ये कहानी है हिमालय में बसी उस दुनिया की जहां कणकण में कुदरत की कारीगरी नजर आती है. जहां नजर आती है वो दुनिया जो आपने शायद सपनों में देखी होगी. ये दुनिया बसी है 14100 फीट की ऊंचाई पर और वहां होता है हरे भरे पहाड़ों का सूखे रेगिस्तान से मिलन. इस जादुई दुनिया में आपको पहाड़ मिलेंगे, जंगल मिलेंगे, घास के मैदान मिलेंगे, फूलों की चादर मिलेंगी, बर्फीली चोटियां मिलेंगी और मिलेगा हिमालय का रेगिस्तान. हिमालय में बसे इस इलाके का नाम है हम्पता पास जिसे हिमालय का जादुई दरवाजा भी कहा जाता है.

ये है इंडिया के सबसे खूबसूरत ट्रैक्स में से एक जो कि हिमाचल के कुल्लू की हरीभरी वादियों को लाहौल और स्पीति से जोड़ता है. आइए आपको बताते हैं कैसे आप इस खूबसूरत जगह पहुंच सकते हैं. कैसे आप कुदरत के इस चमत्कार को अपनी आंखों से देख सकते हैं.

कहां है हम्पता पास?

हिमालय की पीर पंजाल पर्वत श्रृखलाओं में हम्पता पास बसा है और यहां पहुंचने के लिए सबसे पहले आपको आना होता है मनाली. ये जगह भारतीयों के बीच काफी पॉपुलर है. खासतौर पर उत्तर भारतीय अकसर अपनी छुट्टियां मनाने मनाली पहुंचते हैं. लेकिन वो लोग इस बात से अनजान होते हैं कि मनाली से लगभग 20 किमी. दूर एक जोबरा से शुरू होता है एक ऐसा ट्रैक जो आपको कुदरत के बेहद करीब लेकर जाता है.

जी हां हम्पता पास जाने के लिए सबसे पहले पहुंचना होता है जोबरा गांव और फिर वहां से शुरू होती है ट्रैकिंग. जोबरा गांव पर सड़क खत्म हो जाती है और उसके आगे जाने के लिए आपको ट्रैक करना होता है.

जोबरा से चीका का सफर

जोबरा गांव से शुरू होता है हम्पता पास का सफर और पहले दिन का पड़ाव होता है चीका. जोबरा से चीका की दूरी लगभग 3 किमी. है और इसके हम्पता पास का पहला बेस कैंप कहा जाता है. नदी पर बने लकड़ी के पुल, हरेभरे जंगल को पार कर आप पहुंचते हैं एक ऐसी जगह जहां पेड़ खत्म होने लगते हैं और आपको मिलते हैं हरेहरे घास के मैदान. चीका तक पहुंचने में लगभग 4 से 5 घंटे लगते हैं और यहां आपको कैंप में रात बितानी होती है. चीका कैंपसाइट रानी नाला नदी के किनारे बनी हुई है और यहां पर बना एक सुंदर सा झरना इस जगह की खूबसूरती पर चार चांद लगा देता है. चीका की एक और खास बात है यहां दिन में मौसम सही रहता है लेकिन सूरज ढलते ही इस जगह का पारा काफी तेजी से नीचे गिरता है.

चीका से बालू का घेरा

चीका में रात बिताने के बाद अगले दिन आपको जाना होता है बालू का घेरा. ये हम्पता पास पहुंचने की सबसे मुश्किल चुनौती माना जाता है. वो इसलिए क्योंकि बालू का घेरा पहुंचने के लिए आपको 10 किमी. की खड़ी चढ़ाई चढ़नी होती है. अच्छेखासे फिट लोगों की हिम्मत इस रास्ते पर टूटती नजर आती है. लेकिन अगर आप तैयारी के साथ जाएं, खुद पर भरोसा रखें और हार ना मानने का जज्बा अगर आपमें हो तो यहां पहुंचने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी. चीका से निकलते ही आपको एक पतले लकड़ी के पुल से नदी के पार जाना होता है और लगभग 2 किमी. चलने के बाद आप पहुंच जाते हैं ज्वारा जो कि बेहद ही खूबसूरत जगह है. बालू का घेरा पहुंचने में आपको लगभग 7 से 8 घंटे तक लग सकते हैं.

इस रास्ते पर थकान जरूर होगी लेकिन जब आप यहां मौजूद नदी, जंगल और बर्फ से लदे पहाड़ों को दिखेंगे तो आपको आगे बढ़ने का हौसला भी मिलता रहेगा. बालू का घेरा पहुंचने से पहले सबसे बड़ी चुनौती है एक नदी की धारा को पार करना जो कि ज्वारा और बालू का घेरा के बीच में पड़ती है.

इस धारा को पार करने के लिए आपको खुद नदी में उतरना होता है. ये पानी इतना ठंडा होता है कि कई लोग इसे सह तक नहीं पाते. हालांकि इसे पार करना नामुमकिन भी नहीं और ज्यादातर लोग इसे पार कर शाम 4 से 5 बजे तक बालू का घेरा पहुंच जाते हैं.

