एक दोपहर, किसी परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में एक मैसेज आता है. एक धुंधला सा वीडियो, जिसमें कुछ अजनबी पास के किसी शहर में एक बच्चे को उठाते दिख रहे हैं. कैप्शन में लिखा है कि इलाके में बच्चा उठाने वाले सक्रिय हैं. कोई इसे मोहल्ले के ग्रुप में फॉरवर्ड कर देता है. कोई और इसे आगे भेज देता है. कुछ घंटों में एक भीड़ जमा हो जाती है, किसी सबूत के इर्दगिर्द नहीं, बल्कि डर के इर्दगिर्द. 2017 से 2020 के बीच, भारत में कम से कम 23 लोग ऐसी ही अफवाहों की वजह से भीड़ के हाथों मारे गए, जो व्हाट्सऐप फॉरवर्ड के ज़रिए फैलीं और जिनमें दावा किया गया था कि आसपास बच्चा उठाने वाले या अंग चुराने वाले घूम रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर वीडियो और मैसेज झूठे थे, या तो पुरानी फुटेज थी किसी और घटना की, या पूरी तरह गढ़ी हुई कहानी. जो लोग मारे गए, वे अक्सर बाहरी थे, यात्री या अजनबी, जो बस डरी हुई भीड़ को अनजान से लगे. यह एक बेहद चरम नतीजा है. पर इसके पीछे की आदत, यानी कुछ इसलिए मान लेना और आगे भेज देना क्योंकि वह जरूरी लगे, बेहद आम है और ज़्यादातर मामलों में जानलेवा नहीं होती. यह बस चुपचाप यह तय करती है कि लाखों लोग किसे सच मान लेते हैं.

दुनिया के सबसे ज़्यादा व्हाट्सऐप यूजर

माइक्रोसॉफ्ट के एक वैश्विक सर्वे के मुताबिक, 60 प्रतिशत से ज़्यादा भारतीयों ने कहा कि उन्हें ऑनलाइन फेक न्यूज मिली, जो 57 प्रतिशत के वैश्विक औसत से ज़्यादा है. भारत में दुनिया के सबसे ज़्यादा व्हाट्सऐप यूज़र भी हैं, और किसी भी देश की तुलना में फॉरवर्ड किए गए कंटेंट की दर भी सबसे ज़्यादा में से एक है. एक अलग सर्वे में पाया गया कि पहली बार वोट डालने वाले 88 प्रतिशत भारतीय युवा फेक न्यूज़ को एक गंभीर समस्या मानते हैं, भले ही कई ने यह भी माना कि उन्हें इसे पहचानने में मुश्किल होती है.

तो असल सवाल यह है. अगर हम में से ज़्यादातर लोग मानते हैं कि गलत जानकारी एक समस्या है, तो यह फैलती ही क्यों रहती है? इसका एक हिस्सा इंसानी फितरत में है. जो मैसेज हमें डराता है, गुस्सा दिलाता है, या गर्व महसूस कराता है, वह उस मैसेज से ज़्यादा तेज़ी से फैलता है जो हमें सोचने पर मजबूर करे. डर कहता है, अभी शेयर करो, तुम्हारे किसी अपने को खतरा हो सकता है.

सावधानी शायद ही कभी जरूरी लगे

गर्व कहता है, अभी शेयर करो, यह वही साबित करता है जो तुम पहले से मानते थे. कोई भी मैसेज यह नहीं कहता, रुको, पहले इसे जांच लो, क्योंकि सावधानी शायद ही कभी उतनी जरूरी लगती है, जितनी घबराहट लगती है. एक शांत वजह भी है. बहुत से लोगों को सच में नहीं पता कि किसी बात को जल्दी कैसे जांचें, और वे मान लेते हैं कि इसके लिए किसी खास औज़ार या पत्रकार जैसी ट्रेनिंग चाहिए. आमतौर पर ऐसा नहीं होता.

कुछ आसान आदतें हैरान करने लायक ज़्यादातर गलत जानकारी पकड़ लेती हैं. व्हाट्सऐप पर, “कई बार फॉरवर्ड किया गया” लिखा मैसेज एक संकेत है कि रुक जाओ, और तेज मत करो, क्योंकि यह लेबल इसीलिए है कि ऐसे मैसेज इतनी दूर तक फैल जाते हैं कि कोई भी उन्हें जांच नहीं पाता.

भारत में स्वतंत्र फैक्टचेकिंग संस्थाएं

किसी फोटो या वीडियो को अक्सर रिवर्स इमेज सर्च से जांचा जा सकता है, जो अक्सर दिखा देता है कि जिसे “हाल की” घटना बताया जा रहा है, वह असल में कई साल पुरानी है, या किसी बिल्कुल अलग देश की है. और जो मैसेज सोचने का मौका दिए बिना तुरंत कुछ करने के लिए कहे, उस पर कम नहीं, ज़्यादा शक करना चाहिए. भारत में स्वतंत्र फैक्टचेकिंग संस्थाएं भी हैं, साथ ही सरकार का अपना प्रेस सूचना ब्यूरो फैक्टचेक चैनल भी, जो वायरल दावों की रोज़ाना जांच प्रकाशित करते हैं. इनमें से कोई भी हर चीज़ नहीं पकड़ पाता. पर किसी शक वाले दावे को आगे भेजने से पहले, इनमें से किसी एक से मिलाकर देखने में उतना वक्त नहीं लगता, जितना हम में से ज़्यादातर मान लेते हैं.

इसका यह मतलब नहीं कि हर बिना जांचा मैसेज झूठा होता है, या शक करना दूसरों पर भरोसे की जगह ले ले. ज़्यादातर मैसेज जो लोग शेयर करते हैं, वे हानिरहित होते हैं, भले ही गलत हों. पर 2017 से 2020 के बीच गई तेईस जानें याद दिलाती हैं कि कभीकभी, अफवाह और सच के बीच का फासला शर्मिंदगी से कहीं ज़्यादा गंभीर चीज में नापा जाता है.

‘हर मैसेज को जांचने की जरूरत नहीं’

किसी नागरिक को अपने फोन पर आने वाले हर मैसेज को जांचने की जरूरत नहीं. पर किसी ऐसे मैसेज को आगे भेजने से पहले रुकना, जो डराए या गुस्सा दिलाए, बस इतना पूछने के लिए कि ‘क्या यह सच में सच है,’ दिन में कई बार, लगभग सभी के लिए उपलब्ध नागरिकता का सबसे छोटा काम है. अगली बार जब कोई मैसेज तुरंत शेयर करने के लिए कहे, तो अपना अंगूठा हिलाने से पहले एक सवाल पूछने लायक है. क्या मैं इसे इसलिए शेयर कर रहा हूं क्योंकि मैंने इसे जांच लिया है, या सिर्फ इसलिए क्योंकि इसने मुझे कुछ महसूस कराया?