हिमाचल पर मंडरा रहा बड़ा खतरा! दरकते पहाड़ पिघलते ग्लेशियर बने चुनौती; वैज्ञानिक निगरानी जरूरी

NIT हमीरपुर में NDMA सदस्य ने वैज्ञानिक निगरानी पर दिया जोर

हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में दरकते पहाड़, बढ़ती भूस्खलन की घटनाएं और पिघलते ग्लेशियर आने वाले समय के लिए बड़े खतरे के संकेत दे रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील पहाड़ी राज्यों में इन चुनौतियों से निपटना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। हिमाचल में हर साल बारिश, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक घटनाओं से पैदा होने वाली चुनौतियों के बीच समय रहते वैज्ञानिक अध्ययन, प्रभावी निगरानी और बेहतर आपदा प्रबंधन की जरूरत महसूस की जा रही है।

भारत सरकार के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने भी हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता पर चिंता जताते हुए कहा कि आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। NIT हमीरपुर के 17वें दीक्षांत समारोह में उनके संबोधन के दौरान आपदा प्रबंधन, ग्लेशियरों की निगरानी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे चर्चा में रहे।

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हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां इसे भूस्खलन, ग्लेशियरों में बदलाव और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील बनाती हैं। पहाड़ों में होने वाले बदलावों की समय रहते पहचान करना और संभावित जोखिम का आकलन करना आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. असवाल ने इस दिशा में वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह विषय खास महत्व रखता है, जहां प्राकृतिक परिस्थितियों के साथसाथ बस्तियों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे की सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती है।

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प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में केवल घटना के बाद राहत और बचाव कार्य पर्याप्त नहीं होते। संभावित खतरे की पहचान, जोखिम वाले क्षेत्रों की निगरानी और समय रहते तैयारी भी उतनी ही जरूरी है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और ग्लेशियरों से जुड़े जोखिमों को समझने के लिए लगातार वैज्ञानिक आंकड़े जुटाने की आवश्यकता है। यदि निगरानी और पूर्व तैयारी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, तो आपदाओं के प्रभाव को कम करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में हिमालयी राज्यों के लिए दीर्घकालिक योजना और वैज्ञानिक आकलन अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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NDMA सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने बताया कि भूस्खलन जैसी घटनाओं से जुड़े जोखिमों को समझने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ग्लेशियरों की निगरानी में सेंसर तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। इस तकनीक से ग्लेशियरों की ऊंचाई में होने वाले बदलावों को मापने में मदद मिलती है। ऐसी निगरानी से वैज्ञानिकों को हिमालयी क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन करने और संभावित जोखिमों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है।

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डॉ. असवाल ने आपदा प्रबंधन की व्यवस्था के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण प्रधानमंत्री के अधीन कार्य करता है। वहीं, राज्यों में भी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित हैं, जिनकी अध्यक्षता संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री करते हैं। आपदा की स्थिति में राज्य सरकारें आवश्यक सहायता के लिए प्रस्ताव भेजती हैं। जब राज्य के उपलब्ध संसाधन पर्याप्त नहीं होते, तब केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों के माध्यम से सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती है।

अपने संबोधन में डॉ. असवाल ने राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राष्ट्रीय आपदा शमन कोष का भी उल्लेख किया। आपदा प्रबंधन में राहत और बचाव के साथसाथ जोखिम को कम करने के प्रयासों का भी महत्व है। संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, तकनीकी निगरानी, वैज्ञानिक शोध और बेहतर तैयारी से आपदाओं के संभावित प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है। हिमाचल जैसे राज्यों में इन प्रयासों को मजबूत करना लोगों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

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NIT हमीरपुर के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. असवाल ने राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते दौर में नई पीढ़ी के लिए तकनीक और डेटा तक पहुंच बेहद जरूरी है। भविष्य में शोध का बड़ा हिस्सा उपलब्ध डेटाबेस और सूचनाओं पर आधारित होगा। ऐसे में विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को गुणवत्तापूर्ण डेटा उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे बेहतर और तेजी से अनुसंधान कर सकें। आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी सटीक आंकड़े और आधुनिक तकनीक जोखिमों को समझने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान हमीरपुर में 23 अक्टूबर को 17वां दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी कार्यक्रमों के कुल 1,265 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। समारोह में NDMA सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक उपलब्धियों का महत्वपूर्ण अवसर रहा। इस दौरान तकनीक, शोध और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर भी जोर दिया गया।

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हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक बदलावों की निगरानी और आपदा जोखिम को समझना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण बना रहेगा। भूस्खलन और ग्लेशियरों में बदलाव से जुड़े खतरों का आकलन करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों, प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत है। NDMA सदस्य की ओर से वैज्ञानिक अध्ययन, सेंसर तकनीक और बेहतर तैयारी पर दिया गया जोर इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश के लिए चुनौती केवल आपदा के समय प्रतिक्रिया देने की नहीं, बल्कि संभावित खतरों को पहले पहचानने और नुकसान को कम करने की व्यवस्था मजबूत करने की भी है।