भारत को मंदिरों का देश कहना गलत नहीं होगा। यहां हजारों साल पुरानी आध्यात्मिक परंपराएं हैं और लगभग हर शहर, कस्बे और गांव में कोई न कोई मंदिर जरूर मिलता है। यहां हर क्षेत्र की अपनी अलग शैली, परंपरा और देवीदेवता की उपासना की पद्धति होती है। उत्तर भारत के नागर शैली मंदिर, दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के भव्य गोपुरम वाले मंदिर और पूर्वी भारत की कलिंग शैली, सब अपनी अलग और खास पहचान रखते हैं। तीर्थ यात्रा सीरीज में हम भारत के किसी न किसी मंदिर के इतिहास, मान्यता, आरती समय से लेकर आसपास की घूमने की जगहों के बारे में बताते हैं। इस सीरीज में आपको पूरी ट्रैवल गाइड मिलती है। इस कड़ी में हम आपके लिए लेकर आए हैं केदारनाथ धाम की यात्रा कैसे करें, इतिहास, मान्यता और अन्य सारी जानकारी।

केदारनाथ मंदिर बंद होने के बाद कौन करता है पूजा, मान्यता, इतिहास और आसपास घूमने की जगहें, यहां देखें पूरा ट्रैवल गाइड
केदारनाथ मंदिर बंद होने के बाद कौन करता है पूजा, मान्यता, इतिहास और आसपास घूमने की जगहें, यहां देखें पूरा ट्रैवल गाइड

भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग हैं और हर एक की अपनी विशेषता, महत्व और धार्मिक मान्यताएं। इनमें से एक केदारनाथ ज्योतिर्लिंग भी है, जो हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। बाबा केदारनाथ धाम का कपाट 6 महीने तक बंद रहने के बाद अप्रैल में फिर से दर्शन के लिए खोल दिया गया है। ऐसे में आइए जानते हैं यहां कैसे पहुंचे और अन्य मंदिर से जुड़ी बातें।

मान्यता
केदारनाथ को लेकर मान्यता है कि यहां आरंभ और अंत एक साथ आकर मिलते हैं। यहां भगवान शिव के होने का एहसास मिलता है। शिव पुराण की कोटी रुद्र संहिता में वर्णन मिलता है कि, जो मनुष्य केदारनाथ की यात्रा भाव से जा रहा है और मार्ग पर चलते समय किसी कारण उसकी मृत्यु हो जाती है तो उसे भी मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में बताया गया है कि, जो मनुष्य केदारनाथ के दर्शन करता है और वहां मौजूद कुंड का जल पान करता है वह भी जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

मंदिर का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि ने अपनी घोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान ने उन्हें दर्शन दिए तब नर और नारायण ने उनसे वरदान में मांगा कि वह ज्योतिर्लिंग रूप में सदा के लिए यहां पर वास कर जाएं। उनका वरदान पूरा करते हुए महादेव केदारनाथ में ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए वास कर गए।


पंच केदार और पांडवों से जुड़ी कहानी
श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समितिउत्तराखण्ड वेबसाइट के अनुसार, उत्तराखंड के चमोली जिले में ही भगवान शिव के 200 से अधिक मंदिर हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण केदारनाथ है। पौराणिक कथा के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद पांडवों को अपने ही सगेसंबंधियों की हत्या करने का अपराध बोध हुआ तो वह प्रायश्चित के लिए वह भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शिव की खोज में पांडव पहले काशी पहुंचे लेकिन, भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद महादेव की खोज में पांडव हिमालय पहुंचे, लेकिन भगवान शिव वहां से भी अंतर्ध्यान हो गए। इस तरह पांडव भगवान शिव की खोज में उनका पीछा करते रहे और वह अंतर्ध्यान होते रहे, लेकिन पांडवों ने हार नहीं मानी और उनकी खोज करतेकरते केदार पहुंच गए। यहां भगवान शिव उनसे छिपने के लिए बैल का रूप धारण कर लिया और बाकी पशुओं में जा मिले। लेकिन, पांडवों को संदेह हो गया। इसके बाद भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया। भीम ने अपने दोनों पैर अलगअलग पहाड़ों पर रख दिए। उनके पैर के नीचे से बाकी सारे बैल निकल गए सिर्फ एक को छोड़कर, बैल के रूप में भगवान शिव रूक गए। इसके बाद जब भीम ने उस बैल पर झपट्टा मारा तो उन्होंने त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शिव पांडवों की भक्ति देखकर प्रसन्न हो गए और उन्हें पाप से मुक्त कर दिया।

