राखी का त्योहार जब भी आता है तो बरबस मुगल बादशाहों की चर्चा भी तेज हो जाती है. इस मामले में सबसे प्रचलित कहानी हुमायूं और रानी कर्णावती की है. पर क्या आप जानते हैं कि मुगल बादशाहों को सत्ता शीर्ष पर बैठाने से लेकर उन्हें स्थापित करने तक में बहनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही? राखी के त्योहार के बहाने आइए समझते हैं कि बहनों ने मुगल बादशाहों की मदद कैसे की? शासनसत्ता में किस तरीके से मदद की?

रक्षा बंधन भाई और बहन के प्रेम का त्योहार है. इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है. भाई उसकी रक्षा का वचन देता है. इतिहास में बहनों ने केवल राखी बांधने तक की रस्म नहीं निभाई, बल्कि कई बहनों ने अपने भाइयों को संकट से भी बचाया. उन्होंने युद्ध, राजनीति और परिवार के संघर्षों में भी साथ दिया. मुगल इतिहास ऐसी बहनों की कहानियों से भरा है. इन बहनों ने अपने भाइयों को सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इतिहास ने इन सभी बहनों को सलीके से संजोया है.

खांजादा बेगम: दुश्मन से शादी करके ने भाई बाबर को किया मजबूत

खांजादा बेगम मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की बड़ी बहन थीं. उनका जन्म फरगना के शासक उमर शेख मिर्जा के परिवार में हुआ था. बाबर का जीवन संघर्षों से भरा रहा. बहुत कम उम्र में उसे फरगना की गद्दी मिली. लेकिन उसके सामने कई शक्तिशाली विरोधी थे. मध्य एशिया में सत्ता के लिए लगातार युद्ध होते थे.

समरकंद पर अधिकार करने की कोशिश में बाबर को कई बार हार का सामना करना पड़ा. उसके शत्रु शैबानी खान ने बाबर की स्थिति कमजोर कर दी थी. इसी दौर में खांजादा बेगम ने अपने परिवार को बचाने के लिए बड़ा त्याग किया. शैबानी खान ने उन्हें अपने साथ विवाह करने के लिए मजबूर किया. इस विवाह के पीछे राजनीतिक दबाव था. खांजादा बेगम अपने भाई बाबर को बचाने के लिए इस कठिन परिस्थिति को स्वीकार करने पर मजबूर हुईं. उन्होंने अपने निजी जीवन का बलिदान दिया. इससे बाबर को तत्काल राहत मिली.

खांजादा बेगम और मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर.

खांजादा बेगम बाबर के जीवन में लगातार महत्वपूर्ण बनी रहीं. बाबर उनका बहुत सम्मान करता था. वे परिवार की वरिष्ठ महिला थीं. उनकी सलाह को महत्व दिया जाता था. इस तरह खांजादा बेगम ने बाबर को सीधे युद्ध में नहीं, बल्कि अपने त्याग और राजनीतिक भूमिका से मजबूत किया.

गुलबदन बेगम: संभाली भाई हुमायूं की विरासत

गुलबदन बेगम बाबर की बेटी और हुमायूं की बहन थीं. वे मुगल परिवार की सबसे महत्वपूर्ण महिला गिनी जाती हैं. उन्होंने फारसी भाषा में हुमायूंनामा लिखा. यह पुस्तक हुमायूं के जीवन और मुगल परिवार के भीतर के संघर्षों का महत्वपूर्ण स्रोत है. हुमायूं को अपने पिता बाबर के बाद सत्ता मिली. लेकिन उसका शासन आसान नहीं था. उसे शेरशाह सूरी से हारना पड़ा. हुमायूं को भारत छोड़कर भटकना पड़ा. इस कठिन समय में मुगल परिवार की महिलाओं ने उसका साथ दिया. गुलबदन बेगम भी अपने भाई के संघर्षों से जुड़ी रहीं. उन्होंने परिवार के भीतर के रिश्तों को संभालने की कोशिश की.

हुमायूं.

हुमायूं के भाइयों में भी सत्ता को लेकर मतभेद थे. कामरान मिर्जा कई बार हुमायूं के विरोध में खड़े हुए. ऐसे समय में परिवार की महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती थी. गुलबदन बेगम ने बाद में हुमायूं के जीवन और संघर्षों को दर्ज किया. उनका लेखन केवल इतिहास नहीं था. यह एक बहन की नजर से लिखा गया पारिवारिक दस्तावेज भी था. हुमायूं ने बाद में फारस के शाह तहमास्प की मदद से अपनी शक्ति बढ़ाई. उसने कंधार और काबुल पर फिर से अधिकार किया. इसके बाद वह भारत लौट सका. वर्ष 1555 में हुमायूं ने दिल्ली पर दोबारा अधिकार किया. इस तरह वह फिर से मुगल बादशाह बना.

जहांआरा बेगम: भाई दारा शिकोह को सत्ता दिलाने की चाहत

जहांआरा बेगम मुगल बादशाह शाहजहां की बड़ी बेटी थीं. वे औरंगजेब की बहन थीं. शाहजहां के शासनकाल में उन्हें बहुत सम्मान मिला. जहांआरा का प्रभाव केवल राजमहल तक सीमित नहीं था. वे दरबार की राजनीति समझती थीं. वे व्यापार और सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी थीं. शाहजहां के चारों बेटों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष शुरू हुआ. दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श सत्ता के दावेदार थे. जहांआरा बेगम दारा शिकोह का समर्थन करती थीं. दारा शाहजहां का सबसे बड़ा बेटा था.

