Ravana postage stamp 1974: विजयदशमी पर देशभर में रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है. आज से 52 साल पहले वर्ष 1974 में भारत सरकार के डाक टिकट विभाग ने रावण पर आधारित डाक टिकट जारी किया था. उत्तर प्रदेश के हाथरस में यह दुर्लभ डाक टिकट आज भी एक शख्स के पास सुरक्षित है.

हाथरस शहर के डाक टिकट संग्रहकर्ता शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के संग्रह में वर्ष 1974 का यह खास डाक टिकट मौजूद है. डाक टिकट संग्रह के शौकीनों के लिए यह ऐतिहासिक धरोहर है. यह टिकट भारतीय संस्कृति के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें किसी चरित्र को केवल उसके एक रूप तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि उसके ज्ञान, गुणों और ऐतिहासिक महत्व को भी याद किया जाता है. शैलेंद्र के पास सुरक्षित इस टिकट की खासियत यह है कि यह रावण के उस पक्ष की ओर ध्यान खींचता है, जिसे आमतौर पर रावण दहन के दौरान चर्चा में जगह नहीं मिलती.

बुराई का प्रतीक, लेकिन विद्वान और शिवभक्त भी था रावण

रामायण में रावण को अहंकार, अधर्म और बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. भगवान श्रीराम के हाथों उसके वध को अच्छाई की बुराई पर जीत के तौर पर मनाया जाता है. इसी कारण हर साल विजयदशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. हालांकि, धार्मिक ग्रंथों और प्रचलित मान्यताओं में रावण को एक विद्वान, शास्त्रों का जानकार और भगवान शिव का भक्त भी बताया गया है. उसकी विद्वता और ज्ञान का उल्लेख भी भारतीय परंपरा का हिस्सा है. यही वजह है कि रावण के चरित्र को केवल बुराई के एक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि उसके अलगअलग पहलुओं के संदर्भ में भी देखा जाता है.

सूर्य, चंद्र और भगवान नरसिंह पर भी जारी हुए थे टिकट

वर्ष 1974 में रावण के साथ सूर्य, चंद्र और भगवान नरसिंह से संबंधित डाक टिकट भी जारी किए गए थे. इन टिकटों का संग्रह धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए खास महत्व रखता है. शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के संग्रह में मौजूद रावण का टिकट बीते दौर की डाक टिकट परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है.