महंगी दवाओं और दवा कंपनियों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए केंद्र सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश दिया है. यह समिति दवा कंपनियों की मार्केटिंग के तौर तरीकों को रेगुलेट करने के मद्देनजर वैधानिक नियम बनाने पर अपनी सिफारिशें देगी. सर्वोच्च अदालत ने दवाओं की आसमान छूती कीमतों और डॉक्टरों को महंगे तोहफे देकर खास दवाएं लिखवाने वाली फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग पर यह रुख अपनाया है.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले पर केंद्र सरकार को विशेषज्ञ समिति का गठन करने का आदेश दिया. ताकि दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग के तरीकों पर रोक लगायी जा सके. बेंच ने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को विनियमित करने के लिए वैधानिक नियम बनाने को लेकर अपनी सिफारिशें देगी.
यह कमेटी डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएं, हॉस्पिटैलिटी या अन्य आर्थिक फायदे देने जैसी अनैतिक गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त कानूनी प्रावधानों का खाका तैयार करेगी. कमेटी इस गंभीर मुद्दे पर आम जनता, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं के सुझावों व आपत्तियों को सुनने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपेगी.
अगली सुनवाई और सरकार का कदम
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस आदेश पर की गई कार्रवाई को लेकर कोर्ट में एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को तय की है, जहां सरकार को कमेटी के गठन और नियमों की प्रगति की जानकारी देनी होगी.
सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में पहले सुनवाई के दौरान कहा था कि दवाओं के खरीद मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच के भारी अंतर पर गहरी चिंता जताई थी. तब कोर्ट ने एक उदाहरण देते हुए कहा था कि जो दवा रिटेलर को ₹2,700 में मिलती है, उसकी MRP ₹27,000 डाल दी जाती है. इस 10 गुना मुनाफे को बेंच ने आम जनता और मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती करार दिया था.
साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं के मुनाफे के मार्जिन को Drugs Order, 2013 के तहत 16% पर कैप क्यों नहीं किया जा सकता.
याचिकाकर्ता की क्या मांग है?
यह पूरा मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था. याचिका में आरोप लगाया गया था कि कंपनियां अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों पर भारी दबाव डालती हैं और उन्हें प्रलोभन देती हैं, जिससे डॉक्टर मरीजों को महंगी और गैरजरूरी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, जिससे नागरिकों के ‘राइट टू हेल्थ’ का हनन होता है.



