हिमाचली खबर: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने शपथ ग्रहण के लिए 9 मई का दिन यूं ही नहीं चुना है. बंगाली पंचांग के मुताबिक इस दिन बैसाख का 25वां दिन है और इसी दिन पूरा बंगाल गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती मनाता है. दुनिया में गुरुदेव के समर्थक 7 मई को जयंती मनाते हैं. चूंकि, गुरुदेव रवींद्रनाथ बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर हैं, इसलिए भाजपा ने लोगों की भावनाओं से जुडने की एक और कोशिश की है. यह गुरुदेव के प्रति सम्मान भी है.

7 या 9 मई, रवींद्रनाथ टैगोर जयंती की तारीख पर कंफ्यूजन क्यों? इसी दिन बंगाल में BJP सरकार का शपथ ग्रहण​
7 या 9 मई, रवींद्रनाथ टैगोर जयंती की तारीख पर कंफ्यूजन क्यों? इसी दिन बंगाल में BJP सरकार का शपथ ग्रहण​

पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन के बहाने जानते हैं कि जब गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई को हुआ था तो फिर 25 बैसाख को टैगोर जयंती क्यों मनाई जाती है? आखिर तीन दिन तक उनकी जयंती मनाने के पीछे के तर्क क्या हैं?

तारीख पर कंफ्यूजन का जवाब

रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार 7 मई 1861 को हुआ था, लेकिन बंगाली पंचांग के अनुसार यह दिन 25 बैसाख था. यही कारण है कि टैगोर जयंती का मूल आधार 25 बैसाख माना जाता है. बहुत से लोग यही सवाल पूछते हैं, अगर जन्म 7 मई को हुआ था, तो फिर 25 बैसाख को क्यों मनाते हैं? क्या यह दो अलग तिथियां हैं? क्या इसे तीन दिन तक मनाया जाता है? इन सवालों का जवाब कैलेंडर की समझ में छिपा है.

रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्मतिथि बंगाली तिथि में 25 बैसाख थी. उस दिन अंग्रेज़ी तारीख़ 7 मई थी

भारत में लंबे समय तक लोग स्थानीय पंचांगों का प्रयोग करते थे. बंगाल में बंगाली कैलेंडर या बंगाब्द चलता था. दूसरी ओर, दुनिया में और सरकारी रिकॉर्ड में ग्रेगोरियन कैलेंडर यानी अंग्रेज़ी तारीख़ें इस्तेमाल होती आ रही हैं. जब टैगोर का जन्म हुआ, तब उनकी जन्मतिथि बंगाली तिथि में 25 बैसाख थी. उस दिन अंग्रेज़ी तारीख़ 7 मई थी, इसलिए दोनों तिथियां सही हैं. वे अलगअलग दिन नहीं हैं. वे एक ही दिन के दो अलग कैलेंडर रूप हैं.

25 बैसाख का क्या है सांस्कृतिक महत्व?

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल एक कवि नहीं थे. वे बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के बड़े प्रतीक हैं. उनकी कविता, गीत, कहानी, नाटक और विचार बंगाली जीवन से गहराई से जुड़े हैं. इसी कारण उनकी जयंती को बंगाल में केवल अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं देखा जाता. लोग उसे बंगाली परंपरा के अनुसार याद करना पसंद करते हैं. इसलिए 25 बैसाख को विशेष महत्व मिला. जैसे कई भारतीय पर्व चंद्र या सौर पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं, वैसे ही टैगोर जयंती भी बंगाली तिथि के आधार पर मनाई जाती है.

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फिर 7 मई का क्या महत्व है?

7 मई का महत्व कम नहीं है. यह टैगोर की जन्मतिथि का अंग्रेज़ी रूप है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई जगह 7 मई का उल्लेख किया जाता है. स्कूलों, लेखों, समाचारों और सरकारी दस्तावेज़ों में अक्सर यही तारीख़ दिखाई देती है. क्योंकि अंग्रेज़ी कैलेंडर आज सबसे अधिक प्रचलित है, लेकिन बंगाल में, खासकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग 25 बैसाख को ही असली जयंती मानते हैं. इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि 7 मई ऐतिहासिक तारीख़ है और 25 बैसाख सांस्कृतिक तिथि है.

हर साल 25 बैसाख और 7 मई एक ही दिन क्यों नहीं पड़ते?

