पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य स्कूल सेवा आयोग की ओर से नियुक्त होने वाले स्कूली शिक्षकों के डायरेक्ट राजनीति में शामिल होने पर रोक लगा दी है. यह बैन उन मौजूदा स्कूली शिक्षकों पर लागू नहीं होगा, जो राज्य भर के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में राजनीतिक पदों पर हैं. ये नियम सिर्फ उन पर लागू होगा, जिनकी अब से भर्तियां की जाएंगी. सचिवालय में हुई बैठक में राज्य मंत्रिमंडल ने सरकारी सहायता प्राप्त और सरकार की ओर से स्पॉन्सर्ड स्कूलों के भावी शिक्षकों के लिए इस पहल को मंजूरी दी.

पत्रकारों से बात करते हुए सीएम सुभेंदु अधिकारी ने कहा कि देश के अन्य राज्यों में स्कूली शिक्षक डायरेक्ट राजनीति में शामिल नहीं होते हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए सुवेंदु ने कहा, ‘अब से पश्चिम बंगाल के शिक्षक डायरेक्ट राजनीति में शामिल नहीं होंगे. आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग के जरिए नियुक्त होने वाले स्कूली शिक्षक पंचायत, नगरपालिका, और यहां तक कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे.’ सरल भाषा में समझा जाए तो अब से टीचर न तो प्रधान और न ही न चेयरमैन बन पाएंगे. साथ ही साथ विधानसभा और लोकसभा का भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.
नियम को सख्ती से लागू करेंगे सीएम सुभेंदु
सीएम अधिकारी ने कहा, ‘यह नियम उन लोगों पर लागू नहीं होगा जो पहले से ही नियुक्त हैं और अलगअलग स्कूलों में काम कर रहे हैं क्योंकि उनके लिए ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं था, लेकिन शिक्षकों की भविष्य की नियुक्तियों में इस नियम को सख्ती से लागू किया जाएगा.’ विपक्षी दल CPI और कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की ओर से घोषित इस कदम का विरोध किया.
बंगाल में शिक्षकों की भारी कमी सुजन चक्रवर्ती
CPI नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा, ‘सरकार को शिक्षकों को डायरेक्ट राजनीति में शामिल होने से रोकने के बजाय इस बात पर प्राथमिकता देनी चाहिए कि स्कूलों में खाली पड़े शिक्षक पदों को कैसे भरा जाए, जहां पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है. केंद्र सरकार के फैसले के अनुसार, छात्रशिक्षक अनुपात 30:1 होना चाहिए, लेकिन राज्य सरकार इस लक्ष्य को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही है. राज्यभर के स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की जरूरत है. सरकार को इन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.’



