भारत की आजादी और संविधान निर्माण से पहले देश की कई रियासतों में सामाजिक सुधार की ऐसी पहल हुई थी, जिन्होंने अपने समय से आगे बढ़कर समानता और सामाजिक न्याय की नींव रखने का काम किया. इनमें ग्वालियर की सिंधिया रियासत का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है. सिंधिया शासन ने न केवल दलित समुदाय को सामाजिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए महत्वपूर्ण फैसले लिए, बल्कि शिक्षा, धार्मिक स्थलों में प्रवेश और सार्वजनिक सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर भी समान अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए थे.

  • मंदिरों, स्कूलों, कुओं और सार्वजनिक घाटों तक दलितों को दिलाया था समान अधिकार, घोड़ेपालकी की सवारी और मनचाहे कपड़े पहनने का भी दिया था अधिकार.
  • आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए 11 स्कूल और तीन निःशुल्क छात्रावास, भील और भिलाला समुदाय के उत्थान के लिए विशेष योजनाएं भी चलाई गईं.

ग्वालियर रियासत के तत्कालीन महाराजा जीवाजीराव माधवराव सिंधिया ने 4 मई 1945 को एक ऐतिहासिक घोषणा जारी कर दलित समुदाय के अधिकारों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी थी. इस घोषणा में कहा गया था कि जिन्हें तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में अछूत या हरिजन कहा जाता था, उन्हें भी अन्य नागरिकों की तरह वे सभी मूलभूत अधिकार प्राप्त हैं, जिनके वे जन्म से हकदार हैं. इस आदेश का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उस दौर में देश के अनेक हिस्सों में दलित समुदाय को मंदिरों में प्रवेश, सार्वजनिक कुओं से पानी लेने, स्कूलों में पढ़ने और यहां तक कि घोड़े या पालकी पर बैठने जैसे सामान्य सामाजिक अधिकारों से भी वंचित रखा जाता था.

मंदिर से स्कूल तक समान अधिकार, भेदभाव करने वालों के लिए दंड का प्रावधान

महाराजा जीवाजीराव सिंधिया की 4 मई 1945 की घोषणा में दलित समुदाय को कपड़े और आभूषण पहनने, अपनी पसंद के परिवहन साधनों का इस्तेमाल करने, विवाह की परंपराओं का पालन करने और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंचने की स्वतंत्रता दी गई थी. घोषणा में स्पष्ट किया गया कि दलित समुदाय के लोग कुओं, नहरों, नदी घाटों और राज्य द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों का इस्तेमाल कर सकेंगे. इतना ही नहीं, राज्य की संपत्ति वाले या राज्य द्वारा प्रबंधित मंदिरों में भी उन्हें अन्य हिंदुओं की तरह प्रवेश करने और पूजाअर्चना करने का अधिकार दिया गया.

इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इन अधिकारों के इस्तेमाल में बाधा डालने वाले लोगों के खिलाफ राज्य के मौजूदा कानूनों के तहत दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया गया था. यानी सामाजिक समानता की बात केवल आदर्श या उपदेश तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे प्रशासनिक आदेश और कानूनी कार्रवाई से जोड़ने का प्रयास किया गया था.

आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए 11 स्कूल और तीन मुफ्त छात्रावास

सिंधिया रियासत का योगदान केवल दलित उत्थान तक सीमित नहीं था. आदिवासी समुदायों की शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए भी कई महत्वपूर्ण प्रयास किए गए थे. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1938 तक ग्वालियर रियासत में भील और भिलाला आदिवासी बच्चों के लिए 11 स्कूल और तीन निःशुल्क छात्रावास संचालित थे. श्योपुर क्षेत्र में सहारिया समुदाय के बच्चों के लिए भी स्कूल और तीन मुफ्त छात्रावास की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है.

आदिवासी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के साथसाथ उन्हें व्यावहारिक और रोजगारपरक कौशल सिखाने की योजनाएं भी बनाई गई थीं. भील और भिलाला बच्चों को ऐसी दस्तकारी और कारीगरी का प्रशिक्षण देने की पहल की गई, जिससे वे अपने दैनिक जीवन और आजीविका को बेहतर बना सकें.

टांडा और बाग में आदिवासी बच्चों के लिए छात्रावास बनाए गए. वहीं मनावर परगना के बाग क्षेत्र में पांडव गुफा पर्वत पर वन विभाग की देखरेख में आदिवासी बच्चों के लिए मॉडल स्कूल स्थापित किया गया. विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था भी की गई थी. इसके अलावा आदिवासी सम्मेलनों के माध्यम से समुदायों की समस्याओं को समझने और गांवों में पंचायत व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में भी काम किया गया.

सामाजिक सुधार के लिए आयोग का गठन

ग्वालियर रियासत में पिछड़े और वंचित समुदायों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए आयोग गठित किए जाने का भी ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है. इसका उद्देश्य इन समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों, समस्याओं और आवश्यकताओं का अध्ययन करना था. आयोग ने संबंधित समुदायों के प्रतिनिधियों और समाज सुधार के कार्यों से जुड़े लोगों से सुझाव मांगे थे. उन्हें अपने लिखित प्रस्ताव गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को सौंपने के लिए आमंत्रित किया गया था. यह पहल बताती है कि सामाजिक सुधार को केवल व्यक्तिगत प्रयासों के बजाय संस्थागत और प्रशासनिक स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश भी की गई थी.

बड़ौदा के गायकवाड़ महाराजा ने बाबा साहेब अंबेडकर को दी थी उच्च शिक्षा में मदद

सिंधिया राजवंश के सामाजिक सुधारों की चर्चा के साथ मराठा शासकों की दूसरी रियासतों का योगदान भी उल्लेखनीय है. बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूतों को महत्वपूर्ण सहयोग दिया था. 4 अप्रैल 1913 को महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ और युवा भीमराव अंबेडकर के संबंध बहुत ही घनिष्ठ थे . अंबेडकर जी को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता और छात्रवृत्ति प्रदान की गई. इसी सहयोग से उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई की. यह सहयोग भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय और शिक्षा के महत्व को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.

सामाजिक समानता की दिशा में मराठा रियासतों की विरासत

ग्वालियर के सिंधिया, बड़ौदा के गायकवाड़ और कोल्हापुर के भोंसले जैसे मराठा शासकों की रियासतों में अलगअलग समय पर सामाजिक सुधार और वंचित समुदायों के उत्थान से जुड़े प्रयास हुए. इन पहलों को उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना जरूरी है, जब जातिगत भेदभाव भारतीय समाज की बड़ी चुनौती था.

ग्वालियर रियासत की 1945 की घोषणा विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दलितों के धार्मिक, शैक्षणिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अधिकारों को स्पष्ट प्रशासनिक मान्यता दी गई थी. आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल, छात्रावास और छात्रवृत्ति की व्यवस्था ने भी शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सशक्तीकरण का रास्ता खोला.

भारतीय संविधान ने बाद में समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को देश के लोकतांत्रिक ढांचे का आधार बनाया. लेकिन आजादी से पहले विभिन्न रियासतों में हुई ऐसी पहलें इस बात की गवाह हैं कि सामाजिक बदलाव की चेतना देश में संविधान लागू होने से पहले भी विकसित हो रही थी. सिंधिया रियासत का यह ऐतिहासिक अध्याय केवल एक राजवंश की उपलब्धियों का उल्लेख नहीं है, बल्कि उस दौर में सामाजिक समानता, शिक्षा और मानवीय गरिमा के लिए किए गए प्रयासों की भी याद दिलाता है.

सौजन्य: सिंधिया रिसर्च सेंटर