अमेरिका और सऊदी अरब के बीच नागरिक परमाणु सहयोग की दिशा में हुई ताजी न्यूक्लियर डील ने बहस तेज कर दी है. इस वजह से मिडिल ईस्ट का परमाणु सवाल फिर दुनिया के केंद्र में है. वजह सिर्फ ईरान का यूरेनियम संवर्धन नहीं है. इजराइल की कथित परमाणु क्षमता, सऊदी अरब की नई महत्वाकांक्षाएं, तुर्की के परमाणु बिजली घर और इराक का पुराना इतिहास भी इस कहानी का हिस्सा हैं. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है।

आइए, सऊदी अरबअमेरिकी डील के बहाने समझते हैं कि ईरानइराक से इजराइल तुर्की तक, कहां तक पहुंचा मिडिल ईस्ट देशों का न्यूक्लियर प्रोग्राम?
परमाणु कार्यक्रम और परमाणु हथियार में क्या है अंतर?
परमाणु बिजली बनाने वाला हर देश परमाणु बम नहीं बनाता. बिजलीघर के लिए कम स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का उपयोग होता है. बहुत अधिक स्तर तक संवर्धित यूरेनियम हथियार बनाने के काम आ सकता है. इसीलिए परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियार के बीच की रेखा बहुत संवेदनशील होती है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी कई देशों के कार्यक्रमों की निगरानी करती है.
इजराइल है सबसे रहस्यमय परमाणु शक्ति
इजराइल ने कभी आधिकारिक रूप से नहीं कहा कि उसके पास परमाणु हथियार हैं. लेकिन दुनिया के अधिकतर रणनीतिक और सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इजराइल के पास परमाणु हथियारों का जखीरा है. हालांकि, इजराइल न साफ स्वीकार करता है और न ही साफ इनकार करता है. वह परमाणु अप्रसार संधि, का सदस्य भी नहीं है.
माना जाता है कि नेगेव रेगिस्तान के डिमोना परिसर का उसके परमाणु कार्यक्रम में अहम स्थान है. इजराइल की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा यह है कि उसके विरोधी यह मानकर चलें कि उसके पास अंतिम स्तर का जवाब देने की क्षमता है. इजराइल दूसरे देशों के संदिग्ध परमाणु कार्यक्रमों को लेकर भी बहुत आक्रामक रहा है. वर्ष 1981 में उसने इराक के ओसिराक रिएक्टर पर हमला किया था. वर्ष 2007 में सीरिया के एक संदिग्ध परमाणु परिसर को भी निशाना बनाया था. ईरान के परमाणु ढांचे पर भी इजराइल लंबे समय से दबाव बनाता रहा है.
ईरान: तकनीकी रूप से सबसे आगे, पर हथियार की घोषणा नहीं
ईरान मिडिल ईस्ट के परमाणु विवाद का सबसे बड़ा केंद्र है. ईरान परमाणु अप्रसार संधि का सदस्य है. ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम बिजली, चिकित्सा और वैज्ञानिक जरूरतों के लिए है. लेकिन अमेरिका, इजराइल और कई पश्चिमी देश मानते हैं कि ईरान ने ऐसी तकनीकी क्षमता बना ली है जिससे वह कम समय में हथियारस्तर की सामग्री तैयार कर सकता है. ईरान ने यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया है.हथियार बनाने के लिए आम तौर पर करीब 90 प्रतिशत संवर्धन की जरूरत मानी जाती है, इसलिए 60 प्रतिशत स्तर को बहुत गंभीर माना जाता है.
ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई.
ईरान के प्रमुख परमाणु केंद्रों में नतांज, फोर्दो और इस्फहान का नाम आता है. बुशहर में उसका एक परमाणु बिजलीघर भी है. हाल के संघर्षों में ईरान के कुछ परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचने की खबरें आईं. फिर भी असली सवाल बना हुआ है कि आखिर ईरान के पास कितना संवर्धित यूरेनियम बचा है और उसकी परमाणु क्षमता कितनी जल्दी बहाल हो सकती है?
सऊदी अरब: ऊर्जा की जरूरत या रणनीतिक संदेश?
सऊदी अरब अभी परमाणु हथियार संपन्न देश नहीं है. वह परमाणु अप्रसार संधि का सदस्य है, लेकिन ईरान की बढ़ती क्षमता ने रियाद की सोच बदल दी है. सऊदी नेतृत्व पहले कह चुका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी ऐसा रास्ता अपना सकता है. इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकासऊदी परमाणु सहयोग की चर्चा महत्वपूर्ण तरीके से दुनिया में हो रही है. अमेरिका और सऊदी अरब के बीच नागरिक परमाणु सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण ढांचा तैयार हुआ है. इसे आम तौर पर अमेरिकी परमाणु सहयोग कानून के 123 एग्रीमेंट से जोड़कर देखा जा रहा है.
सऊदी अरब और अमेरिका परमाणु डील हुई है.
