विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर सवाल सिर्फ काम के दबाव का नहीं, उस कॉर्पोरेट कल्चर का भी है जहां नौकरी जाने का डर और हर वक्त उपलब्ध रहने की उम्मीद कर्मचारियों को आराम नहीं लेने देती. कानपुर की रहने वाली 28 साल की ज्योति के लिए रात 11:30 बजे भी दिन खत्म नहीं होता. एक तरफ लैपटॉप पर ऑफिस के पेंडिंग काम का दबाव, दूसरी तरफ रसोई और घर की जिम्मेदारियां.

टेक कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर ज्योति कहती हैं, सुबह लॉगइन करने से लेकर रात को सिस्टम बंद करने तक, जिंदगी ऑफिस और घर के बीच पिसकर रह गई है. वर्कलाइफ बैलेंस नहीं है, लेकिन नौकरी जाने का डर और फैमिली एक्सपेक्टेशन उन्हें ब्रेक भी नहीं लेने देते.
कॉर्पोरेट वर्ल्ड में टारगेट, डेडलाइन
यह परेशानी सिर्फ ज्योति की नहीं है. कॉर्पोरेट वर्ल्ड में टारगेट, डेडलाइन और लगातार उपलब्ध रहने की अपेक्षा कर्मचारियों की मानसिक सेहत पर असर डाल रही है. 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर सवाल है क्या काम का दबाव और घरेलू जिम्मेदारियां मिलकर युवाओं को बर्नआउट की ओर धकेल रही हैं?.
काम ज्यादा, आराम कम
इंडीड की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कर्मचारियों में वर्कस्ट्रेस और बर्नआउट का स्तर 72% तक पहुंच गया, जो 2022 में 58% था. रिपोर्ट में 34.8% कर्मचारियों ने यह भी कहा कि वे ऑफिस में अपनी मानसिक परेशानी बताने से डरते हैं. लंबे कामकाजी घंटे और लॉगऑफ के बाद भी काम के मैसेज आते रहना इस दबाव को बढ़ा सकते हैं.
ग्रेट प्लेस टू वर्क की रिपोर्ट में भी भारतीय कर्मचारियों की मानसिक सेहत को लेकर चिंता जताई गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, 48% कर्मचारी गंभीर जोखिम की स्थिति में हैं और 45% से अधिक को रविवार शाम से ही अगले दिन ऑफिस जाने की चिंता होने लगती है. इसे आम तौर पर मंडे ब्लूज़ कहा जाता है.
वेलनेस सिर्फ एचआर की एक्टिविटी नहीं
मनोचिकित्सक डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, ‘सिस्टम और कंपनियों को यह समझना होगा कि वेलनेस कोई एक्टिविटी नहीं है, जिसे एचआर विभाग टिकमार्क कर दे। यह रोजमर्रा के काम का हिस्सा होना चाहिए’.
वह कहते हैं कि कर्मचारियों को अपने और परिवार के लिए समय मिलना जरूरी है. अगर कोई मानसिक समस्या से जूझ रहा है, तो कंपनी को गोपनीयता और संवेदनशीलता के साथ उसका सहयोग करना चाहिए, मनोबल बढ़ाना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उपचार के लिए प्रेरित करना चाहिए.
आपके लोग ही आपका एसेट हैं
पूर्व ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर शुभ्रा चतुर्वेदी ने 2009 की मंदी में नौकरी गंवाने के बाद फोटोग्राफी और आर्ट का सहारा लिया. तीन महीने में उन्हें एहसास हुआ कि वह अब नौकरी के बजाय यही करना चाहती है.अब वो माइंडफुल स्ट्रोक्स के जरिए कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए ऑनलाइन सेशन भी करती हैं.
शुभ्रा कहती हैं, ‘एथिक्स के हिसाब से आपके लोग ही आपका एसेट हैं। लोगों की देखभाल कीजिए, तो लोग आपके लिए अच्छा काम करेंगे। लेकिन भारत में यह मानसिकता है कि पैसा दिया है, तो काम तो लेंगे ही’.
कोविड के दौरान वर्क फ्रॉम होम ने पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के बीच की बाउंड्री ही नहीं छोड़ी.आज भी कभी भी मीटिंग रख दी जाती है. स्टॉफ को सिर्फ सैलरी और काम के घंटों से नहीं आंकना चाहिए. ‘माइंडसेट बदलना होगा। आपके लोग आपका एसेट हैं’.
बदलाव की जरूरत
कुछ कंपनियां चार दिन के वर्क वीक, मेंटल वेलनेस लीव और लॉगऑफ के बाद कर्मचारियों को संदेशों का जवाब देने से छूट देने जैसी व्यवस्थाओं पर काम कर रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि ये कदम कितनी जगह लागू हैं और क्या कर्मचारी बिना नौकरी जाने के डर के इनका इस्तेमाल कर सकते हैं?.
वर्कप्लेस की मानसिक सेहत सुधारने के लिए सिर्फ कानून या वेलनेस सेशन काफी नहीं हैं. काम का बोझ, छुट्टी लेने की आजादी,निजी समय का सम्मान और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता इन सबको कामकाजी संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा.