ये हैं पंच केदार
जब भगवान शिव अंतर्ध्यान हो रहे थे तो अपनी पीठ का कूबड़ छोड़ दिया । भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटाएं कल्पेश्वर में प्रकट हुईं। केदारनाथ और अन्य चारों तीर्थस्थलों को पंच केदार माना जाता है।

किसने करवाया था मंदिर का निर्माण
शिव पुराण के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों के पौत्र महाराज जनमेजय ने करवाया था। यहां स्वयंभू शिवलिंग है। श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समितिउत्तराखण्ड वेबसाइट के अनुसार, केदारनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 8वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा करवाया गया था।

कैसा है ज्योतिर्लिंग
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ मंदिर तीन भागों में है, गर्भगृह, मध्य भाग और सभा मण्डप। गर्भगृह में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है। ज्योतिर्लिंग के आगे के हिस्से पर भगवान गणेश के साथ मां पार्वती का श्रीयंत्र स्थित है। पिछले भाग पर प्राकृतिक स्फटिक की माला भी देख सकते हैं। मंदिर के अंदर चार विशालकाय स्तंभ हैं, जिन्हें 4 वेदों के प्रतीक माना जाता है। जब भी परिक्रमा करें तो उनके पीछे से करें।

दीपक जलने का रहस्य
केदारनाथ मंदिर अपने अंदर कई रहस्य समेटे हुए है। मंदिर के अंदर एक दीपक जलता है, कहा जाता है कि जब मंदिर का कपाट 6 महीने के लिए बंद होता है तो उन 6 महीनों में भी दीपक अपने आप जलते रहते है। इसके साथ ही यह भी बताया जाता है कि मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी मंदिर के अंदर से घंटी बजने की आवाज आती है। पुराणों के अनुसार, इन छह महीनों में देवता गण यहां पूजा करते हैं।

गौरी कुंड को लेकर मान्यता
केदारनाथ यात्रा गौरी कुंड से शुरू होती है, जहां स्नान करने के बाद आगे बढ़ते हैं। इस कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है। मान्यता है कि इस कुंड के पास माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की थी। उस समय देवी पार्वती के लिए ही यहां गरम पानी स्रोत प्रकट हुआ था।

कहां स्थित है यह मंदिर
केदारनाथ मंदिर मंदाकिनी नदी के किनारे उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित है। यह चार धाम और पंच केदार में से एक है। प्राचीन समय में इस क्षेत्र को ‘केदार खंड’ कहा जाता है।

कितने किलोमीटर पैदल चलना होता है
केदारनाथ मंदिर के लिए यात्रा गौरीकुंड से शुरू होती है। गौरीकुंड से मंदिर की दूरी 1618 किलोमीटर है, जिसके लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती है। मंदिर के बाहर नंदी की एक बड़ी प्रतिमा स्थित है।


मंदिर खुलने और बंद होने का समय
मंदिर के कपाट सुबह करीब 4 बजे खुल जाते हैं। वहीं, दोपहर 3 से 5 बजे के बीच मंदिर कुछ समय के लिए बंद रहता है। शाम की पूजा व आरती के बाद मंदिर का कपाट लगभग 8:30 बजे बंद हो जाता है।

