अरब देशों के बीच बसा छोटा सा यहूदी देश इजराइल युद्ध का सामना कर रहा है. भारतइजराइल के रिश्ते मधुर हैं, यह जगजाहिर है. इसी बीच मणिपुर, मिजोरम में रहने वाले बनी मेनाशे समुदाय के लोगों को इजराइल की ओर से बसाये जाने की जानकारी आ रही है.

इजराइल में क्यों बसने जा रहे भारत में रहने वाले बनी मेनाशे समुदाय के लोग?
इजराइल में क्यों बसने जा रहे भारत में रहने वाले बनी मेनाशे समुदाय के लोग?

ऐसे में सवाल उठता है कि उत्तर पूर्वी राज्यों में निवास करने वाले ये लोग कौन हैं? क्या है इनका इतिहास और इजराइल से कनेक्शन? इजराइल इन्हें अपने यहां क्यों बसाने का अभियान चला रहा?

कौन हैं इस समुदाय के लोग?

बनी मेनाशे उत्तरपूर्व भारत का एक समुदाय है. इनके लोग मुख्य रूप से मणिपुर और मिजोरम में रहे हैं. कुछ परिवार असम और म्यांमार के इलाकों से भी जुड़े रहे हैं. यह समुदाय अपने आपको प्राचीन इजराइली लोगों की संतान मानता है. इनका दावा है कि वे मेनाशे नामक इजराइली गोत्र से जुड़े हैं.

भारत में बनी मेनाशे समुदाय के लोग मुख्य रूप से मणिपुर और मिजोरम में रहते हैं.

हिब्रू बाइबिल के अनुसार मेनाशे, यूसुफ के पुत्रों में से एक था. इसी दावे के कारण इन्हें बनी मेनाशे कहा जाने लगा. हिब्रू में बनी का अर्थ है संतान या वंशज. अर्थात, बनी मेनाशे का मतलब हुआ मेनाशे की संतान. यह विषय केवल धर्म का नहीं है. इसमें इतिहास, पहचान, राजनीति, प्रवासन और आस्था सब शामिल हैं. इसी वजह से यह मुद्दा भारत और इजराइल, दोनों जगह चर्चा में रहा है.

इस समुदाय की जड़ें कहां की मानी जाती हैं?

बनी मेनाशे के अधिकतर लोग उत्तरपूर्व भारत की कुकीचिनमिजो परंपरा से जुड़े माने जाते हैं. ये समुदाय लंबे समय से पहाड़ी इलाकों में रहते आए हैं. इनकी अपनी बोली, पहनावा, खानपान और सांस्कृतिक परंपराएं रही हैं. ब्रिटिश काल से पहले ये लोग स्थानीय जनजातीय व्यवस्था में जीवन बिताते थे. बाद में मिशनरियों का प्रभाव बढ़ा. 19वीं और 20वीं सदी में इन इलाकों में ईसाई धर्म तेजी से फैला.

इसी कारण बनी मेनाशे के कई पूर्वज ईसाई बने. लेकिन कुछ परिवारों और धार्मिक नेताओं ने बाद में कहा कि उनकी प्राचीन परंपराओं में ऐसे संकेत मिलते हैं जो यहूदी परंपरा से मिलतेजुलते हैं. जैसे, कुछ रीतिरिवाज, लोककथाएँ, एक ईश्वर में विश्वास, और पुरानी स्मृतियां. यहीं से यह विचार मजबूत हुआ कि वे शायद लॉस्ट ट्राइब्स ऑफ इजराइल यानी इजराइल के खोए हुए गोत्रों में से एक हो सकते हैं.

यहूदी समुदाय को मानने वाले.

लॉस्ट ट्राइब्स का विचार क्या है?

यह धारणा यहूदी इतिहास और धार्मिक परंपरा से आती है. मान्यता है कि प्राचीन इजराइल के बारह गोत्र थे. इनमें से दस गोत्र 8वीं सदी ईसा पूर्व में असीरियन साम्राज्य के हमलों और निर्वासन के बाद बिखर गए. इन बिखरे हुए समूहों को बाद में खोए हुए गोत्र कहा गया. सदियों से दुनिया के अलगअलग हिस्सों में कई समुदायों ने दावा किया कि वे उन्हीं गोत्रों से निकले हैं. बनी मेनाशे भी ऐसा ही दावा करते हैं.

उनका कहना है कि उनके पूर्वज पश्चिम एशिया से निकले. फिर वे फारस, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, चीन और दक्षिणपूर्व एशिया से होते हुए उत्तरपूर्व भारत तक पहुंचे. लेकिन यह बात साफ समझनी चाहिए कि इस दावे पर इतिहासकारों और वैज्ञानिकों में पूरी सहमति नहीं है.

कुछ शोधकर्ताओं को यह दावा सांस्कृतिक और धार्मिक स्मृति पर आधारित लगता है. कुछ लोग इसे ऐतिहासिक रूप से कमजोर मानते हैं. कुछ डीएनए अध्ययनों से भी निर्णायक नतीजा नहीं निकला. इसलिए बनी मेनाशे की पहचान केवल जैविक इतिहास से तय नहीं होती. यह काफी हद तक आस्था, सामुदायिक स्मृति और धार्मिक पुनर्पहचान से जुड़ा विषय है.

बनी मेनाशे के बहुत से लोग खुद इजराइल जाना चाहते थे, वे यहूदी धर्म के साथ अपना जीवन जोड़ना चाहते थे.

इजराइल से इनका कनेक्शन कैसे बना?

