एक बच्चा खिड़की के पास बैठकर किताब पढ़ रहा है. किताब में लिखा है, ‘बारिश हो रही है. बच्चा खिड़की से बाहर देखता है. तेज धूप निकली हुई है. अब बच्चा किस पर विश्वास करे? सवाल आसान लगता है, क्योंकि यह एक बच्चे का उदाहरण है. लेकिन जरा फिर से देखिए. किताब दोबारा पढ़िए. आसमान फिर देखिए. हो सकता है आपने वाक्य गलत पढ़ा हो. हो सकता है किताब किसी दूसरी जगह की बात कर रही हो. हो सकता है मौसम बदल गया हो.

लेकिन सब कुछ जांच लेने के बाद भी अगर किताब बारिश कह रही है और आपकी आंखें धूप देख रही हैं, तो ईमानदारी एक छोटासा साहस मांगती है. जो दिखाई दे रहा है, उसे स्वीकार कीजिए. इस छोटीसी बात में पूरी जिंदगी की एक बड़ी सीख छिपी है. जब किताब और आपकी आंखें अलगअलग बात कहें, तो दोबारा जाँचिए और जो सच में दिखाई दे रहा है, उसके प्रति ईमानदार रहिए.
ज्ञान का सम्मान करने का अर्थ
इसकी पहली परत तथ्यों की है. हमें किताबों, शिक्षकों, जानकार लोगों, परंपराओं और संस्थाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है. यह जरूरी भी है, क्योंकि हर इंसान दुनिया की हर बात खुद नहीं खोज सकता. एक किताब सैकड़ों वर्षों का ज्ञान एक बच्चे के हाथ में पहुंचा सकती है. लेकिन ज्ञान का सम्मान करने का अर्थ अपनी आंखों और समझ को बंद कर देना नहीं है. पुरानी सीख यही कहती है कि ज्ञान को पढ़ने, सोचने और अपने अनुभव की कसौटी पर भी परखना चाहिए.
अगर थर्मामीटर कहता है कि बुखार नहीं है, लेकिन मरीज कांप रहा है, तो अच्छा डॉक्टर न थर्मामीटर फेंकता है, न मरीज की बात. वह दोनों को दोबारा जांचता है. सच को ईमानदारी से पूछे गए सवाल कमजोर नहीं करते. झूठ जरूर कमजोर पड़ता है.
हमारी पहले से बनी कहानी
दूसरी परत हमारे मन की है. कई बार हमारी आंखें कोई बात साफ देख रही होती हैं, फिर भी मन उसे मानने से इनकार कर देता है, क्योंकि उसे मानने से हमारी पहले से बनी कहानी टूट सकती है. मान लीजिए दो पुराने दोस्त किसी व्यक्ति को गलत व्यवहार करते देखते हैं. एक कहता है, मैंने अपनी आंखों से देखा कि उसने क्या किया.
दूसरा कहता है, नहीं, वह ऐसा कर ही नहीं सकता. वह बहुत अच्छा इंसान है. यहां दूसरे व्यक्ति ने उस घटना को नहीं देखा, बल्कि अपने मन में बनी पुरानी तस्वीर को बचाया. हम सब कभी न कभी ऐसा करते हैं. एक बार हमने किसी को अच्छा, बुरा, समझदार, मूर्ख, अपना या पराया मान लिया, तो नई सच्चाई को उस पुराने नाम से लड़कर हमारे भीतर जगह बनानी पड़ती है. मन कई बार परेशान करने वाले सच से ज्यादा आराम देने वाली गलत बात को पसंद करता है.
पूरी कहानी समझ में आ गई
पत्रकारिता ने मुझे यह बात बहुत सीधे तरीके से सिखाई है. कई बार किसी घटना की पहली सूचना न्यूज़रूम में पहुंचती है और लगता है कि पूरी कहानी समझ में आ गई. तभी जमीन पर मौजूद रिपोर्टर कहता है, सर, यहां जो मैं देख रहा हूं, वह कुछ और है. यह एक बहुत महत्वपूर्ण वाक्य है. सबसे आसान रास्ता होगा कि जो पहले मान लिया गया है, उसी में असली घटना को किसी तरह फिट कर दिया जाए. मुश्किल लेकिन ईमानदार रास्ता है कि सवाल को फिर से खोला जाए.