डील का घोषित मकसद परमाणु बिजली उत्पादन, नई तकनीक और ऊर्जा विविधीकरण है. सऊदी अरब तेल पर निर्भरता कम करना चाहता है. वह अपने घरेलू तेल का अधिक हिस्सा निर्यात के लिए बचाना चाहता है. लेकिन विवाद यूरेनियम संवर्धन को लेकर है. सऊदी अरब के पास यूरेनियम भंडार होने का दावा है. अगर किसी देश को अपने यहां संवर्धन की क्षमता मिलती है, तो वह भविष्य में हथियार बनाने के विकल्प के ज्यादा करीब पहुंच सकता है. इसी कारण अमेरिकी संसद के कुछ सदस्य और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ इस समझौते पर चिंता जता रहे हैं.
तुर्किए अपना पहला बड़ा परमाणु बिजली घर बना रहा है.
तुर्की: बिजलीघर बना रहा है, हथियार कार्यक्रम नहीं
तुर्की की परमाणु कहानी ईरान और इजराइल से अलग है. तुर्की परमाणु अप्रसार संधि का सदस्य है और उसके पास परमाणु हथियार होने का कोई प्रमाण नहीं है. वह अपना पहला बड़ा परमाणु बिजली घर अक्कुयू बना रहा है. यह परियोजना रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम की मदद से विकसित हो रही है. इसमें चार रिएक्टरों की योजना है. तुर्की का तर्क साफ है. उसे बिजली की बढ़ती मांग पूरी करनी है. साथ ही गैस और तेल आयात पर निर्भरता घटानी है. इसलिए उसका कार्यक्रम मुख्य रूप से नागरिक ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा है. तुर्की नाटो का सदस्य भी है. इस कारण उसकी सुरक्षा स्थिति ईरान या सऊदी अरब से अलग है.
इराक.
इराक: अधूरा सपना और पुरानी तबाही
इराक का परमाणु इतिहास सबसे ज्यादा चेतावनी देने वाला उदाहरण है. सद्दाम हुसैन के दौर में इराक ने परमाणु क्षमता हासिल करने की कोशिश की थी. 1981 में इजराइल ने बगदाद के पास ओसिराक रिएक्टर पर हमला कर उसे नष्ट कर दिया. 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय जांच में इराक के गुप्त परमाणु प्रयासों का पता चला. इसके बाद यहाँ अमेरिका ने घेराबंदी की. सद्दाम हुसैन तक को सजा मिली और उसका कार्यक्रम खत्म कर दिया गया. आज इराक के पास सक्रिय परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं है. उसका उपयोग मुख्यतः चिकित्सा, कृषि और वैज्ञानिक क्षेत्रों तक सीमित है. अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी इराक में परमाणु हथियार कार्यक्रम के पुनर्जीवित होने का प्रमाण नहीं बतातीं.
यूएईमिस्र: परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर कोई विवाद नहीं
खाड़ी के इस देश ने बराकाह में परमाणु ऊर्जा संयंत्र की स्थापना की है. इस काम में इस देश ने दक्षिण कोरिया की मदद ली. यूएई ने अपनी इच्छा से यूरेनियम संवर्धन न करने की घोषणा कर रखी है. मिस्र भी रूस की मदद से परमाणु ऊर्जा परियोजना पर काम कर रहा है. यह प्लांट एलदबा में बन रहा है. इसलिए दोनों देशों के कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ खास विवाद नहीं हैं.
क्या मिडिल ईस्ट परमाणु होड़ की तरफ बढ़ रहा है?
इजराइल की कथित हथियार क्षमता पहले से मौजूद है. ईरान ने उन्नत परमाणु तकनीक और उच्च स्तर का संवर्धन हासिल कर लिया है. सऊदी अरब नागरिक परमाणु ढांचा खड़ा करना चाहता है. तुर्की बिजली उत्पादन के लिए रिएक्टर बना रहा है. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। इन सबकी स्थितियां अलग हैं. फिर भी इनका असर एकदूसरे पर पड़ता है. ईरान आगे बढ़ता है तो सऊदी अरब दबाव महसूस करता है. सऊदी अरब को संवर्धन की अनुमति मिलती है तो दूसरे देश भी वैसी मांग कर सकते हैं. इजराइल की अस्पष्ट परमाणु नीति क्षेत्र के सुरक्षा संतुलन को लगातार प्रभावित करती है.
मिडिल ईस्ट में परमाणु मुद्दा केवल विज्ञान या बिजली का विषय नहीं है. यह सुरक्षा, शक्ति, राजनीति और भरोसे का सवाल है. सऊदीअमेरिका परमाणु डील ऊर्जा के लिए उपयोगी हो सकती है. लेकिन उसके साथ कड़ी अंतरराष्ट्रीय निगरानी, स्पष्ट नियम और पारदर्शिता जरूरी होगी. वरना नागरिक परमाणु कार्यक्रम और हथियार क्षमता के बीच की दूरी कम होती जाएगी. क्षेत्र में शांति का सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि सभी देश परमाणु हथियारों की होड़ से बचें.