यही बात लोगों को सबसे अधिक उलझाती है. कारण यह है कि बंगाली कैलेंडर और ग्रेगोरियन कैलेंडर एक जैसे नहीं चलते. दोनों की गणना का तरीका अलग है. इस वजह से हर साल 25 बैसाख की अंग्रेज़ी तारीख़ थोड़ी बदल सकती है. कभी यह 7 मई के आसपास पड़ती है. कभी 8 मई या कुछ जगहों पर 9 मई के आसपास भी दिख सकती है यानी 25 बैसाख स्थिर है, लेकिन उसकी अंग्रेज़ी तारीख़ हर बार बिल्कुल एक जैसी नहीं रहती. इसीलिए बंगाली समाज कहता है कि टैगोर जयंती की सही परंपरागत तिथि 25 बैसाख है.

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क्या टैगोर जयंती तीन दिन तक मनाई जाती है?

सामान्य रूप से टैगोर जयंती एक ही मुख्य दिन पर आधारित होती है. वह दिन है 25 बैसाख, लेकिन व्यवहार में कई जगह यह उत्सव एक दिन से अधिक चलता है. क्योंकि टैगोर केवल एक लेखक नहीं, एक सांस्कृतिक परंपरा हैं. उनकी स्मृति में गीत, नृत्य, कवितापाठ, नाटक, चर्चा, प्रदर्शनी और सभाएँ आयोजित होती हैं. बड़े संस्थानों में कार्यक्रमों की संख्या बहुत अधिक होती है, इसलिए आयोजन दो दिन, तीन दिन, या कभीकभी पूरे सप्ताह तक भी चल सकते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी जयंती की तीन अलगअलग तिथियां हैं. अर्थ यह है कि मुख्य तिथि एक है, लेकिन उत्सव कई दिनों तक हो सकता है.

तीन दिन मनाने की परंपरा कैसे बनती है?

कुछ जगहों पर कार्यक्रम शुरू होने से पहले उद्घाटन समारोह होता है, फिर अगले दिन सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होती हैं. अंतिम दिन विशेष व्याख्यान, पुरस्कार या समापन कार्यक्रम रखा जाता है. कई स्कूल और विश्वविद्यालय भी ऐसा करते आ रहे हैं. वे सुविधानुसार अलगअलग दिनों में कार्यक्रम बांट देते हैं. कभी मुख्य कार्यक्रम कार्य दिवस पर नहीं हो पाता, तो एक भाग पहले और एक बाद में रखा जाता है.

शांति निकेतन, कोलकाता और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों में भीड़ और कार्यक्रमों की विविधता के कारण उत्सव कई दिन तक दिख सकता है, इसलिए अगर लोग कहते हैं कि टैगोर जयंती तीन दिन चली, तो उसका मतलब उत्सव का विस्तार है, न कि जन्मतिथि का भ्रम.

We’re celebrating the 165th anniversary of the birth of a true great: Rabindranath Tagore, who was born #onthisday 7 May, in 1861 in Calcutta, India.

The first nonEuropean literature laureate, he was awarded the #NobelPrize “because of his profoundly sensitive, fresh and pic.twitter.com/I4pHjIWpLO

— The Nobel Prize May 7, 2026

बंगाल में 25 बैसाख को ही अधिक महत्व क्यों मिला?

बंगाल में टैगोर का स्थान बहुत विशेष है. उन्हें कवि गुरु कहा जाता है. उनके गीत आज भी रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं. रवीन्द्र संगीत, नृत्य, पाठ, नाटक, सब कुछ बंगाली सांस्कृतिक जीवन से जुड़ा है. इसलिए उनकी जयंती भी स्थानीय सांस्कृतिक कैलेंडर के अनुसार मनाई जाती है. 25 बैसाख केवल एक तारीख़ नहीं है. यह बंगाली मानस में एक भावनात्मक दिन है. इस दिन लोग टैगोर को अपने सांस्कृतिक घर के सदस्य की तरह याद करते हैं. यही कारण है कि अंग्रेज़ी तारीख़ जानने के बाद भी लोग 25 बैसाख को अधिक अपनापन देते हैं.

इस तरह टैगोर जयंती को लेकर भ्रम होना स्वाभाविक है, क्योंकि हमारे सामने दो कैलेंडर आते हैं. एक अंग्रेज़ी, दूसरा बंगाली. रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को हुआ. वही दिन बंगाली पंचांग में 25 बैसाख था, इसलिए दोनों तिथियाँ सही हैं. बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा ने 25 बैसाख को अधिक महत्व दिया. इसी वजह से टैगोर जयंती उसी दिन मनाई जाती है. जहां तक तीन दिन मनाने की बात है, तो वह उत्सव की अवधि हो सकती है, लेकिन जयंती की मूल तिथि एक ही है, इसलिए सही समझ यही है कि टैगोर जयंती का आधार 25 बैसाख है और 7 मई उसका अंग्रेज़ी कैलेंडर रूप है.