. राम पाल एक पारंपरिक कुम्हार परिवार से आते हैं.

बचपन से ही मिट्टी के बीच पलेबढ़े राम पाल ने अपने पिता विनायक कृष्ण पाल से मूर्ति बनाने की कला सीखी. दृष्टिहीन होने के बावजूद, वे केवल अपनी उंगलियों से छूकर ही मूर्तियों के आकार, चेहरे के भाव और शरीर की बनावट को महसूस कर सकते हैं. उनका मानना ​​है कि देवीदेवताओं के रूप उनके मन में पहले से ही अंकित हैं.

‘मूर्तियां बनाने के लिए मुझे आंखों की जरूरत नहीं’

राम पाल आत्मविश्वास से कहते हैं, मूर्तियां बनाने के लिए मुझे आंखों की जरूरत नहीं है. देवीदेवताओं के रूप और आकार मेरे मन और आत्मा में पहले से ही अंकित हैं. वे हर साल लगभग 40 से 50 मूर्तियां बनाते हैं. रामपाल की कलात्मक यात्रा में परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. उनकी ही तरह, उनके भाई संजय पाल, जो जन्म से दृष्टिहीन हैं, भी अतीत में उनके साथ मूर्तियां बनाने में मदद करते थे.

वर्तमान में, उनकी पत्नी कंचन पाल और बच्चे इस कार्य में सहयोग करते हैं. परिवार के सहयोग से रामपाल अपनी कलात्मक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. रंगाई के अंतिम चरण में मिट्टी की मूर्तियों को जीवंत रूप दिया जाता है. राम पाल मूर्तियों को पेंट करने के लिए एशियन पेंट्स का उपयोग करते हैं. आंखों की रोशनी न होने के बावजूद, रंगों का चुनाव करने और मूर्तियों को उनका अंतिम रूप देने की उनकी क्षमता अद्भुत है.

‘शरद सम्मान’ से सम्मानित

वे अपने अनुभव और कल्पना के आधार पर, मिट्टी के आकार को छूकर समझते हैं और भगवान की मूर्तियां तैयार करते हैं. रामपाल की विलक्षण कलात्मक प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है. उनकी कला को पहचानते हुए, एशियन पेंट्स ने उन्हें 2020 में ‘शरद सम्मान’ पुरस्कार से सम्मानित किया. इसके अलावा, रामपाल के जीवन, संघर्ष और कलात्मक प्रतिभा पर आधारित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री बनाई गई है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शित किया गया है और सराहा गया है.