केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF, भारत के सबसे पुराने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में से एक है. इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन में हुई थी. तब इसका नाम था क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस. स्थापना की तारीख थी 27 जुलाई 1939. उस समय भारत कई रियासतों और ब्रिटिश प्रांतों में बंटा हुआ था. अनेक रियासतों में जनता राजनीतिक अधिकारों, प्रतिनिधि शासन और सामाजिक सुधारों की मांग कर रही थी. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। कई स्थानों पर आंदोलन और विरोध हुए.

आज़ादी के बाद 28 दिसंबर 1949 को इसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ का नाम मिला. इस खास फोर्स की भूमिका समय के साथ बहुत बदलती गई. आज सीआरपीएफ केवल कानूनव्यवस्था का बल नहीं है. यह आतंकवादविरोध, उग्रवादविरोध, चुनाव सुरक्षा, आपदा राहत और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भी काम करता है. आज यह बल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है. आइए, इस बल के स्थापना दिवस के बहाने जानते हैं कि भारत में रियासतों के विद्रोह दबाने के लिए बनी इस फोर्स ने कौनकौन से मिशन चलाए?

रियासतों में अशांति के समय गठन

ब्रिटिश भारत में कई देशी रियासतें थीं. इन रियासतों पर स्थानीय राजा, नवाब या शासक शासन करते थे. ब्रिटिश सरकार का उन पर अलगअलग स्तर का प्रभाव था. 1930 के दशक में अनेक रियासतों में प्रजा मंडल आंदोलन शुरू हुए. लोग नागरिक अधिकार मांगने लगे. वे जवाबदेह शासन की मांग कर रहे थे. ब्रिटिश प्रशासन को डर था कि यह राजनीतिक असंतोष उसके नियंत्रण को चुनौती देगा. इसलिए एक ऐसे बल की जरूरत महसूस की गई, जो रियासतों में कानूनव्यवस्था बनाए रखने में सहायता कर सके. इसी उद्देश्य से क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस बनाई गई.

ब्रिटिश प्रशासन को डर था कि यह राजनीतिक असंतोष उसके नियंत्रण को चुनौती देगा, यह नींव की वजह बनी. AI Generated

आज़ादी के बाद नई भूमिका बदल गयी

साल 1947 में भारत आजाद हुआ. इसके बाद देश के सामने कई गंभीर चुनौतियां थीं. विभाजन के कारण हिंसा फैली. बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए. कई रियासतों का भारतीय संघ में विलय होना था. इन परिस्थितियों में सुरक्षा बलों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण बनी. 28 दिसंबर 1949 को संसद के अधिनियम के तहत क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस का नाम बदलकर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल कर दिया गया.

स्वतंत्र भारत में इसका उद्देश्य बदल गया. अब इसकी जिम्मेदारी देश की एकता, आंतरिक सुरक्षा और लोकव्यवस्था बनाए रखने में सहायता करना था. सीआरपीएफ ने रियासतों के भारतीय संघ में एकीकरण के दौर में भी सहयोग दिया. विभाजन के बाद पैदा हुई अव्यवस्था में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने का भी काम किया.

CRPF देश का सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है. फोटो: PTI

हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने किया हमला

आजादी के शुरुआती वर्षों में सीआरपीएफ को सीमावर्ती इलाकों में भी तैनात किया गया. इन इलाकों में घुसपैठ, सीमापार अपराध और सुरक्षा संबंधी खतरे मौजूद थे. बल ने भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय में काम किया. साल 1959 में लद्दाख के हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में सीआरपीएफ का एक गश्ती दल चीनी सैनिकों के हमले का शिकार हुआ. इस घटना में सीआरपीएफ के कई जवानों ने प्राणों की आहुति दी. 21 अक्टूबर को हर वर्ष पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन उन पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए बलिदान दिया.

सरदार पोस्ट की लड़ाई और शौर्य दिवस

सीआरपीएफ के इतिहास में 9 अप्रैल 1965 का दिन विशेष महत्व रखता है. गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित सरदार पोस्ट पर सीआरपीएफ की टुकड़ियां तैनात थीं. वहां पाकिस्तानी सेना ने हमला किया. जवानों ने सीमित संसाधनों के बावजूद बहादुरी से मुकाबला किया. इस संघर्ष को सरदार पोस्ट की लड़ाई के नाम से जाना जाता है. बल की इस वीरता की स्मृति में 9 अप्रैल को शौर्य दिवस के रूप में भी याद किया जाता है. यह घटना दिखाती है कि सीआरपीएफ ने केवल आंतरिक सुरक्षा में ही नहीं, बल्कि युद्ध जैसी स्थितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

सरदार पटेल.

पंजाब में उग्रवादविरोधी अभियान

1980 के दशक में पंजाब उग्रवाद की गंभीर समस्या से जूझ रहा था. हिंसा, हत्या, धमकी और अलगाववादी गतिविधियों ने आम जनजीवन को प्रभावित किया. इस समय राज्य पुलिस, सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ सीआरपीएफ की तैनाती की गई. सीआरपीएफ ने संवेदनशील स्थानों की सुरक्षा की. उसने तलाशी अभियान चलाए. सार्वजनिक संस्थानों और परिवहन व्यवस्था की सुरक्षा में मदद की. बल का उद्देश्य हिंसा पर नियंत्रण और सामान्य जीवन को बहाल करना था. उग्रवादविरोधी अभियानों में कानून का पालन, नागरिकों की सुरक्षा और खुफिया समन्वय बहुत जरूरी होता है. सीआरपीएफ की भूमिका इन्हीं क्षेत्रों में रही.

