इनकम टैक्स विभाग ने डेटा एनालिटिक्स और अन्य तकनीकी टूल्स की मदद से ऐसे करीब 15,000 से 20,000 मामलों की पहचान की है, जहां लोगों ने अपनी टैक्स योग्य आय कम दिखाने और कम टैक्स चुकाने के लिए कथित तौर पर स्वैपिंग प्रोविजन्स का इस्तेमाल किया है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम फर्जी टैक्स दावों पर लगाम लगाने की विभाग की मुहिम का हिस्सा है. इसी क्रम में विभाग ने नियोक्ताओं से भी संपर्क किया है और उनसे कर्मचारियों की सैलरी पर काटे गए TDS से जुड़े फॉर्म 24Q में किसी भी तरह की गड़बड़ी की जांच करने को कहा है.

क्या है मामला?

टैक्स विभाग उन मामलों पर कार्रवाई की तैयारी कर रहा है, जहां करदाताओं ने मूल आयकर रिटर्न और बाद में दाखिल किए गए संशोधित या अपडेटेड ITR में टैक्स छूटों और कटौतियों को बदल दिया.

उदाहरण के तौर पर, कुछ कर्मचारियों ने अपने मूल ITR में हाउस रेंट अलाउंस पर बड़ी छूट का दावा किया था, लेकिन बाद में उसे हटाकर आयकर अधिनियम की धारा 10 के तहत मिलने वाली अन्य भत्तों की छूट का दावा कर दिया. इस धारा में यात्रा, शिक्षा या पहाड़ी क्षेत्रों में काम करने से जुड़े कुछ विशेष भत्ते शामिल हैं.

इसी तरह कुछ मामलों में करदाताओं ने राजनीतिक दलों को दिए गए दान की जगह अपडेटेड ITR में रिसर्च संस्थानों को दिए गए दान का दावा कर दिया.

रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे संदिग्ध दावों के लिए विभाग की आंतरिक जांच सीमा 50,000 रुपये से 1 लाख रुपये के बीच है और अब तक 15,000 से 20,000 मामलों की पहचान की जा चुकी है.

पहले मौका, फिर कार्रवाई

टैक्स अधिकारियों का कहना है कि इन मामलों की जांच की जा सकती है ताकि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई हो सके. हालांकि, किसी सख्त कदम से पहले विभाग अपनी नज कैंपेन चलाएगा, जिसके तहत करदाताओं को अपनी गलती सुधारने का मौका दिया जाएगा. गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है.

क्या होती है स्वैपिंग?

चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश सुराना के अनुसार, स्वैपिंग उस स्थिति को कहा जाता है जब कोई करदाता एक ऐसे टैक्स दावे को वापस ले लेता है जो सही साबित नहीं किया जा सकता और उसकी जगह कोई दूसरी छूट या कटौती केवल टैक्स लाभ लेने के उद्देश्य से जोड़ देता है.

उनका कहना है कि ऐसा करना सही नहीं है क्योंकि आयकर कानून की हर छूट और कटौती का अपना अलग उद्देश्य, पात्रता, सीमा और दस्तावेजी शर्तें होती हैं.

HRA और धारा 10 एकदूसरे का विकल्प नहीं

उदाहरण के लिए, धारा 10 के तहत HRA छूट तभी मिलती है जब कर्मचारी वास्तव में किराया दे रहा हो, उसे सैलरी में HRA मिल रहा हो और वह तय नियमों को पूरा करता हो.

वहीं धारा 10 केवल उन विशेष भत्तों पर लागू होती है जो नियोक्ता किसी खास खर्च या परिस्थिति के लिए देता है. इसलिए कोई व्यक्ति बिना उचित आधार और दस्तावेजों के एक दावे की जगह दूसरा दावा नहीं कर सकता.

ऐसा करने पर क्या हो सकता है?

सुराना के मुताबिक, अगर किसी दावे के पीछे वास्तविक तथ्य नहीं हैं तो विभाग इसे गलत या कृत्रिम दावा मान सकता है. आजकल आयकर विभाग फॉर्म 16, AIS/TIS डेटा, नियोक्ता द्वारा दी गई सैलरी जानकारी और पुराने रिटर्न के पैटर्न का विश्लेषण करके गड़बड़ियों का पता लगा रहा है.

यदि किसी व्यक्ति का दावा उसके नियोक्ता के रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता या असामान्य लगता है, तो उसे नोटिस, जांच, पुनर्मूल्यांकन या स्क्रूटनी का सामना करना पड़ सकता है.

200% तक लग सकता है जुर्माना

गलत दावा करने पर अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और जुर्माना देना पड़ सकता है. गंभीर मामलों में इसे आय कम बताने या गलत जानकारी देने की श्रेणी में रखा जा सकता है.

सुराना के अनुसार, आयकर अधिनियम 2025 की धारा 439 के तहत देय टैक्स का 200% तक जुर्माना लगाया जा सकता है. इसके अलावा टैक्स और ब्याज भी अलग से देना होगा.

अगर पहले से गलती हो गई है तो क्या करें?

यदि किसी करदाता ने पहले ही गलत या फर्जी कटौती का दावा कर लिया है और संशोधित या अपडेटेड ITR दाखिल करने की समयसीमा खत्म हो चुकी है, तो विकल्प सीमित रह जाते हैं. फिर भी नुकसान कम करने के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं.

1. सही टैक्स और ब्याज तुरंत जमा करें

भले ही रिटर्न सुधारने की समयसीमा खत्म हो गई हो, करदाता को सही आय की गणना करके अतिरिक्त टैक्स और ब्याज जल्द से जल्द जमा कर देना चाहिए. इससे उसकी सद्भावना और स्वैच्छिक अनुपालन दिखता है.

2. आयकर विभाग से विशेष अनुमति मांगें

करदाता धारा 239 ) के तहत आवेदन देकर समयसीमा के बाद रिटर्न में सुधार की अनुमति मांग सकता है. हालांकि इसकी मंजूरी पूरी तरह विभाग के विवेक पर निर्भर करेगी.

3. नोटिस मिलने पर पूरा सहयोग करें

यदि विभाग को गड़बड़ी मिलती है और नोटिस जारी होता है, तो करदाता को पूरी जानकारी देनी चाहिए और गलत दावे को वापस लेना चाहिए.

4. स्वैच्छिक खुलासा कर जुर्माना कम कराने की कोशिश करें

कई मामलों में देखा गया है कि यदि नोटिस जारी होने से पहले ही करदाता टैक्स और ब्याज चुका देता है, तो उसके पास जुर्माना कम कराने या उसका विरोध करने का बेहतर आधार होता है.