भारत की आज़ादी में युवाओं के साहस की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. इन युवाओं ने अपनी पढ़ाई, परिवार और भविष्य की चिंता नहीं की. उन्होंने देश को सबसे ऊपर रखा. ऐसे ही एक निर्भीक युवा थे हेमू कालानी. वे बहुत कम उम्र में शहीद हो गए. लेकिन उनका साहस आज भी युवाओं को प्रेरित करता है. हेमू कालानी को सिंध का वीर सपूत कहा जाता है.

उस समय वह ब्रिटिश भारत का हिस्सा था. उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया. उन्होंने हथियार नहीं, बल्कि हिम्मत को अपना सबसे बड़ा अस्त्र बनाया. उनकी कहानी देशभक्ति, त्याग और निडरता की कहानी है. हेमू कालानी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत के सुक्कुर शहर में हुआ. उनका परिवार देशभक्ति की भावना से भरा हुआ था.
उनके पिता का नाम पेसूमल कालानी था. उनकी माता का नाम जेठीबाई था. उनकी मां धार्मिक और साहसी महिला थीं. घर में भारतीय संस्कृति का सम्मान होता था. देश की स्थिति पर चर्चा होती थी. अंग्रेजों के अत्याचारों की बातें भी होती थीं. हेमू बचपन से ही तेज और संवेदनशील थे. उन्हें अन्याय बिल्कुल पसंद नहीं था. वे दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे.
छोटी उम्र में देशभक्ति का जज्बा
हेमू सामान्य बालक नहीं थे. वे खेलते भी थे और पढ़ते भी थे. लेकिन उनके मन में देश के लिए कुछ करने की आग थी. जब वे बड़े हो रहे थे, भारत में आज़ादी की लहर चल रही थी. महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं की बातें हर जगह होती थीं. इन महान लोगों के विचारों का हेमू पर गहरा प्रभाव पड़ा. वे विदेशी शासन को अन्यायपूर्ण मानते थे. उन्हें दुख होता था कि भारत के लोग अपने ही देश में गुलाम हैं. वे अंग्रेजों की ताकत से नहीं डरते थे. वे भारत की आज़ादी के लिए काम करेंगे, यह बेहद कम उम्र में तय कर लिया था. वे केवल बातें नहीं करना चाहते थे. वे संघर्ष का हिस्सा बनना चाहते थे.
हेमू कालानी.
स्वराज सेना के साथ काम किया
हेमू कालानी ने अपने साथियों को जोड़ा. उन्होंने युवाओं में देश प्रेम जगाने का काम किया. वे गुप्त रूप से आज़ादी के आंदोलन से जुड़े. उन्होंने स्वराज सेना नाम के एक युवा संगठन में काम किया. संगठन का उद्देश्य अंग्रेजी शासन का विरोध करना था. युवा लोगों को जागरूक किया जाता था. हेमू और उनके साथी जुलूस निकालते थे. वे देशभक्ति के नारे लगाते थे. वे लोगों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए कहते थे. वे तिरंगा फहराते थे. अंग्रेजी शासन के खिलाफ पर्चे बाँटते थे. इन कामों में खतरा था. अंग्रेज पुलिस ऐसे युवाओं को पकड़ लेती थी. लेकिन हेमू नहीं डरे. उनके लिए देश की आज़ादी सबसे बड़ी बात थी. वे कहते थे कि गुलामी में जीने से अच्छा है, आज़ादी के लिए संघर्ष करना.
भारत छोड़ो आंदोलन का पड़ा तगड़ा प्रभाव
हेमू की उम्र 19 साल थी, जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ. महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की. गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए. इसके बाद पूरा देश आंदोलन में उतर आया. पुलिस ने कई जगह हिंसा की. लेकिन जनता का हौसला कम नहीं हुआ. हेमू कालानी भी इस आंदोलन से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने अपने क्षेत्र में आंदोलन को मजबूत करने का निर्णय लिया. वे लोगों से कहते थे कि आज़ादी केवल नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है. यह हर भारतीय की जिम्मेदारी है. उनका संदेश साफ था. युवा डरना छोड़ें. अन्याय का विरोध करें. देश के लिए अपना योगदान दें.
भारत छोड़ो आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन से अंग्रेज सरकार घबरा गई थी.
ट्रेन बेपटरी करने की कोशिश में हुए गिरफ्तार
एक दिन हेमू को महत्वपूर्ण खबर मिली. अंग्रेजों की एक सैन्य ट्रेन सुक्कुर से गुजरने वाली थी. उस ट्रेन में सैनिक और हथियार ले जाए जा रहे थे. यह सामान अंग्रेजों द्वारा आंदोलन दबाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था. हेमू ने इसे रोकने की योजना बनाई.
