किराए पर रहें या अपना घर खरीदें? 25 साल में बदल गया ‘अपने घर’ का पूरा गणित!

किराए पर रहें या अपना घर खरीदें? 25 साल में बदल गया ‘अपने घर’ का पूरा गणित!

हम इक्कीसवीं सदी के 26वें साल में कदम रखने की दहलीज पर खड़े हैं. वक्त की इस रफ्तार के साथ भारतीय मध्य वर्ग की सबसे बड़ी ख्वाहिश यानी ‘अपना घर’ खरीदने का सपना अब पहले जैसा सीधा-सादा नहीं रहा. अगर आप इस नए साल में गृह प्रवेश की योजना बना रहे हैं या फिर किराए के मकान को बदलने की सोच रहे हैं, तो रुकिए और थोड़ा हिसाब-किताब समझिए. साल 2000 में घर खरीदने के जो नियम हुआ करते थे, वे 2025 आते-आते पूरी तरह बदल चुके हैं. पहले जहां सिर्फ बैंक पासबुक और जमा पूंजी देखकर फैसले ले लिए जाते थे, वहीं अब इस पूरी प्रक्रिया में लाइफस्टाइल, आसमान छूती ब्याज दरें और ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ जैसे भारी-भरकम शब्दों ने अपनी जगह बना ली है.

2000 का दौर: जब किराया भरने से बेहतर था घर खरीदना

जरा पीछे मुड़कर साल 2000 के शुरुआती दौर को याद कीजिए. वह समय आज की चकाचौंध से बिल्कुल अलग था. दिल्ली और देश के अन्य महानगरों में एक सामान्य और अच्छा घर 10 से 40 लाख रुपये के बीच आसानी से मिल जाता था. उस दौर की सबसे खास बात यह थी कि होम लोन की ईएमआई (EMI) और मकान के किराए में बहुत ज्यादा अंतर नहीं हुआ करता था.

यही कारण था कि मध्यमवर्गीय परिवारों को किराए की रसीद कटाने के बजाय बैंक की किस्त भरना ज्यादा समझदारी भरा सौदा लगता था. तब बैंकों से कर्ज लेना आज की तरह जटिल नहीं था और डाउन पेमेंट का बोझ भी जेब पर हल्का पड़ता था. उस समय प्रॉपर्टी खरीदना सिर्फ रहने का ठिकाना ढूंढना नहीं था, बल्कि इसे पूंजी या वेल्थ बनाने का सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद रास्ता माना जाता था.

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2008-2009: कैसे बदला रेंट और EMI का संतुलन?

प्रॉपर्टी बाजार की कहानी में असली ट्विस्ट 2008 की वैश्विक मंदी के बाद आया. साल 2010 से 2020 के बीच भारत के रियल एस्टेट सेक्टर ने ऐसी करवट ली कि आम आदमी का बजट डगमगा गया. मेट्रो शहरों में घरों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी कि कीमतें आसमान छूने लगीं. हालात यह हो गए कि दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में एक छोटा सा घर भी अब 50 लाख रुपये से कम में मिलना लगभग नामुमकिन है. वहीं लग्जरी मार्केट की बात करें तो गुड़गांव के डीएलएफ कैमेलियाज़ में फ्लैट्स की कीमतें 73 करोड़ से शुरू होकर 190 करोड़ रुपये तक पहुंच गई हैं.

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अब ‘रेंट और ईएमआई’ के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. बड़े शहरों का गणित अब यह इशारा कर रहा है कि भारी-भरकम ईएमआई का बोझ उठाने से बेहतर किराए पर रहना है. जिस घर की ईएमआई आज 50 हजार रुपये बनती है, ठीक वैसा ही घर आपको 20 से 25 हजार रुपये के किराए पर आसानी से मिल जाता है.

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जितने का घर उससे ज्यादा ब्याज

इस गणित को एक उदाहरण से गहराई से समझिए. मान लीजिए आप आज 1 करोड़ रुपये का फ्लैट खरीदते हैं और इसके लिए बैंक से 80 लाख रुपये का होम लोन लेते हैं. अगर ब्याज दर 9% है और आप 20 साल के लिए लोन लेते हैं, तो आपको हर महीने करीब 72,000 रुपये की ईएमआई देनी होगी.

हैरान करने वाला आंकड़ा यह है कि 20 साल के अंत में आप बैंक को कुल मिलाकर लगभग 1.73 करोड़ रुपये चुकाते हैं. इसमें से करीब 93 लाख रुपये तो सिर्फ ब्याज के तौर पर आपकी जेब से निकल जाते हैं. सरल शब्दों में कहें तो आप जितने रुपये में घर खरीदते हैं, लगभग उतनी ही रकम ब्याज के रूप में बैंक को दे देते हैं. अगर लोन की अवधि 20 से बढ़ाकर 30 साल कर दी जाए, तो ब्याज की रकम घर की असली कीमत से भी ज्यादा हो जाएगी. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ, रेंटल यील्ड (किराया वापसी) महज 3.5% से 5% के बीच है, जो निवेश के लिहाज से बहुत आकर्षक नहीं है.

मकान खरीदने का सही समय कब?

आज के दौर में ‘वन साइज फिट्स ऑल’ यानी एक ही नियम सब पर लागू नहीं होता. किराए का घर आपको शहर और नौकरी बदलने की आजादी देता है, जबकि अपना घर एक भावनात्मक सुरक्षा का अहसास कराता है. वित्तीय विशेषज्ञ सीए कौशिक की सलाह है कि घर खरीदने का फैसला जज्बातों में बहकर न करें. मकान तभी खरीदें जब आप उस शहर या उस घर में कम से कम 7 से 10 साल तक रहने का पक्का इरादा रखते हों.

आपकी फाइनेंशियल प्लानिंग ऐसी होनी चाहिए कि ईएमआई किसी भी हाल में आपकी मासिक सैलरी के 25-30% से ज्यादा न हो. सबसे अहम बात यह है कि घर की बुकिंग से पहले एक मजबूत इमरजेंसी फंड तैयार रखें, ताकि भविष्य में अगर कोई मुश्किल आए तो लोन का बोझ आपको दबा न सके. अपना घर होना गलत नहीं है, लेकिन बिना सही गणित के गलत समय पर लिया गया फैसला आपकी पूरी आर्थिक सेहत को बिगाड़ सकता है.

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