जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक अहम घटनाक्रम और निर्णायक मोड़ के तौर पर, स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी कश्मीर ने शेरएकश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज , श्रीनगर की स्टाफ नर्स सुश्री सरला भट के अपहरण, टॉर्चर और बेरहमी से हत्या के मामले में श्रीनगर में TADA/POTA और NIA एक्ट के तहत नियुक्त स्पेशल जज की अदालत में 737 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है. सरला भट की हत्या 18 अप्रैल 1990 को JKLF के आतंकवादियों ने कर दी थी.

SIA ने एक बयान में कहा कि J&K के DGP के आदेश पर यह मामला 18 मार्च 2024 को SIA J&K को सौंपा गया था. बयान में कहा गया है, “यह बड़ी चार्जशीट गहन जांच के बाद तैयार की गई है. इसमें दशकों से जमा किए गए और SIA कश्मीर द्वारा बारीकी से विश्लेषण किए गए मौखिक, दस्तावेजी, फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का एक मजबूत संग्रह शामिल है.”
समय कभी भी आतंकवाद के लिए ढाल नहीं बन सकता
छत्तीस साल बाद चार्जशीट दाखिल करना आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है और जम्मूकश्मीर में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि चार्जशीट एक मजबूत और स्पष्ट संदेश देती है कि समय कभी भी आतंकवाद के लिए ढाल नहीं बन सकता. चाहे कितने भी साल बीत जाएं, आतंकी अत्याचारों के लिए जिम्मेदार लोग कानून के सामने जवाबदेह बने रहेंगे. SIA ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि भले ही आतंकवाद डर, धमकी और हिंसा के जरिए न्याय में देरी कर सकता है, लेकिन यह कभी भी कानून के शासन को स्थायी रूप से हरा नहीं सकता. यह मामला कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर में किए गए सबसे बर्बर आतंकी अपराधों में से एक से जुड़ा है.
18 अप्रैल 1990 की वो तारीख…
चार्जशीट के मुताबिक, 18 अप्रैल 1990 को सुश्री सरला भट को SKIMS के पास से अगवा कर लिया गया था. उन्हें बेरहमी से प्रताड़ित किया गया और शारीरिक रूप से पीटा गया, और बाद में श्रीनगर के उमर कॉलोनी, मालबाग में ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई.
जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के चरम दौर के दौरान बने असाधारण हालात की वजह से यह मामला दशकों तक अनसुलझा रहा. आतंकवादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए डर, धमकी और आतंक के माहौल ने गवाहों के सामने आने और अहम जानकारी देने की क्षमता पर बुरा असर डाला था. आतंकवादी संगठनों ने ऐसा माहौल बना दिया था जहां धमकियों और हिंसा के ज़रिए लोगों को चुप रहने पर मजबूर किया जाता था, जिससे कई जघन्य अपराध डर और जबरदस्ती की परतों के नीचे दबे रह गए. चार्जशीट में यह बात कही गई है.
सरला भट का मामला कश्मीर घाटी में फैले आतंकवाद के उस काले अध्याय का एक प्रतीक बन गया. फिर भी, न तो पीड़िता की यादें धुंधली पड़ीं और न ही न्याय की चाहत कम हुई.
मार्च 2024 में SIA कश्मीर को सौंपे जाने के बाद, इस मामले की व्यापक और वैज्ञानिक जांच की गई. साढ़े तीन दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बावजूद, जांचकर्ताओं ने सुरक्षित गवाहों के बयानों, स्वतंत्र चश्मदीदों के बयानों, फोरेंसिक और बैलिस्टिक विश्लेषण, मेडिकल सबूतों, दस्तावेज़ी रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों और बड़े पैमाने पर की गई फील्ड जांच के ज़रिए घटनाओं के क्रम को बहुत मेहनत से फिर से तैयार किया. SIA ने यह जानकारी दी.
JKLF की भूमिका
जांच से यह बात पक्के तौर पर साबित हो गई है कि सुश्री सरला भट की हत्या हिंसा की कोई अलगथलग घटना नहीं थी, बल्कि यह जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के कमांड और कंट्रोल में रची गई एक बड़ी आतंकवादी साजिश का हिस्सा थी.
