1922 के राजद्रोह के उस ऐतिहासिक मुक़दमे में अभियुक्त महात्मा गांधी थे. जज थे सी.एन. ब्रूमफील्ड. गांधी जज से कह रहे थे कि उन पर राजद्रोह का जो आरोप लगाया गया, वह उनके लिए अपराध नहीं बल्कि उनका सर्वोच्च कर्तव्य है. उनके खिलाफ मुक़दमे की वजह यंग इंडिया अखबार में असहयोग आंदोलन के दौरान उनके लिखे वे तीन लेख थे, जिसमें ब्रिटिश शासन की तीखी आलोचना की गई थी.

सरकार ने इन लेखों को राजद्रोह माना और गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला लिया. उस दौर में न्यायपालिका की क्या स्थिति थी, इसे लेकर गांधी को कोई दुविधा नहीं थी. लेकिन खिलाफ फैसले की फिक्र किए बिना उन्होंने मुकदमे की कार्यवाही के बहिष्कार की जगह अदालत को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जनता की नाराजगी प्रकट करने के प्रभावी मंच के तौर पर इस्तेमाल किया था.
मुकदमा Great Trial of 1922 नाम के फेमस हुआ
गांधी की गिरफ्तारी और उन पर चला मुकदमा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे ऐतिहासिक घटनाओं में गिना जाता है. यह मुकदमा Great Trial of 1922 के नाम से प्रसिद्ध है. गांधी ने अपनी गिरफ्तारी से लेकर अदालत की पूरी कार्यवाही तक को ब्रिटिश शासन और उसके दमनकारी कानूनों को बेनकाब करने के एक प्रभावशाली मंच में बदल दिया था।
उन्होंने आरोपों को स्वीकार करते हुए भी किसी तरह की दया या रियायत मांगने से साफ इनकार कर दिया। इसके जरिए गांधी ने ब्रिटिश सरकार को सीधी चुनौती दी और यह संदेश दिया कि भारत अब अन्याय और दमन को और अधिक सहन करने के लिए तैयार नहीं है।
अदालत में गांधी हमेशा की तरह शांत, सौम्य और विनम्र दिखाई दिए, लेकिन उनके शब्दों की दृढ़ता और आत्मविश्वास ने जज को भी प्रभावित कर दिया। यही कारण था कि फैसला सुनाते समय न्यायाधीश खुद असहज और दुविधा में नजर आए।
कानून गलत तो जज दें इस्तीफा; सही तो दें अधिकतम सजा
इस मुकदमे में गांधी ने अपने विरुद्ध लगे आरोपों को स्वीकार करते हुए कहा था कि उन्होंने जो लिखा वह जानबूझकर लिखा. यदि उनके विचारों को अपराध माना जाता है तो वे इस अपराध के लिए सबसे कठोर दंड पाने के लिए तैयार हैं.
महात्मा गांधी. फोटो: Getty Images
जज ब्रूमफील्ड एक ऐसे अभियुक्त से मुखातिब थे जो किसी रहम की जगह पूरी दृढ़ता से कह रहा था, आपके सामने दो रास्ते हैं—अगर आपको लगता है कि राजद्रोह का यह कानून गलत है तो अपने पद से इस्तीफा दे दें. और अगर आप मानते हैं कि कानून सही है तो मुझे अधिकतम दंड दें. अभियोजन अपना पक्ष रख चुका था. गांधी ने बचाव में अपने लेखों को सही ठहराया था. वे सजा को निमंत्रण दे रहे थे. जज ब्रूमफील्ड के लिए यह फैसला चुनौती बन गया था.
उसने लिखा, कानून के अनुसार आपको एक अपराधी मानना मेरा कर्तव्य है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आपके जैसे व्यक्ति इस अदालत के सामने पहले कभी नहीं आए.आप करोड़ों भारतीयों के लिए एक महान देशभक्त और नेता हैं. यहां तक कि जो लोग आपकी राजनीति से सहमत नहीं हैं, वे भी आपको उच्च आदर्शों वाला व्यक्ति मानते हैं.
फिर जज ने अपनी मजबूरी बयां की, “लेकिन अदालत कानून से बंधी है और इसलिए उसे दंड देना पड़ेगा.” फिर जज ने गांधी को 6 वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी.



