
कुर्बानी के लिए दुआ के मतलब का एक हिस्सा ये भी है- बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना- सब अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है. उसका कोई साझीदार नहीं.
बकरीद का त्योहार
बकरीद का त्योहार हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने के मैसेज को याद दिलाता है. हर साल मुसलमान इस दिन जानवरों की कुर्बानी देते हैं.
कुर्बानी से पहले खास शब्द पढ़े जाते हैं
कुर्बानी से पहले जानवर पर कुछ खास शब्द पढ़े जाते हैं, जो इस अमल के लिए सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि पूरी तरह अल्लाह के प्रति समर्पित बना देते हैं. यह दुआ इंसान को याद दिलाती है कि कुर्बानी सिर्फ मांस के लिए नहीं, बल्कि दिल की नीयत और आज्ञाकारिता के लिए है.
कुर्बानी से पहले की दुआ
कुर्बानी से पहले और कुर्बानी करते वक्त की दो दुआएं हैं. कुर्बानी से पहले की दुआ (Inni wajjahtu wajhiya…) का मतलब है- “मैं अपना रुख उस अल्लाह की तरफ करता हूं जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया. मैं पूरी तरह उसी का हो गया हूँ और शिर्क करने वालों में से नहीं हूं. बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना- सब अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है. उसका कोई साझीदार नहीं. मुझे इसी का हुक्म दिया गया है और मैं उसी का फ़रमांबरदार हूं. ऐ अल्लाह! यह कुर्बानी तेरी तरफ से मिली हुई है और तेरे ही लिए है. और इसे हज़रत मुहम्मद और उनकी उम्मत की तरफ से क़ुबूल फ़रमा.”
कुर्बानी करते वक़्त पढ़ी जाने वाली दुआ
इसके बाद कुर्बानी करते वक़्त – “बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर” के बाद Allahumma taqabbalhu minni… दुआ पढ़ी जाती है. जिसका मतलबहै “अल्लाह के नाम से, अल्लाह सबसे बड़ा है.” “ऐ अल्लाह! मेरी इस कुर्बानी को क़ुबूल फ़रमा, जैसे तूने अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद और अपने ख़लील हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी क़ुबूल फ़रमाई थी.”
अन्य दुआ
AlMustafaTrust.org के मुताबिक कुछ समुदायों में इन्ना सलाती व नुसुकी व महयाया व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन… दुआ भी पढ़ी जाती है, जिसका मतलब है मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मरना सब अल्लाह रब्बुल आलमीन के लिए है, उनका कोई साझीदार नहीं. यह दुआ बताती है कि जीवन का हर पहलू अल्लाह के लिए समर्पित है.
कुर्बानी में जानवर नहीं बल्कि इच्छाओं की
muslimaid.org इस दुआ का गहरा मतलब है कि कुर्बानी में जानवर नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं, गलतियों और नफ्स की कुर्बानी होती है. हज़रत इब्राहीम ने बेटे की कुर्बानी की नीयत की तो अल्लाह ने भेड़ भेज दी, लेकिन नीयत कबूल हुई. आज भी यही नीयत मायने रखती है.
कुर्बानी का तरीका
कुर्बानी का तरीका भी खास है. जानवर को दाहिनी तरफ लिटाकर, तेज़ चाकू से गले की नसें काटते हुए दुआ पढ़ी जाती है. कोशिश की जाती है जानवर को कम से कम तकलीफ हो. कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है – परिवार, रिश्तेदार और गरीबों के लिए.
कुर्बानी की स्वीकृति
कुर्बानी की स्वीकृति अल्लाह की मर्जी पर निर्भर करती है, न कि सिर्फ रस्म पर. सही नीयत, पाक-साफ तरीका और दुआ से यह इबादत पूरी होती है. सच्ची कुर्बानी दिल से होती है.



