मराठा इतिहास में बाजीराव प्रथम का नाम तेज, साहस और रणनीति का प्रतीक है. वे बेहद कम उम्र में सत्ता के शिखर पर पहुंचे थे. उन्होंने अपने छोटे जीवन में अद्भुत सैन्य सफलता हासिल की थी. उनकी कहानी प्रेरणा और नेतृत्व का शानदार उदाहरण है. उनकी डेथ एनिवर्सरी के बहाने जानिए कैसे महज 20 साल की उम्र में वो पेशवा बने? क्या रहीं उनके जीवन की उपलब्धियां? क्यों आज भी मराठा समाज में उनका नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है?

कभी जंग न हारने वाले बाजीराव कैसे बने छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा?
कभी जंग न हारने वाले बाजीराव कैसे बने छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा?

बाजीराव प्रथम का जन्म 18 अगस्त साल 1700 को हुआ. उनके पिता बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के पेशवा थे. उस जमाने में पेशवा का पद प्रधानमंत्री जैसा महत्वपूर्ण हुआ करता था. बाजीराव बचपन से ही युद्ध और राजनीति में रुचि गहरी रखते थे. कम उम्र में ही उन्होंने घुड़सवारी और युद्धकला में महारत हासिल कर ली थी.

विरोध के बीच 20 वर्ष की उम्र में पेशवा बने

साल 1720 में बाजीराव प्रथम के पिता बालाजी विश्वनाथ का निधन हो गया. उस समय उनकी उम्र महज 20 बरस थी. मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहू महाराज ने उन्हें पेशवा नियुक्त किया. वे इस युवा की बहादुरी से वाकई थे. फिर भी उनका यह निर्णय बेहद साहसिक था. कई दरबारी बाजीराव प्रथम की इस नियुक्ति के खिलाफ थे. उन्हें अनुभवहीन कहा गया, लेकिन शाहू महाराज ने उन पर भरोसा किया. बाजीराव ने भी इस विश्वास को सही साबित किया. उन्होंने जल्द ही अपनी योग्यता दिखा दी तो विरोधियों का मुंह भी बंद हो गया.

छत्रपति शाहू महाराज.

क्या बाजीराव छत्रपति शिवाजी के पेशवा थे?

इस सवाल का साफसाफ जवाब है नहीं. बिल्कुल नहीं. यह एक सामान्य भ्रम है. बाजीराव प्रथम, छत्रपति शिवाजी के नहीं बल्कि छत्रपति शाहू महाराज के पेशवा थे. शिवाजी महाराज का निधन तीन अप्रैल 1680 में हो गया था. और बाजीराव का जन्म साल 1700 में हुआ. ऐसे में यह संभव ही नहीं था लेकिन यह भ्रम कई बार सुननेपढ़ने को मिल जाता है. दोनों का समय अलग था. हां, यह जरूर रहा कि बाजीराव ने शिवाजी की नीतियों को आगे बढ़ाया. उन्होंने स्वराज्य की भावना को हर संभव तरीके से मजबूत किया और कहीं न कहीं उनकी यही काबिलियत इस भ्रम की वजह बनी.

एकदम अलग थी उनकी युद्ध नीति

बाजीराव की युद्ध नीति बहुत तेज और लचीली थी. वे छापामार युद्ध के समर्थक थे. वे भारी सेना से नहीं, तेज गति से जीतते थे. उनका प्रसिद्ध कथन थादुश्मन को वहीं मारो, जहां वह कमजोर हो. वे लंबी दूरी तय करते थे. उनकी सेना हल्की और तेज थी. इससे वे दुश्मन पर अचानक हमला करते थे.

40 की उम्र में 40 युद्ध जीतने का दावा

कहा जाता है कि बाजीराव ने अपने जीवन में लगभग 40 युद्ध लड़े. और उनमें से कोई भी नहीं हारे. यह उनकी रणनीति और नेतृत्व का प्रमाण है. हालांकि, सटीक संख्या पर इतिहासकारों में मतभेद है. फिर भी उनकी विजय श्रृंखला असाधारण मानी जाती है. नंबर में दोचार कम या ज्यादा होने से उनकी बहादुरी, चपलता, विजय यात्रा का महत्व कम नहीं होता. वे एक मान्य शूरवीर थे.

बाजीराव.

प्रमुख युद्ध और बाजीराव की उपलब्धियां

  • निजाम के खिलाफ पालखेड़ का युद्ध : यह बाजीराव की सबसे बड़ी जीतों में से एक थी. उन्होंने निजामउलमुल्क को घेर लिया. निजाम को संधि करनी पड़ी. इस युद्ध ने उनकी प्रतिष्ठा बढ़ा दी थी.
  • मालवा और बुंदेलखंड अभियान: बाजीराव ने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव बढ़ाया. उन्होंने मालवा पर कब्जा किया. बुंदेलखंड में महाराजा छत्रसाल की मदद की. छत्रसाल ने उन्हें अपना पुत्र समान माना. उन्होंने अपने राज्य का हिस्सा भी बाजीराव को दिया.
  • दिल्ली अभियान : बाजीराव ने मुगल राजधानी दिल्ली तक हमला किया. वे तेजी से पहुंचे और वापस लौट आए. मुगल सत्ता को बड़ा झटका लगा. यह अभियान उनकी गति और साहस का उदाहरण है.

अनूठी थी उनकी नेतृत्व शैली

बाजीराव अपने सैनिकों के साथ रहते थे. वे खुद युद्ध में भाग लेते थे. उनका नेतृत्व प्रेरणादायक था. वे निर्णय जल्दी लेते थे. उनमें आत्मविश्वास था. वे जोखिम लेने से नहीं डरते थे. इसी वजह से अपने 20 वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और जीते. बाजीराव ने मराठा शक्ति को नई ऊंचाई दी. उन्होंने दक्षिण से उत्तर तक विस्तार किया. उनकी नीति थी कि मराठा साम्राज्य को पूरे भारत में फैलाया जाए. उन्होंने मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाया. इसी वजह से मराठा साम्राज्य एक प्रमुख शक्ति बन गया. यही शिवाजी महाराज भी चाहते थे. उन्हीं की विरासत और सोच के साथ बाजीराव लगातार, आजीवन आगे बढ़ते रहे.

मस्तानी से जुड़ा नाम

बाजीराव का विवाह काशीबाई से हुआ था. बाद में उनका संबंध मस्तानी से भी जुड़ा. यह विषय विवादित भी रहा. दरबार में भी इसका विरोध हुआ लेकिन बाजीराव अपने निर्णय पर अडिग रहे. बाजीराव का निधन 28 अप्रैल 1740 को हुआ. उस समय वे केवल 40 वर्ष के थे. उनकी मृत्यु अचानक हुई. उनके निधन के बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बने. बाजीराव की विरासत आज भी जीवित है. उन्हें भारत के महान सेनापतियों में गिना जाता है. इतिहासकारों जदुनाथ सरकार से लेकर जीएस सरदेसाई तक ने बाजीराव प्रथम को अपनी लेखनी का हिस्सा बनाया है. विदेशी लेखकों ने भी बाजीराव के जीवन और उनके युद्ध अभियानों पर खूब लिखा है.

इस तरह कहा जा सकता है कि बाजीराव प्रथम एक असाधारण योद्धा थे. उन्होंने कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने अपनी रणनीति से दुश्मनों को हराया. वे शिवाजी के बाद मराठा शक्ति के सबसे बड़े विस्तारक माने जाते हैं. उनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है. उनका जीवन यह सिखाता है कि साहस, गति और सही रणनीति से बड़ी जीत हासिल की जा सकती है.