Jefferies Report: भारत एक बड़े आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है. ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक जेफरीज ने अपनी नई रिपोर्ट में इसे ‘भारत की नई औद्योगिक क्रांति’ का नाम दिया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्रांति को देश के बड़े घरेलू बाजार, प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ सरकार की नीतियों का सीधा फायदा मिल रहा है. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोलने, डेटा सेंटर्स के लिए लंबे टैक्स हॉलिडे देने, सेमीकंडक्टर व इलेक्ट्रॉनिक्स में बड़ी इंसेंटिव स्कीम लागू करने से विकास को तेज रफ्तार मिली है. इसके अलावा लोकलाइजेशन के नियम व सरकारी जीपीयू की खरीद जैसे कदम भी उभरते हुए सेक्टर्स के लिए मददगार साबित हो रहे हैं.

स्पेस व सेमीकंडक्टर में भारत की लंबी छलांग

स्पेस सेक्टर में भारत दुनिया के उन गिनेचुने देशों में शामिल है, जिसके पास ग्लोबल स्तर की क्षमताएं मौजूद हैं. जेफरीज की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने साल 2020 में इस सेक्टर को प्राइवेट हिस्सेदारी के लिए खोला था. साल 2023 से 2030 के बीच स्पेस इकोनॉमी को पांच गुना बढ़ाकर 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है. अब स्काईरूट, पिक्सल, अग्निकुल व दिगंतरा जैसे स्टार्टअप्स शुरुआती इनोवेशन से आगे बढ़कर कमर्शियल स्तर पर काम कर रहे हैं. स्काईरूट ने हाल ही में अपना ऑर्बिटल लॉन्च किया है, जबकि पिक्सल हाईरेजोल्यूशन वाले सैटेलाइट बना रही है.

सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी देश सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब काम जमीन पर दिखने लगा है. इस सेक्टर में करीब 20 अरब डॉलर का निवेश किया जा चुका है. एक चिप फैब प्लांट बन रहा है व कई ओसैट प्रोजेक्ट्स में प्रोडक्शन शुरू हो गया है. इसके साथ ही 13 अरब डॉलर के एक नए इंसेंटिव प्लान से इस पूरे इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी, जिसमें चिप डिजाइनिंग भी शामिल है. सप्लाई चेन व टैलेंट जैसी चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन भारत एक मजबूत इकोसिस्टम की नींव रख रहा है.

डेटा सेंटर्स व इलेक्ट्रॉनिक्स का बढ़ता दायरा

डेटा सेंटर्स की बात करें तो क्लाउड एडॉप्शन, डिजिटाइजेशन व डेटा लोकलाइजेशन की वजह से ये एक स्ट्रैटेजिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बन गया है. पिछले पांच साल में इसकी क्षमता पांच गुना बढ़कर 2 गीगावाट तक पहुंच गई है. अनुकूल लागत, सरकारी नीतियों व हाइपरस्केलर की बढ़ती डिमांड के कारण अगले पांच सालों में इसके 10 गीगावाट तक पहुंचने की पूरी उम्मीद है. इससे ऑपरेटर्स के लिए 9 अरब डॉलर का रेवेन्यू बनेगा, जबकि पावर, कूलिंग, कंस्ट्रक्शन नेटवर्किंग के क्षेत्र में 45 अरब डॉलर के निवेश का नया रास्ता खुलेगा.

दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भी देश सिर्फ असेंबली लाइन से आगे बढ़कर अब कलपुर्जे बनाने पर जोर दे रहा है. ईसीएमएस व एमपीएमएस जैसी योजनाओं के जरिए विदेशी निर्भरता कम करने का प्रयास हो रहा है. मोबाइल कंपोनेंट निर्माण में घरेलू वैल्यू एडिशन अगले छह साल में 20 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. पीसीबी जैसे अहम कंपोनेंट्स पर सरकार का खास फोकस है.

सोलर पावर के साथ एयरोस्पेस में दबदबा

रिन्यूएबल एनर्जी के मोर्चे पर भी बड़ी कामयाबी मिली है. भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर पीवी निर्माता बन गया है. अभी 35 गीगावाट की सेल क्षमता चालू हालत में है, जबकि 100 गीगावाट पर काम चल रहा है. एएलएमएम व पीएलआई जैसी नीतियों की मदद से सेल, वेफर व इनगट के निर्माण में तेजी आई है. साल 2030 तक इस सेक्टर की 90 प्रतिशत मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही होने लगेगी.

इसके अलावा, दुनिया भर में एयरोस्पेस सेक्टर में चल रहे डिमांडसप्लाई के असंतुलन का फायदा भी भारत को मिल रहा है. बोइंग, एयरबस जैसी ग्लोबल कंपनियां हर साल भारत से 1.4 से 1.6 अरब डॉलर की खरीदारी कर रही हैं. भारत की कंपनियां जैसे एक्यूस , आजाद व भारत फोर्ज अब ग्लोबल कंपनियों को सप्लाई कर रही हैं और तेजी से अपना विस्तार कर रही हैं.