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एक दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और बलि के पास पहुंचे। बलि अपनी दानवीरता की वजह से बहुत प्रसिद्ध थे। वे किसी भी मांगने वाले को खाली हाथ नहीं जाने देते थे

दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य बताए गए हैं। भगवान शिव ने शुक्राचार्य को मृत संजीवन विद्या दी थी। इस विद्या से शुक्राचार्य मरे हुए दैत्यों को फिर से जीवित कर देते थे। जब दैत्यराज बलि का राज था।

तब एक दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और बलि के पास पहुंचे। बलि अपनी दानवीरता की वजह से बहुत प्रसिद्ध थे। वे किसी भी मांगने वाले को खाली हाथ नहीं जाने देते थे।

राजा बलि उस समय यज्ञ कर रहे थे। बलि ने वामन देव को देखा तो वह उनके पास पहुंचा। वामन देव ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। शुक्राचार्य वामन देव को पहचान गए थे कि ये विष्णु जी हैं। इसलिए उन्होंने बलि को दान देने से रोकना चाहा। राजा बलि ने अपने गुरु की बात नहीं मानी और वामन देव को दान देने के लिए तैयार हो गए।

तब शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में सूक्ष्म रूप में बैठ गए, जिससे की पानी बाहर न आए और राजा बलि भूमि दान करने का संकल्प न ले सकें।

वामन भगवान जानते थे कि शुक्राचार्य बलि के कमंडल में बैठे हैं। उन्होंने बलि के कमंडल में एक तिनका डाल दिया, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। इसके बाद शुक्राचार्य कमंडल से बाहर आ गए और बलि ने वामन देव को भूमि दान दे दी।

सीख – अगर कोई गुरु अपने शिष्य को नेक काम करने से रोकता है तो उसे इसका बुरा फल भोगना पड़ता है।

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