ऊना। हिमाचल प्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता और सरकारी स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के दावे हर सरकार बड़े मंचों से करती रही है। कभी बेहतर शिक्षा व्यवस्था की बात होती है तो कभी सरकारी स्कूलों में निजी संस्थानों जैसी सुविधाएं देने के वादे किए जाते हैं। लेकिन इन दावों की जमीनी तस्वीर कई बार ऐसी सामने आती है, जो पूरे सिस्टम को आईना दिखाने के लिए काफी होती है।

ऊना जिले के मैहतपुर बसदेहड़ा से सामने आया एक मामला भी कुछ ऐसी ही हकीकत बयां कर रहा है। यहां एक सरकारी प्राथमिक स्कूल पिछले 37 वर्षों से अपने भवन के बजाय मंदिर के बरामदे में चल रहा है। हैरानी की बात है कि सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात, पहली से पांचवीं कक्षा तक के 31 मासूम इसी बरामदे में बैठकर अपना भविष्य संवारने की कोशिश कर रहे हैं।
1989 से मंदिर का बरामदा बना बच्चों का स्कूल
नगर परिषद मैहतपुर बसदेहड़ा के वार्ड नंबर पांच में स्थित राजकीय प्राथमिक स्कूल की कहानी सरकारी व्यवस्था की अनदेखी का लंबा उदाहरण है। वर्ष 1989 में शुरू हुआ यह स्कूल आज तक अपने स्थायी भवन का इंतजार कर रहा है। लक्ष्मी नारायण मंदिर का बरामदा ही पिछले साढ़े तीन दशक से स्कूल की कक्षाओं का ठिकाना बना हुआ है। इतने वर्षों में कई सरकारें बदलीं, शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के दावे हुए, लेकिन इस स्कूल के बच्चों को अपनी छत तक नसीब नहीं हो पाई।
वर्तमान में स्कूल में 31 विद्यार्थी पहली से पांचवीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाएं, पर्याप्त कमरे, खेल का मैदान और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। जिस उम्र में बच्चों को सुरक्षित और अनुकूल माहौल में पढ़ाई के साथ खेलकूद का अवसर मिलना चाहिए, उस उम्र में वे मंदिर के खुले बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
मंदिर का स्टोर रूम बना सरकारी रिकॉर्ड का ठिकाना
स्कूल की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां बच्चों की पढ़ाई से जुड़े सरकारी दस्तावेज, हाजिरी रजिस्टर और मिड डे मील का राशन रखने के लिए भी अपना कोई कमरा नहीं है। स्कूल का रिकॉर्ड और राशन मंदिर के एक स्टोर रूम में ताले के भीतर रखा जाता है। सुबह शिक्षक स्टोर रूम खोलकर जरूरी रजिस्टर बाहर निकालते हैं और बरामदे में ही बच्चों की हाजिरी लगाई जाती है।
इसके बाद इसी सीमित जगह में पढ़ाई का सिलसिला आगे बढ़ता है। मिड डे मील तैयार करने के लिए भी बरामदे के एक कोने का इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को भोजन परोसने से लेकर प्रार्थना सभा और कक्षा से जुड़ी अन्य गतिविधियां तक इसी स्थान पर पूरी करनी पड़ती हैं। सुबह नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक स्कूल की लगभग पूरी दिनचर्या मंदिर के बरामदे तक सिमटी रहती है।
धार्मिक आयोजन आते ही थम जाती है पढ़ाई
इस स्कूल के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह भी है कि मंदिर में जब कोई धार्मिक कार्यक्रम या आयोजन होता है तो बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित हो जाती है। मंदिर परिसर में कार्यक्रम होने के दौरान शिक्षकों और विद्यार्थियों के पास कक्षाएं लगाने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं होता। ऐसे में उन्हें आयोजन खत्म होने का इंतजार करना पड़ता है। यानी बच्चों की शिक्षा का सिलसिला स्कूल की जरूरतों के बजाय मंदिर में होने वाले कार्यक्रमों पर भी निर्भर हो जाता है।
नेशनल हाईवे के किनारे स्थित इस स्कूल में सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बच्चों के लिए न तो अपना सुरक्षित परिसर है और न ही खेलकूद के लिए मैदान। ऐसे में विद्यार्थियों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी शारीरिक गतिविधियां और सर्वांगीण विकास भी प्रभावित हो रहा है।
एसएमसी बैठकों में उठता रहा मुद्दा
स्कूल के मुख्याध्यापक नीरज शर्मा का कहना है कि सीमित संसाधनों के बीच बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है। मंदिर में अन्य कार्यक्रम होने पर पढ़ाई बाधित होती है। इस समस्या को हर बार स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) की बैठक में उठाया जाता है और स्कूल भवन की मांग को लेकर प्रस्ताव शिक्षा विभाग को भेजे जाते हैं। इसके बावजूद अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
वहीं, एसएमसी प्रधान लखवीर कौर ने सरकार से मांग की है कि स्कूल के लिए जल्द अपना भवन उपलब्ध करवाया जाए। उनका कहना है कि लंबे समय से मंदिर के बरामदे में पढ़ रहे बच्चों को भी दूसरे सरकारी स्कूलों की तरह मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिए। बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह की स्थिति लंबे समय तक नहीं चलनी चाहिए।
नगर परिषद ने जमीन का दिया भरोसा
वार्ड नंबर पांच की पार्षद रजिंद्र कौर ने बताया कि स्कूल भवन के निर्माण का मामला नगर परिषद की हाउस बैठक में उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सभी पार्षदों की सहमति बनाने के बाद स्कूल के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध करवाने के हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।
37 साल का इंतजार, आखिर कब मिलेगा बच्चों को अपना स्कूल?
मैहतपुर बसदेहड़ा का यह स्कूल केवल एक भवन की कमी का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद बड़े अंतर को भी उजागर करता है। सवाल यह है कि जिस प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर परिणाम और सुविधाओं की बात की जाती है, वहां एक प्राथमिक स्कूल को साढ़े तीन दशक से अपना भवन क्यों नहीं मिल पाया? आखिर इन बच्चों को कब तक मंदिर के बरामदे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ेगी?
अब जरूरत केवल आश्वासन देने की नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कदम उठाने की है। क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब हर बच्चे को सुरक्षित कक्षा, उचित वातावरण और जरूरी सुविधाएं मिलेंगी। मैहतपुर के इन 31 बच्चों को भी किसी दूसरे स्कूल के विद्यार्थियों की तरह अपना भवन, खेल मैदान और बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलने का इंतजार है।