जहांआरा बेगम और दारा शिकोह.

शाहजहां भी उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे. जहांआरा ने दारा के पक्ष में दरबार के कई लोगों को साथ रखने की कोशिश की. उन्होंने अपने पिता शाहजहां के साथ भी संबंध बनाए रखे. जब शाहजहां को औरंगजेब ने आगरा के किले में नजरबंद किया, तब जहांआरा उनके साथ रहीं. जहांआरा ने अपने पिता का साथ नहीं छोड़ा. उन्होंने महल में रहकर उनकी सेवा की. यह उस समय बहुत बड़ा निर्णय था. दारा शिकोह अंततः औरंगजेब से हार गया. औरंगजेब ने सत्ता पर अधिकार कर लिया. जहांआरा ने बाद में औरंगजेब के साथ संबंध सुधारे. औरंगजेब ने उन्हें फिर से सम्मान दिया. जहांआरा सीधे किसी बादशाह को गद्दी पर नहीं बैठा सकीं. फिर भी उन्होंने सत्ता के संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभाई.

रोशनआरा बेगम: औरंगजेब को सत्ता पाने में मदद की

रोशनआरा बेगम जहांआरा की छोटी बहन थीं. वे औरंगजेब के पक्ष में थीं. उत्तराधिकार के युद्ध में दोनों बहनों की राजनीतिक पसंद अलग थी. जहांआरा दारा शिकोह का साथ दे रही थीं. रोशनआरा ने औरंगजेब को समर्थन दिया. रोशनआरा दरबार की गतिविधियों पर नजर रखती थीं. वे औरंगजेब को राजनीतिक सूचनाएं भेजती थीं. इससे औरंगजेब को आगरा और दिल्ली की स्थिति समझने में मदद मिली. जब शाहजहां और दारा शिकोह के बीच सत्ता का तनाव बढ़ा, तब रोशनआरा ने औरंगजेब के पक्ष को मजबूत किया.

जहांआरा और औरंगजेब.

उन्होंने अपने भाई को दरबार की योजनाओं और विरोधियों की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी. औरंगजेब ने कई रणनीतिक फैसले किए. उसने पहले अपने भाइयों को कमजोर किया. फिर उसने आगरा पर अधिकार किया. शाहजहां को कैद किया गया. दारा शिकोह को पराजित किया गया. इसके बाद औरंगजेब ने वर्ष 1658 में सत्ता संभाली. रोशनआरा को इसका बड़ा राजनीतिक लाभ मिला. वे शाही दरबार की प्रभावशाली महिला बन गईं. इतिहास में रोशनआरा की भूमिका को लेकर अलगअलग मत हैं. कुछ इतिहासकार उन्हें कुशल राजनीतिक सहयोगी मानते हैं. कुछ लोग उन्हें सत्ता संघर्ष में कठोर भूमिका निभाने वाली महिला के रूप में देखते हैं. लेकिन एक बात स्पष्ट है. उन्होंने औरंगजेब की सत्ता प्राप्ति में मदद की.

राखी और हुमायूं की कहानी भी है महत्वपूर्ण

रक्षा बंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मुगल कथा रानी कर्णावती और हुमायूं की है. कहा जाता है कि चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के आक्रमण से बचने के लिए हुमायूं को राखी भेजी थी. उन्होंने हुमायूं से मदद मांगी थी. लोकप्रिय कथा के अनुसार, हुमायूं ने राखी का सम्मान किया. वह रानी की सहायता के लिए चल पड़ा. लेकिन वह समय पर चित्तौड़ नहीं पहुंच सका. यह कहानी रक्षा बंधन के अवसर पर बहुत सुनाई जाती है. यह हिंदूमुस्लिम भाईचारे का प्रतीक भी मानी जाती है. लेकिन इतिहासकारों के बीच इस घटना को लेकर मतभेद हैं. रानी कर्णावती और हुमायूं के बीच राखी भेजे जाने का मजबूत प्रमाण नहीं मिलता. कुछ इतिहासकार इसे केवल लोककथा मानते हैं. इसलिए इस प्रसंग को प्रमाणित इतिहास की तरह नहीं, बल्कि लोकप्रिय परंपरा की तरह प्रस्तुत करना चाहिए.

बहनों की भूमिका को केवल भावनाओं से न देखें

मुगल इतिहास में बहनों ने कई तरह की भूमिका निभाई. उन्होंने परिवार को जोड़ा. उन्होंने राजनीतिक संदेश पहुंचाए. उन्होंने संकट में भाइयों का साथ दिया. खांजादा बेगम ने बाबर के लिए बड़ा निजी त्याग किया. गुलबदन बेगम ने हुमायूं के संघर्षों को इतिहास में दर्ज किया. जहांआरा ने दारा शिकोह और शाहजहां का साथ दिया. रोशनआरा ने औरंगजेब की सत्ता की राह आसान की. इन सभी बहनों की भूमिका एक जैसी नहीं थी. किसी ने त्याग किया. किसी ने लेखन किया. किसी ने राजनीति में सक्रिय भाग लिया. रक्षा बंधन हमें यही याद दिलाता है कि भाईबहन का रिश्ता केवल रक्षा के वचन तक सीमित नहीं है. कई बार बहन भी भाई की रक्षा करती है. वह उसके कठिन समय में सहारा बनती है. इतिहास की इन बहनों ने अपने समय की सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण फैसले लिए. उनके फैसलों ने मुगल साम्राज्य की दिशा बदली.