इजराइल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को वोट पड़े और नतीजा फंस गया है. एग्जिट पोल के मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन 50 से 52 सीटों के बीच अटका दिख रहा है, जबकि पिछली संसद में इसी खेमे के पास 68 सीटें थीं. उनके सबसे बड़े चैलेंजर, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट का खेमा भी 49 से 53 सीटों के आसपास है. 120 सीटों वाली संसद, यानी क्नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटें चाहिए.

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी अब भी सबसे बड़ी पार्टी बनती दिख रही है, पर बहुमत किसी के पास नहीं है. वोटिंग भी जमकर हुई, करीब 77.7 फीसदी, जो पिछले 25 साल में सबसे ज़्यादा है. आखिरी नतीजे आने में अभी कुछ दिन लगेंगे और उसके बाद हफ्तों तक जोड़तोड़ चल सकती है। बात नहीं बनी तो दोबारा चुनाव भी हो सकते हैं. ऐसे में दिल्ली में एक सवाल ज़रूर पूछा जा रहा होगा कि अगर नेतन्याहू कुर्सी पर नहीं लौटे, तो भारत और इजराइल की दोस्ती का क्या होगा?
मोदीनेतन्याहू की दोस्ती कितनी गहरी है?
ये सवाल इसलिए उठता है क्योंकि पिछले दस साल में इस रिश्ते का चेहरा मोदी और नेतन्याहू ही रहे हैं. 2017 में मोदी इजराइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने और अगले साल नेतन्याहू भारत आए. इसी साल फरवरी में मोदी फिर इजराइल गए, क्नेसेट में भाषण दिया और दोनों देशों ने रिश्तों को ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का दर्जा दे दिया.
एयरपोर्ट पर गले मिलना, एकदूसरे को ‘मेरा दोस्त कहना’, ये तस्वीरें लोगों को याद हैं. इसलिए बहुत से लोगों को लगता है कि ये रिश्ता दो नेताओं की निजी केमिस्ट्री पर टिका है पर असली तस्वीर इससे थोड़ी बड़ी है.
क्या डिफेंस डील और कारोबार पर असर पड़ेगा?
दोनों देशों को असल में जो चीज जोड़ती है, वो है जरूरत. भारत इजराइली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है. SIPRI के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच इजराइल ने जितने हथियार बेचे, उनमें से करीब 34 फीसदी भारत ने खरीदे. बराक मिसाइल सिस्टम, हेरॉन ड्रोन, स्पाइस बम, ये सब भारतीय सेना के रोज के हथियार बन चुके हैं. इजराइल की बड़ी डिफेंस कंपनियों ने भारत में अपनी यूनिट्स और साझेदारियां भी खड़ी कर ली हैं.
दोनों देशों के बीच कारोबार भी बढ़ रहा है. 2025 में दोनों के बीच करीब 5 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जिसमें सामान, सर्विस और हीरे शामिल हैं. पिछले साल निवेश समझौता हुआ और अब फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत चल रही है. इजराइल में सरकार किसी की भी बने, वो अपने सबसे बड़े ग्राहक से मुंह नहीं मोड़ेगी. भारत को भी ऐसी तकनीक चाहिए जो हर देश देने को तैयार नहीं होता, यानी डील्स रुकने का खतरा कम है.
नेतन्याहू के विरोधी भारत को कैसे देखते हैं?
यहां पुराना अनुभव काम आता है. 202122 में करीब डेढ़ साल नेतन्याहू सत्ता से बाहर थे और नफ्ताली बेनेट और याइर लापिड की सरकार चल रही थी. उस दौर में भी रिश्ते ठंडे नहीं पड़े. ग्लासगो में बेनेट और मोदी की मुलाकात खूब चर्चा में रही. भारत, इजराइल, अमेरिका और UAE का I2U2 ग्रुप उसी वक्त बना. जून 2022 में तब के रक्षा मंत्री बेनी गैंट्ज दिल्ली आए और दोनों देशों ने रक्षा सहयोग का एक नया विज़न डॉक्यूमेंट अपनाया. अडाणी ग्रुप को हाइफा पोर्ट का टेंडर भी लापिड के प्रधानमंत्री रहते ही मिला.
दिलचस्प बात ये है कि बेनेट और लापिड इस बार आइजनकोट वाले खेमे में ही हैं. आइजनकोट खुद सेना प्रमुख रह चुके हैं और इजराइल की डिफेंस इंडस्ट्री को अंदर से जानते हैं. ऐसे में उनसे भारत के साथ रक्षा रिश्ते कमज़ोर करने की उम्मीद कम ही है.
तो फिर बदलेगा क्या?
फर्क पड़ेगा तो सबसे पहले अंदाज़ में. मोदीनेतन्याहू वाली गर्मजोशी और सीधी लाइन शायद तुरंत न दिखे. नए प्रधानमंत्री के साथ भरोसा जमाने में थोड़ा वक्त लगेगा.
दूसरा मामला गाज़ा और फिलिस्तीन का है. नई सरकार का रुख थोड़ा भी नरम हुआ, तो भारत के लिए अरब देशों और इजराइल के बीच बैलेंस बनाना आसान हो सकता है. फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे पर देश के अंदर भी सवाल उठे थे. हालांकि इजराइली वोटर पिछले कुछ सालों में और दक्षिणपंथ की तरफ झुका है, इसलिए बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद करना ठीक नहीं होगा.
तीसरी बात भारतमिडिल ईस्टयूरोप कॉरिडोर यानी IMEC की है, जो काफी हद तक इजराइल और सऊदी अरब के रिश्तों पर टिका है. नई सरकार अगर अरब देशों से रिश्ते सुधारती है, तो फायदा भारत को भी मिलेगा.
सबसे बड़ा खतरा अनिश्चितता का है. जब तक नई सरकार नहीं बनती, नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे. अगर गठबंधन बनने में महीनों लगे या फिर से चुनाव हुए, तो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसे बड़े फैसले टल सकते हैं.
आखिर में सीधी बात ये है कि भारतइजराइल रिश्ता अब किसी एक नेता के भरोसे नहीं चलता. 1992 में पूरे राजनयिक रिश्ते बने और तब से दोनों देशों में कई पार्टियों की सरकारें आईंगईं, पर रिश्ता आगे ही बढ़ा. नेतन्याहू हारे तो गले मिलने वाली तस्वीरें शायद कम दिखें, लेकिन मिसाइल, ड्रोन, खेती और टेक्नोलॉजी वाली साझेदारी चलती रहेगी. हां, दिल्ली को नए चेहरों के साथ रिश्ता नए सिरे से जमाना जरूर पड़ेगा.
रिपोर्ट/ आशु मान