बालू का घेरा की खासियत

बालू का घेरा एक ऐसा मैदान है जहां चारों ओर आपको बालू ही बालू मिलेगी. इस मैदान के किनारे बहती है रानी नाला नदी और यहां पर आपको मिलेंगे बर्फीले ग्लेशियर जो पत्थरों की तरह सख्त होते हैं. बालू का घेरा तक पहुंचने के लिए आपको इन ग्लेशियरों को भी पार करना होता है लेकिन यकीन मानिए ये तो बस ट्रेलर होता है क्योंकि हम्पता पास ट्रैक का तीसरा दिन आपको इन ग्लेशियर्स पर चलकरफिसलकर ही पार करना होता है.

बालू का घेरा में रात का तापमान 0 डिग्री से नीचे जाता है और बारिश समझिए यहां दिनभर होती रहती है. बालू का घेरा में रात बेहद खास होती है. यहां ठंड तो होती है लेकिन रात में यहां आप तारों की चादर देक सकते हैं. बेहद ऊंचाई पर बसे होने के कारण यहां तारे बेहद साफसाफ नजर आते हैं.

हम्पता पास होते हुए शेया गोरू कैंप

हम्पता पास ट्रैक का तीसरा दिन सबसे ज्यादा मुश्किल माना जाता है. इस दिन आप 14100 फीट की ऊंचाई पर पहुंचते हैं जहां कई लोगों के लिए सांस तक लेना मुश्किल होता है. बालू का घेरा से शेया गोरू कैंप पहुंचने में लगभग 10 घंटे लगते हैं और ये ट्रैक लगभग 10 किमी. है. ये ट्रैक इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि यहां पहुंचने के लिए आपको बर्फ पर ही चलना पड़ता है. इस ट्रैक की शुरुआत होती है बालू के मैदान से और फिर शुरू होती है बर्फीली चढ़ाई.

यहां चढ़ाई करते हुए फिसलना बेहद आम होता है, इसलिए इसके लिए अच्छे जूते और साथ में एक स्टिक की जरूरत होती है जो आपको सहारा देती है. लगभग 78 घंटे में आप पहुंच जाते हैं हम्पता पास जो इस ट्रैक का सबसे ऊंचा प्वाइंट है. इस पूरे ट्रैक पर आपको गजब के हिमालयन व्यूज मिलते हैं लेकिन फिर शुरू होती है बेहद खतरनाक ढलान.

हम्पता पास से शेया गोरू पहुंचने के लिए आपको उतरना होता है. यकीन मानिए हिमालयी ट्रैक पर चढ़ने से ज्यादा उतरना ज्यादा जोखिम भरा होता है. क्योंकि उतरते हुए अगर पांव फिसला तो गंभीर चोट लग सकती है. इसलिए यहां बहुत संभलकर उतरना होता है.

चतारू कैंप और चंद्रताल के दर्शन

बॉलीवुड फिल्म ‘लुटेरा’ में रणवीर सिंह एक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा से कहते नजर आते हैं कि वो मरने से पहले एक बार चंद्रताल देखना चाहते हैं और हम्पता पास ट्रैक पर आपको वही चंद्रताल देखने को मिलती है. चंद्रताल यानी चंद्रमा की झील जो हिमालय की चोटियों के बीच बसी है. ये झील लाहौल स्पीति जिले में 4300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और अगर आप हम्पता पास ट्रैक पर आए हैं तो इस झील के दर्शन किए बिना वो पूरा नहीं होता.

शेया गोरू कैंप साइट से सुबहसुबह आप चतारू के लिए निकलते हैं और लगभग 5 किमी. चलने के बाद आप पहुंच जाते हैं लाहौलस्पीति जिले के रेतीले पथरीने रेगिस्तान में. चतारू सड़क किनारे बसा है और यहां से आप ट्रैवलर या एसयूवी कार से चंद्रताल के लिए निकलते हैं जो कि लगभग 70 से 75 किमी. दूर है.

चंद्रताल क्यों है खास

चंद्रताल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये चांद की आकृति की है. ऊंचाई से देखने पर ये चांद जैसी लगती है. चंद्रताल से ही लाहौल स्पिति में बहने वाली चंद्रा भागा नदी निकलती है और आगे चलकर ये नदी चेनाब बनती है. चंद्रताल का रंग दिनभर में कई बार बदलता है. कभी ये नीले रंग की नजर आती है तो कभी इसका रंग हरा होता है. आसपास खड़ी बर्फीली चोटियों की परछाई इसपर पड़ती है तो ये ताल और ज्यादा खूबसूरत नजर आता है.

चंद्रताल पर समय बिताने के बाद आप वापस चतारू लौटते हैं और अगर समय हो तो मनाली भी लौटा जा सकता है. तो ये है जादुई हम्पता पास ट्रैक की यात्रा जो कि हरे भरे जंगलो से शुरू होकर बर्फीले पहाड़ों से होते हुए स्पीति की पथरीली और रेतीली जमीन पर जाकर खत्म होती है. जिंदगी में एक बार कुदरत के इस करिश्मे को देखना तो बनता है.