20वीं सदी के दूसरे हिस्से में बनी मेनाशे समुदाय के कुछ धार्मिक नेताओं ने यहूदी धर्म की ओर लौटने की बात शुरू की. उन्होंने पुराने रीतिरिवाजों को नए अर्थ में देखा. धीरेधीरे कुछ लोगों ने यहूदी प्रार्थनाएं, हिब्रू शब्द और यहूदी धार्मिक नियम अपनाने शुरू किए. फिर इस समुदाय का संपर्क इजराइल के कुछ धार्मिक संगठनों से हुआ. इनमें सबसे चर्चित नाम शावेई इजराइल का है. यह संगठन दुनिया भर में उन समूहों से जुड़ा रहा है जो खुद को यहूदी मूल का मानते हैं. इसी प्रक्रिया में बनी मेनाशे के लोगों को यहूदी धर्म की औपचारिक शिक्षा दी गई. रब्बियों ने उनके दावों, परंपराओं और धार्मिक अभ्यासों का अध्ययन किया.

आखिरकार साल 2005 में इजराइल के सेफ़ार्डिक मुख्य रब्बी श्लोमो अमार ने महत्वपूर्ण फैसला दिया. उन्होंने माना कि बनी मेनाशे को इजराइल के वंश से जुड़ा समुदाय माना जा सकता है लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि इजराइल जाकर बसने से पहले उन्हें औपचारिक यहूदी धर्मपरिवर्तन की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी. यही वह मोड़ था जिससे इजराइल से उनका संबंध आधिकारिक रूप से मजबूत हुआ.

इजराइल इन्हें अपने देश में क्यों बसा रहा है?

इस सवाल के कई जवाब हैं.

  • पहला कारण धार्मिक है. इजराइल के कुछ लोग मानते हैं कि दुनिया में बिखरे यहूदी या यहूदी मूल के समुदायों को इकट्ठा करना एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी है.
  • दूसरा कारण पहचान का है. बनी मेनाशे के बहुत से लोग खुद इजराइल जाना चाहते थे. वे यहूदी धर्म के साथ अपना जीवन जोड़ना चाहते थे. वे मानते थे कि इजराइल उनकी पूर्वजों की भूमि है.
  • तीसरा कारण वैधानिक और सामाजिक है. इजराइल में ऐसे मामलों पर धार्मिक संस्थाएं, गृह मंत्रालय और आप्रवासन व्यवस्था मिलकर निर्णय लेते हैं. जब किसी समुदाय को यहूदी मूल या यहूदी धर्म से जुड़ा माना जाता है, तब उसके कुछ लोगों को बसने की अनुमति दी जा सकती है.
  • चौथा कारण संगठनों का अभियान भी है. कुछ यहूदी संगठन लंबे समय से इनके पुनर्वास के लिए काम करते रहे. उन्होंने धन जुटाया, शिक्षा दी, कागजी प्रक्रिया कराई और परिवारों को इजराइल ले जाने में मदद की.

यह अभियान कैसे चला?

यह कोई एक दिन का फैसला नहीं था. यह कई दशकों की प्रक्रिया थी. पहले समुदाय के भीतर धार्मिक जागरण हुआ. फिर स्थानीय स्तर पर यहूदी रीतिरिवाज अपनाने की कोशिश हुई. इसके बाद इजराइली धार्मिक समूहों से संपर्क बना. कई लोगों ने हिब्रू सीखी. कई परिवारों ने सब्बाथ मानना शुरू किया. फिर रब्बियों की देखरेख में औपचारिक धर्मपरिवर्तन की प्रक्रिया हुई. इसके बाद समूहों में लोगों को इजराइल भेजा गया. इसे कई बार अलियाह यानी इजराइल में यहूदी प्रवास कहा जाता है. कुछ परिवार पहले गए. फिर उनके रिश्तेदारों ने भी आवेदन किया. धीरेधीरे यह एक संगठित अभियान बन गया.

अब तक कितने लोग गए?

संख्या अलगअलग स्रोतों में थोड़ी बदलती है. आम तौर पर माना जाता है कि हजारों बनी मेनाशे इजराइल जा चुके हैं. कई हजार अब भी भारत में हैं. वहां पहुंचने के बाद वे अलगअलग शहरों और बस्तियों में बसाए गए. कुछ लोग गलील क्षेत्र में बसे. कुछ को वेस्ट बैंक की बस्तियों में भी बसाया गया. यहीं से यह मुद्दा थोड़ा राजनीतिक भी बन गया. आलोचकों का कहना है कि कुछ मामलों में इनकी बसावट का इस्तेमाल जनसंख्या और बस्ती नीति से जोड़कर देखा गया. समर्थकों का कहना है कि यह बस धार्मिक और मानवीय पुनर्वास है.

भारत के लिए यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

बनी मेनाशे भारत के उत्तरपूर्व का हिस्सा हैं. उनकी कहानी भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दिखाती है. यह बताती है कि पहचान हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती. एक समुदाय जनजातीय भी हो सकता है, ईसाई पृष्ठभूमि भी रख सकता है, और फिर यहूदी पहचान भी अपना सकता है. यह मामला यह भी दिखाता है कि धर्म और जातीय पहचान सीमाओं से बंधी नहीं रहती. उत्तरपूर्व भारत का एक समुदाय पश्चिम एशिया के एक राष्ट्र से गहरा संबंध महसूस कर सकता है. बनी मेनाशे आज दुनिया के उन दुर्लभ समुदायों में हैं जिनकी पहचान भारत, यहूदी इतिहास और आधुनिक इजराइल, तीनों से एक साथ जुड़ती है.