जांच में पता चला है कि इस अपहरण और बेरहमी से की गई हत्या की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में JKLF के तत्कालीन चीफ कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक के साथसाथ खुर्शीद अहमद चालकू, अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू शामिल थे. अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है, वहीं मोहम्मद यासीन मलिक अभी एक दूसरे मामले में न्यायिक हिरासत में है.
SIA ने बताया कि फरार आतंकवादी खुर्शीद अहमद चालकू के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, जिसमें भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया भी शामिल है, शुरू कर दी गई है. माना जाता है कि वह पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मूकश्मीर भाग गया है.
चार्जशीट में RPC की धारा 364, 341, 302 , 201 और 120B; आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम, 1987 की धारा 3 , 3 , 4 और 6; और भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 7 और 27 के तहत दंडनीय अपराधों का उल्लेख है.
जांच में यह भी साबित हुआ है कि सुश्री सरला भट को “मुखबिर” बताने का आरोप पूरी तरह से झूठा था और यह आतंकवादियों द्वारा पहले से सोचीसमझी हत्या को सही ठहराने के लिए गढ़ा गया एक बहाना था. जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूत दिखाते हैं कि यह हत्या JKLF के लक्षित आतंकवादी हिंसा के सुनियोजित अभियान का हिस्सा थी, जिसका मकसद निर्दोष नागरिकों, खासकर कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों के बीच डर फैलाना, उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन विस्थापित करने के हालात बनाना और आतंकवादी संगठन के अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था.
छत्तीस साल बाद इस जांच का सफल समापन इस बात की एक सशक्त याद दिलाता है कि समय बीतने से आपराधिक जवाबदेही खत्म नहीं होती. आतंकवादियों, अलगाववादियों, ओवरग्राउंड वर्करों और आतंकवादी साजिशों में शामिल सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि कानून न्याय दिलाने के लिए लगातार काम करता रहता है. कितना भी समय बीत जाए, कोई कितना भी छिप जाए या भौगोलिक दूरी कितनी भी हो, अपराधी जवाबदेही से हमेशा के लिए नहीं बच सकते.
SIA के एक बड़े अधिकारी ने कहा कि 737 पन्नों की इस चार्जशीट का दाखिल होना सिर्फ़ एक जांच का समापन नहीं है. यह उस पीड़ित की याद को श्रद्धांजलि है जिसे दशकों तक न्याय नहीं मिला, यह कानून के शासन की फिर से पुष्टि है और आतंकवाद के अनगिनत पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश है. इससे पता चलता है कि हर पीड़ित मायने रखता है, हर अपराध की जांच होगी और यह पक्का करने की पूरी कोशिश की जाएगी कि दोषियों को न्याय व्यवस्था के सामने लाया जाए.
यह अहम जांच SIA कश्मीर और भारत सरकार के उस पक्के इरादे को दिखाती है, जिसके तहत वे पुराने से पुराने अनसुलझे आतंकी अपराधों की सच्चाई सामने लाने और दोषियों को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रतिबद्ध हैं. इससे एक कड़ा और साफ संदेश जाता है कि आतंकवाद के मामलों में समय की कोई सीमा नहीं होती, न्याय की याददाश्त लंबी होती है, और कानून आखिरकार उन लोगों तक पहुंच ही जाता है जो सोचते हैं कि वे डर, हिंसा या समय बीतने के साथ जवाबदेही से बच सकते हैं. चार्जशीट में यह बात कही गई है.
SIA कश्मीर आतंकवाद की हर घटना की जांच पूरी ईमानदारी, लगन और निष्पक्षता से करने के अपने संकल्प पर अडिग है. वह फिर से दोहराती है कि कोई भी आतंकी अपराध इतना पुराना नहीं होता कि उसकी जांच न हो सके, कोई भी पीड़ित इतना भुलाया हुआ नहीं होता कि उसे न्याय न मिल सके, और कोई भी अपराधी कानून की पहुंच से बाहर नहीं होता.