पूजा व भोग
https://badrinathkedarnath.gov.in/ के अनुसार यहां पर पूजा, पाठ, आरती और भोग के लिए ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा उपलब्ध है। यहां देखें विशेष पूजा और आरती के लिए कितने पैसे लगते हैं।

महाभिषेक पूजा 8500 रुपये
रुद्राभिषेक पूजा 6500 रुपये
लघु रुद्राभिषेक पूजा 5500 रुपये
षोडशोपचार पूजा 5000 रुपये
पूरे दिन की संपूर्ण पूजा 26000 रुपये
शिव अष्टोत्तरी पाठ 900 रुपये
शिव सहस्रनाम पाठ 1800 रुपये
शिव नामावली 1800 रुपये
शिव महिम्न स्तोत्र पाठ 1800 रुपये
शिव तांडव स्तोत्र पाठ 1700 रुपये
शिव पराक्रम/क्षमास्तोत्र पाठ 1800 रुपये
संपूर्ण शाम की आरती 2500 रुपये

रुकने के लिए स्थान
केदारनाथ धाम और उसके आसपास ठहरने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। यहां पर कई संस्थाओं की धर्मशालाएं हैं, जहां कम शुल्क पर कमरे मिल सकते हैं। इसके अलावा सोनप्रयाग के पास सीतापुर में कई होटल उपलब्ध हैं, जहां ठहर सकते हैं। ये सोनप्रयाग के पास और केदारनाथ से लगभग 20 किमी दूरी पर स्थित है।

कैसे पहुंचे केदारनाथ

हवाई मार्ग: यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो केदारनाथ से करीब 235 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से दिल्ली के लिए रोजाना फ्लाइटें चलती हैं। एयरपोर्ट से गौरीकुंड तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

ट्रेन: केदारनाथ का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जो लगभग 243 किमी दूरी पर स्थित है। ऋषिकेश से आप बस और टैक्सी के जरिए आसानी से गौरीकुंड तक पहुंच सकते हैं।

सड़क मार्ग: गौरीकुंड उत्तराखंड के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। नई दिल्ली, हरिद्वार, ऋषिकेश, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और टिहरी से गौरीकुंड के लिए बस और टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं। इसके अलावा अगर आप दिल्ली में रहते हैं और कार से जाना चाहते हैं तो गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग 58 से जा सकते हैं, जो गाजियाबाद से जुड़ा हुआ है।

हेलीकॉप्टर, पालकी और टट्टू
केदारनाथ हेलिकॉप्टर से भी जा सकते हैं। इसके लिए IRCTC हेलीयात्रा वेबसाइट पर जाकर श्री केदारनाथ धाम के लिए ऑनलाइन हेलीकॉप्टर टिकट बुक करनी होती है। इसके अलावा आप पालकी और टट्टू से भी यात्रा कर सकते हैं। हालांकि, इसका शुल्क वहां जाने के बाद ही पता चल पाएगा।

आसपास घूमने की जगहें

भैरवनाथ मंदिर
केदारनाथ मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित भैरवनाथ मंदिर को लेकर मान्यता है कि, सर्दियों में जब केदारनाथ मंदिर बंद रहता है, तब भैरवनाथ जी ही इसकी रक्षा करते हैं। यहां से परे केदारनाथ घाटी का शानदार नजारा दिखता है। यह मंदिर करीब 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

वासुकी ताल
केदारनाथ से लगभग 8 किलोमीटर की दूसरी पर स्थित वासुकी ताल है, जो हिमालय की गोद में बसा एक खूबसूरत झील है। यहां तक पहुंचने के लिए ट्रैक करना पड़ता है, लेकिन रास्ते में जो नजारों मिलेंगे वह काफी मनमोहक होते हैं।

त्रियुगीनारायण मंदिर
मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह मंदिर केदारनाथ से कुछ ही दूरी पर स्थित है।

सोनप्रयाग
सोनप्रयाग से ही केदारनाथ यात्रा आगे बढ़ती है। यहां पर बासुकी और मंदाकिनी नदियों का संगम है।