भारत में सूखे ने किसानों के सामने फसल बर्बादी से लेकर अगली फसल की बुवाई तक का संकट खड़ा कर दिया है. आईआईटी गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के मुताबिक, 16 सितंबर 2026 तक देश के 52.5% हिस्से में सूखे या सूखे जैसी स्थिति थी. वहीं, 2026 में मानसून के दौरान बारिश की कमी ने खेती पर दबाव बढ़ा दिया. देश में कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां इसकी मार काफी पड़ी है. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फसलों को ज्यादा नुकसान हुआ है, जिसका नतीजा यह है कि किसानों ने फसलों पर जो पैसा खर्च किया है वह डूब रहा है. खेती के लिए जो कर्ज लिया था उसे चुकाने की चुनौती बढ़ रही है.

सूखे की मार कितनी बड़ी है?
सूखे का असर देश के कई हिस्सों में खेती और ग्रामीण आजीविका पर दिखाई दे रहा है. 16 सितंबर तक देश का 52.5% हिस्सा सूखे या सूखे जैसी स्थिति से प्रभावित था. अगर इसके महीने पहले का डेटा देखा जाए तो यह करीब 38 फीसदी था. महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में किसानों को खास तौर पर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाड़ा के इलाकों में सोयाबीन और कपास की फसल को नुकसान पहुंचा है. कर्नाटक में शुरुआती आकलन के मुताबिक, 101 तालुकों में फसल नुकसान करीब 18,000 करोड़ रुपये आंका गया. वहीं, आंध्र प्रदेश में जून से अगस्त के बीच सामान्य से 53.4% कम बारिश दर्ज की गई. राज्य सरकार ने 21 जिलों के 388 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया, जिनमें 283 मंडलों को गंभीर रूप से प्रभावित बताया गया. फसल खराब होने से किसानों की कमाई घट रही है और खेतों में काम कम मिलने से ग्रामीण मजदूरों की आमदनी पर भी असर पड़ रहा है.
किसान की कमाई से ज्यादा खेती पर खर्च
सूखे की वजह से किसानों के सामने सबसे बड़ी परेशानी खेती की लागत निकालने की है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के यवतमाल में किसान चितामन विट्ठल भोयर ने अपनी खेती पर करीब 2.75 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन फसल से लगभग 90 हजार रुपये की कमाई होने का अनुमान है. सामान्य साल में उनके खेत से करीब 25 क्विंटल सोयाबीन पैदा होता था, जबकि इस बार उत्पादन केवल 5 क्विंटल रहने की आशंका है. कपास की पैदावार भी काफी घट गई है.
नुकसान सिर्फ फसल तक सीमित नहीं है. चारे की कमी के कारण भोयर को 70 हजार रुपये में खरीदे गए बैल करीब 40 हजार रुपये में बेचने पड़े. यानी किसान को तत्काल जरूरतें पूरी करने के लिए अपनी खेती की संपत्ति भी बेचनी पड़ रही है. महाराष्ट्र के बीड में एक अन्य कपास किसान ने 10 एकड़ जमीन पर खेती के लिए करीब 2.5 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन उसे फसल मिलने की उम्मीद नहीं है. ऐसी स्थिति में किसान के सामने पुराने कर्ज का भुगतान, परिवार का खर्च और बच्चों की पढ़ाई जारी रखने जैसी चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं.
सरकारी मदद का ऐलान और जमीन पर उसका असर
सूखे से परेशान किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकारों ने आर्थिक मदद और रोजगार से जुड़ी योजनाओं का ऐलान किया है. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की 358 में से 305 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया और किसानों को 5,000 रुपये की सहायता देने की घोषणा की. हालांकि, 19 अक्टूबर तक इस मदद के लिए जरूरी दिशानिर्देश लंबित थे. इसके अलावा, नमो शेतकरी योजना के तहत पात्र किसानों की 4,000 रुपये की दो किस्तों का भुगतान भी बाकी था. इससे राहत की घोषणा और किसानों के खातों में पैसा पहुंचने के बीच का अंतर सामने आता है.
महाराष्ट्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार और आजीविका के लिए 6,728 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया. राज्य में रोजगार गारंटी के तहत काम मांगने वाले परिवारों की संख्या जुलाई में 4.02 लाख से बढ़कर सितंबर में 4.93 लाख हो गई. यह खेती से कमाई घटने के बीच ग्रामीण परिवारों की बढ़ती रोजगार जरूरत को दिखाता है. कर्नाटक सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए 2,500 रुपये की इनपुट सब्सिडी की घोषणा की और केंद्र से भी आर्थिक मदद मांगी. हालांकि, राहत का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पैसा समय पर मिलता है या नहीं और किसानों को रोजगार के बदले मजदूरी कितनी जल्दी मिलती है.
अगली फसल के लिए पैसा कहां से आएगा?
किसानों के सामने अब रबी की फसल की बुवाई का खर्च जुटाने की चुनौती है. खरीफ की फसल में नुकसान होने के बाद उनके पास बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई के लिए पर्याप्त पैसा नहीं बचा है. वहीं, पिछली फसल के लिए लिया गया कर्ज भी चुकाना है. ऐसे में अगली फसल उगाने के लिए किसानों को दोबारा कर्ज लेना पड़ सकता है. अगर समय पर पैसा नहीं मिला, तो बुवाई में देरी या खेती का रकबा कम करने की नौबत आ सकती है.
सूखे का असर खेतों में काम करने वाले मजदूरों पर भी पड़ता है. फसल खराब होने से कटाई और दूसरे कृषि कार्यों में रोजगार घटता है. महाराष्ट्र के कुछ गांवों से लोगों के काम की तलाश में पलायन करने की खबरें भी सामने आई हैं. ऐसे में मनरेगा जैसी रोजगार योजनाएं ग्रामीण परिवारों के लिए मददगार हो सकती हैं. लेकिन सिर्फ बजट तय कर देना पर्याप्त नहीं है. किसानों और मजदूरों को समय पर भुगतान मिलना जरूरी है, ताकि वे घरेलू खर्च के साथ अगली फसल की तैयारी भी कर सकें.
पानी की कमी कितनी गंभीर है?
अगली फसल की बुवाई के लिए पैसे के साथ पानी भी जरूरी है. केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 70.89% पानी था. पिछले 10 साल के औसत में इस समय जलाशयों में 81.41% पानी रहता था. यानी जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे था.
दक्षिण भारत में स्थिति और गंभीर थी. यहां जलाशयों में पानी का भंडार पिछले 10 साल के औसत से 38.59% कम था. 22 अक्टूबर के आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण भारत के 50 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 42.34% पानी बचा था, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह स्तर 89.35% था. पानी की इस कमी से सिंचाई पर दबाव बढ़ सकता है.
सूखे की मार किसानों के लिए सिर्फ एक फसल की बर्बादी नहीं, बल्कि उनकी पूरी आर्थिक व्यवस्था पर संकट है. खेती की लागत डूबने, कर्ज चुकाने और अगली फसल के लिए पैसे जुटाने के बीच पानी की कमी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. ऐसे में समय पर मुआवजा, रोजगार के अवसर और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी जरूरी हैं. अगर किसानों को अगली बुवाई से पहले मदद नहीं मिली, तो सूखे का असर आने वाले कृषि सीजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.



