शनिवार सुबह नेहा का फोन बजा. दोपहर 1 बजे फैमिली गेटटुगेदर है, लेकिन कुक ने कहा दीदी, आज नहीं आ पाऊंगी. सिंक में बर्तनों का पहाड़ था, सफाई वाली का फोन स्विच ऑफ और 11 बजे ऑफिस की ज़ूम मीटिंग. पहले इस सिचुएशन का मतलब था, 10 जगह फोन घुमाना और वीकेंड का कबाड़ा. लेकिन आज दिल्लीएनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु के यंग कपल्स के लिए यह पैनिक मोमेंट नहीं है. नेहा ने ऐप खोला और 10 मिनट में ‘हाउसहेल्प’ दरवाजे पर थी. 2 घंटे में बर्तन से लेकर सब्जी कटाई तक सब निपट गया और बाद की सफाई की निपट गई. अर्बन इंडिया अब ‘महीने की बाई’ के झंझट से आगे बढ़कर ‘ऑनडिमांड लाइफस्टाइल’ पर शिफ्ट हो चुका है.

बाई नहीं आई से सर्विस बुक कर लो तक
2026 में इंस्टेंट घरेलू मदद का ये मॉडल खास तौर पर दिल्लीएनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में तेजी से दिखाई दे रहा है. कुछ प्लेटफॉर्म 10 से 15 मिनट में घरेलू मदद पहुंचाने का मॉडल अपना रहे. अप्रैल 2026 में तीन बड़े इंस्टेंट हाउसहेल्प प्लेटफॉर्म की कंबाइन मंथली बुकिंग करीब 30 से 31 लाख तक पहुंच गई, जो फरवरी में सिर्फ 20 लाख थी.
ऐसी ही एक सर्विस प्रोवाइडर कंपनी में काम करने वाली दीपा कहती हैं, मेरे लिए ऐप से काम करना किसी एक घर में काम करने से कहीं बेहतर है. ऐप पर जैसे ही काम मिलता है, मैं वहां पहुंचती हूं और अपना काम करके आराम से चली आती हूं. टाइम की कोई चिकचिक नहीं है. एक डेडलाइन में अपना काम पूरा करना होता है. ऐप हमें पूरी सेफ्टी फैसिलिटी देता है. कोई दिक्कत हो तो कंपनी तुरंत मदद के लिए तैयार रहती है इसलिए सुरक्षा का डर नहीं रहता. हालांकि, कई बार कुछ ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो काम में बहुत नुक्स निकालते हैं तो परेशानी होती है, लेकिन अच्छी बात ये है, हमें काम पूरा होते ही एकमुश्त पैसा मिल जाता है और कंपनियां जो अलग से इंसेंटिव देती हैं, उससे हमारी कमाई काफी अच्छी हो जाती है, जबकि बिना ऐप के काम करने जाने पर ऐसा नहीं होता है.
घरेलू काम अब नौकरी नहीं, सर्विस
पहले किसी घरेलू कामगार का एक परिवार के साथ सालों पुराना, सुखदुख का एक सगा रिश्ता हुआ करता था. काम करने के घंटे तय थे, समय तय था और महीने के आखिर में मिलने वाली तनख्वाह भी पक्की थी लेकिन अब ऐप बेस्ड इस नए मॉडल ने उस ह्यूमन कनेक्शन को बदल दिया है.
टेक्नोलॉजी और इंटरनेट से जुड़े टॉपिक पर रिसर्च करने वाली संस्था ‘सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी की एक रिपोर्ट बताती है, ऐप से काम ढूंढना आसान हुआ है, लेकिन कमाई, रेटिंग, कमीशन और नौकरी की सुरक्षा को लेकर अब भी कई सवाल हैं.
सिर्फ सफाई नहीं, अब कुक और दूसरी सर्विस भी
ये चेंज केवल झाड़ूपोंछे तक सीमित नहीं है. घरेलू काम के इस नए बाजार में खाना बनाने, बर्तन साफ करने और दूसरे छोटेमोटे घरेलू कामों को भी घंटे या काम के हिसाब से मिल रहा, यानी इंडियन मिडिल क्लास के घर में एक कामवाली, एक कुक और एक ड्राइवर वाले पुराने मॉडल के साथ अब एक दूसरा मॉडल खड़ा हो रहा है, जब जरूरत हो, तभी सर्विस लो. इसे आप घरेलू काम का ऑनडिमांड मॉडल कह सकते हैं.
आईटी कंपनी में काम करने वाली अनिता कहती हैं, वर्किंग वूमेन होने की वजह से मेरे पास टाइम का ही क्राइसिस रहता है.. ऑफिस वर्क और घर की जिम्मेदारी के बीच, मैं बाई के रोजरोज नखरों और बिना बताए छुट्टियों के झंझट से उकता चुकी थी, अब मैं जरूरत के हिसाब से ऑनडिमांड सर्विस ले लेती हूं. सबसे बड़ा फायदा ये है, जब मुझे सच में जरूरत होती है, मैं ऐप से सर्विस बुक कर लेती हूं और जितना काम, उतने ही पैसे देती हूं.
क्या टिकेगा ये मॉडल?
आने वाले समय में शायद दोनों मॉडल साथसाथ चलें. जिन्हें रोज मदद चाहिए, वो परमानेंट हेल्प रखेंगे और कभीकभार जरूरत वाले लोग ऐप से सर्विस ले सकेंगे. लेकिन सवाल केवल सर्विस का नहीं है. ग्राहक का काम आसान हुआ है तो क्या कामगार के लिए भी कमाई और काम की सुरक्षा बढ़ी है क्योंकि घरेलू काम का भविष्य सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि मदद कितनी जल्दी मिलती है, इस बात से भी तय होगा कि काम करने वाले के लिए ये काम कितना सुरक्षित और टिकाऊ है.