उनके साथ कुछ साथी भी थे. योजना बहुत जोखिम भरी थी. हेमू और उनके मित्रों ने रेलवे की पटरी को नुकसान पहुंचाने का फैसला किया. उनका उद्देश्य ट्रेन को आगे बढ़ने से रोकना था. उस समय उनके पास सही औजार नहीं थे. फिर भी वे पीछे नहीं हटे. वे रात के अंधेरे में रेल पटरी के पास पहुंचे. उन्होंने पटरियों की फिशप्लेट खोलने की कोशिश की.
फिशप्लेट लोहे का वह हिस्सा होती है जो पटरियों को जोड़ता है. उसे खोलना आसान नहीं था. हेमू पूरी कोशिश कर रहे थे. लेकिन पर्याप्त औजार न होने के कारण काम पूरा नहीं हो पाया. इसी दौरान अंग्रेज पुलिस को उनके बारे में सूचना मिल गई. पुलिस वहां पहुंच गई.
हेमू के साथी भागने में सफल रहे. लेकिन हेमू पकड़े गए. अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की. उन पर दबाव डाला गया. यातनाएं दी गईं. अंग्रेज जानना चाहते थे कि उनके साथी कौन थे. वे संगठन के लोगों के नाम पूछते रहे. लेकिन हेमू चुप रहे. वे जानते थे कि यदि उन्होंने नाम बता दिए, तो कई देशभक्त पकड़े जाएंगे. उन्होंने अपने साथियों की रक्षा की. उन्होंने दर्द सह लिया, पर किसी का नाम नहीं बताया. उनकी यह चुप्पी बहुत महान थी. यह केवल साहस नहीं था. यह अपने साथियों के प्रति सच्ची निष्ठा थी.
मां की कोशिशें भी काम न आईं
अंग्रेजी अदालत ने हेमू कालानी को फांसी की सजा सुनाई. उस समय वे केवल 19 वर्ष के थे. लेकिन उनका हौसला बहुत बड़ा था. उनकी मां ने दया की अपील की कोशिश की. कई लोगों ने भी सजा कम करने की मांग की. अंग्रेजों ने एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि यदि हेमू अपने साथियों के नाम बता दें, तो सजा कम की जा सकती है. लेकिन हेमू ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. उन्होंने किसी साथी को धोखा देना स्वीकार नहीं किया. उन्होंने अपने जीवन से अधिक देशहित को चुना. उनके लिए यह निर्णय कठिन जरूर रहा होगा. लेकिन उनके मन में कोई डर नहीं था.
फांसी मंजूर लेकिन देश से गद्दारी नहीं
हेमू कालानी को 21 जनवरी 1943 को फांसी दे दी गई. वे बहुत कम उम्र में अमर हो गए. उनकी शहादत ने लोगों के दिलों में आग जगा दी. उनका शरीर भले ही चला गया. लेकिन उनका विचार जीवित रहा. उनका साहस स्वतंत्रता संग्राम की ताकत बन गया. उनकी मां ने भी अद्भुत धैर्य दिखाया. उन्होंने अपने बेटे के बलिदान पर गर्व किया. यह एक मां का बहुत बड़ा त्याग था. हेमू ने साबित किया कि उम्र साहस को तय नहीं करती. कम उम्र का एक युवा भी इतिहास बदल सकता है. जरूरी है कि उसके पास सही उद्देश्य और मजबूत इरादा हो.
युवाओं के लिए हेमू का संदेश
हेमू कालानी की कहानी आज भी बहुत जरूरी है. आज की पीढ़ी को जेनजी कहा जाता है. यह पीढ़ी तकनीक, इंटरनेट और तेज बदलावों के दौर में जी रही है. लेकिन हेमू का संदेश आज भी वही है. अन्याय के सामने चुप मत रहो. सही बात के लिए खड़े रहो. देश और समाज की जिम्मेदारी समझो. देशभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं है. इसका अर्थ ईमानदारी से काम करना भी है. दूसरों की मदद करना भी है. देशभक्ति का अर्थ कानून का सम्मान करना भी है. युवा पढ़ाई में अच्छा कर सकते हैं. वे विज्ञान, खेल, कला और सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं. वे पर्यावरण बचा सकते हैं. वे समाज में भाईचारा फैला सकते हैं.
यह सब भी राष्ट्र निर्माण है. हेमू कालानी का जीवन हमें यही सिखाता है. बड़े बदलाव के लिए बड़े पद की जरूरत नहीं होती. सच्चे इरादे और साहस की जरूरत होती है.