पत्रकारिता धीरेधीरे यह सिखाती है कि तथ्यों की जिम्मेदारी कल की खबर को सही साबित करना नहीं है. अगर सच्चाई कहानी बदल रही है, तो कहानी बदलनी चाहिए. सच्चाई को यह आदेश नहीं दिया जा सकता कि वह हमारे हिसाब से बदल जाए.
मैंने अपने बारे में खुद लिख रखी है?
फिर इसकी तीसरी और सबसे कठिन परत आती है. क्या हो अगर वह किताब कोई असली किताब ही न हो? क्या हो अगर वह कहानी हो जो मैंने अपने बारे में खुद लिख रखी है? मैं हमेशा सही हूं. मेरी नीयत हमेशा अच्छी होती है. मैं किसी को दुख नहीं देता. लोग मुझे समझते नहीं हैं. धीरेधीरे ये वाक्य हमारे भीतर लिखी ऐसी किताब बन सकते हैं, जिस पर हम सवाल करना बंद कर देते हैं. फिर एक दिन जिंदगी हमारे सामने कुछ और दिखाती है.
हमारा कोई अपना हमारे सामने चुप रहने लगता है. कोई साथी हमसे असहमति जताना बंद कर देता है. कोई बच्चा हमसे बातें छिपाने लगता है. भीतर की किताब कहती है, मुझमें कोई गलती नहीं है. लेकिन हमारी आंखों के सामने कुछ और दिखाई दे रहा होता है.
अखबार की किसी बात पर सवाल उठाना आसान
यहीं खुद को जानना थोड़ा कठिन हो जाता है. अखबार की किसी बात पर सवाल उठाना आसान है, खुद पर सवाल उठाना मुश्किल. छपे हुए वाक्य को कलम से ठीक किया जा सकता है. लेकिन अपने बारे में लिखी कहानी को ठीक करने के लिए शायद यह कहना पड़े, हो सकता है मैं गलत था. दुनिया की बहुतसी पुरानी ज्ञान परंपराएं आखिर इसी जगह पहुंचती हैं. सबसे बड़ी अज्ञानता केवल यह नहीं कि हमें कुछ मालूम नहीं है. उससे बड़ी अज्ञानता यह मान लेना है कि हमें सब मालूम है. इसलिए समझदार मन अपने ही निष्कर्षों को भी देखना सीखता है.
एक छोटासा प्रयोग किया जा सकता है. अगली बार कोई बात आपके पुराने विश्वास को सही साबित करे, तो तुरंत खुश होने से पहले पूछिए, ऐसी कौनसी बात होगी जो मेरी राय बदल सकती है? और जब कोई बात आपके विश्वास के खिलाफ जाए, तो उसे तुरंत गलत कहने से पहले पूछिए, अगर यह सच हुआ तो? इसका अर्थ हर चीज पर शक करना नहीं है. इसका अर्थ केवल इतना है कि सच आए तो हमारे भीतर उसके लिए दरवाजा खुला रहे.
उम्र के साथ सवाल बदल जाते हैं?
पांच साल का बच्चा टूटे खिलौने को देखकर पूछ सकता है, क्या सच में मेरे भाई ने इसे तोड़ा है, या मैंने बस मान लिया? 95 साल का इंसान अपने 70 साल पुराने विश्वास से यही सवाल पूछ सकता है. उम्र के साथ सवाल बदल जाते हैं, लेकिन ईमानदारी दोनों से एक ही चीज मांगती है. शायद इसीलिए देखना आसान है, लेकिन सच में देख पाना कठिन. हमारी आंखें दुनिया को देखती हैं, लेकिन दुनिया और हमारी समझ के बीच यादें, डर, लगाव, अहंकार, आदतें और इच्छाएं खड़ी रहती हैं. शायद समझदारी की पूरी यात्रा इन्हीं पर्दों को धीरेधीरे हटाने की यात्रा है.
शिक्षक का सम्मान होना चाहिए
किताब का सम्मान होना चाहिए. शिक्षक का सम्मान होना चाहिए. परंपरा का सम्मान होना चाहिए. अपने अनुभव का भी सम्मान होना चाहिए. लेकिन इन सबसे ऊपर सच का सम्मान होना चाहिए, और सच का सम्मान करने का अर्थ है खुद को बदलने के लिए तैयार रहना. जब मेरा विश्वास और मेरी आंखों के सामने दिखाई दे रहा सच आपस में न मिलें, तो मैं भीतर ही भीतर किससे बदलने की उम्मीद कर रहा हूं, अपने विश्वास से या सच से?