पूर्वोत्तर भारत में चलाया अभियान

पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में अलगाववाद, उग्रवाद और जातीय संघर्ष जैसी समस्याएं रही हैं. असम, त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैंड और अन्य क्षेत्रों में सुरक्षा की स्थिति कई बार कठिन बनी. सीआरपीएफ ने इन राज्यों में राज्य प्रशासन की सहायता की. उसका काम हिंसक गतिविधियों को रोकना, संवेदनशील इलाकों में गश्त करना और नागरिक क्षेत्रों की सुरक्षा करना रहा. 1990 के दशक में त्रिपुरा में उग्रवादविरोधी प्रयासों में भी बल की भूमिका महत्वपूर्ण रही. इन क्षेत्रों में सुरक्षा अभियान केवल बल प्रयोग तक सीमित नहीं होते. स्थानीय लोगों का विश्वास, सूचना जुटाना और प्रशासन के साथ समन्वय भी आवश्यक होते हैं.

1990 के दशक में त्रिपुरा में उग्रवादविरोधी प्रयासों में भी सीआरपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण रही. फोटो: PTI

जम्मूकश्मीर में आतंकवादविरोधी भूमिका

जम्मूकश्मीर लंबे समय से आतंकवाद और सीमापार हिंसा की चुनौतियों का सामना करता रहा है. इस क्षेत्र में सीआरपीएफ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. बल संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात रहता है. वह काफिलों, सरकारी भवनों, धार्मिक स्थलों और चुनावी प्रक्रियाओं की सुरक्षा में भी सहयोग करता है. सीआरपीएफ ने कई बार आतंकी हमलों का मुकाबला किया है. भारतीय संसद पर 13 दिसंबर 2001 के आतंकी हमले के दौरान सीआरपीएफ कर्मियों ने सुरक्षा कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ अभियान

भारत के कुछ हिस्सों में वामपंथी उग्रवाद, जिसे सामान्य भाषा में नक्सलवाद भी कहा जाता है, बड़ी चुनौती रहा है. छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, महाराष्ट्र और कुछ अन्य क्षेत्रों में इस समस्या का प्रभाव देखा गया. सीआरपीएफ की विशेष इकाई कोबरा जंगलों और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में अभियान चलाने के लिए जानी जाती है. इन अभियानों में सुरक्षा बल उग्रवादी ठिकानों का पता लगाते हैं. वे हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी करते हैं. साथ ही, सड़कों, स्कूलों, विकास परियोजनाओं और ग्रामीण आबादी की सुरक्षा में भी सहायता करते हैं. ऐसे अभियानों का लक्ष्य केवल हिंसक समूहों को रोकना नहीं होता. सुरक्षित माहौल बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि विकास कार्य आगे बढ़ सकें.

भीड़ प्रबंधन और दंगा नियंत्रण भी सीआरपीएफ की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं.

चुनावी व्यवस्था में है बल की बड़ी भूमिका

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. चुनावों के दौरान सुरक्षा एक बड़ी जिम्मेदारी होती है. कई राज्यों में मतदान केंद्र दूरदराज क्षेत्रों में होते हैं. कुछ इलाकों में हिंसा या धमकी का खतरा भी रहता है. यह बल चुनावी ड्यूटी में बड़ी भूमिका निभाता है. मतदान केंद्रों की सुरक्षा करता है. वह ईवीएम और चुनाव कर्मियों की सुरक्षित आवाजाही में सहायता करता है. संवेदनशील बूथों पर अतिरिक्त सुरक्षा दी जाती है. इस भूमिका का मुख्य उद्देश्य मतदाता को बिना डर के वोट डालने का अवसर देना है. इसलिए चुनाव सुरक्षा को सीआरपीएफ के सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक दायित्वों में गिना जाता है.

सीआरपीएफ के जवानों की तैनातीश्रीलंका, हैती, कोसोवो और लाइबेरिया जैसे देशों में भी रही है. फोटो: PTI

दंगा नियंत्रण और रैपिड एक्शन फोर्स

भीड़ प्रबंधन और दंगा नियंत्रण भी सीआरपीएफ की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं. इसके लिए रैपिड एक्शन फोर्स यानी आरएएफ का गठन किया गया. आरएएफ को साम्प्रदायिक तनाव, हिंसक भीड़ और दंगों जैसी स्थितियों में त्वरित कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. इसका उद्देश्य स्थिति को नियंत्रित करना है. साथ ही, जानमाल की हानि रोकना भी जरूरी होता है. ऐसे समय में संयम, अनुशासन और कानून के अनुसार कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है.

आपदा राहत और बचाव कार्य में भी आगे

सीआरपीएफ केवल सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं है. यह प्राकृतिक आपदाओं के समय भी राहत और बचाव कार्य करता है. बाढ़, भूकंप, चक्रवात और भूस्खलन जैसी परिस्थितियों में जवान लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाते हैं. 1999 के ओडिशा सुपर साइक्लोन, 2001 के गुजरात भूकंप, 2004 की सुनामी और 2005 के जम्मूकश्मीर भूकंप में सीआरपीएफ ने राहत कार्यों में हिस्सा लिया. आपदा के समय बल के जवान भोजन, दवाइयां और अन्य जरूरी सहायता पहुंचाने में भी मदद करते हैं.

संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में भी आगे

सीआरपीएफ ने विदेशों में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में भी भाग लिया है. बल के कर्मी श्रीलंका, हैती, कोसोवो और लाइबेरिया जैसे देशों में भी तैनात रहे हैं. इन मिशनों का उद्देश्य संघर्षग्रस्त देशों में शांति और कानूनव्यवस्था बहाल करने में सहायता देना होता है. लाइबेरिया में सीआरपीएफ की महिला टुकड़ी की तैनाती विशेष रूप से उल्लेखनीय रही. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की महिला पुलिस क्षमता की पहचान बनी.