Barapullah Phase3 Traffic Jam: दिल्ली के बारापुला एलिवेटेड कॉरिडोर फेज3 पर इन दिनों लग रहा जाम एक बड़े सवाल की तरफ इशारा कर रहा है आखिर जिस फ्लाईओवर को ट्रैफिक की समस्या कम करने के लिए बनाया गया था, उसी पर ट्रैफिक क्यों फंस रहा है? करीब 11 साल के इंतजार के बाद 29 सितंबर को बारापुला फेज3 का उद्घाटन हुआ. 30 सितंबर से इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया. उम्मीद थी कि इससे सराय काले खां, मयूर विहार और नोएडा की तरफ से आनेजाने वाले लोगों को राहत मिलेगी, लेकिन पूरी तरह ट्रैफिक शुरू होते ही यहां जाम की समस्या सामने आने लगी.

अब फ्लाईओवर के डिजाइन, लेन क्षमता, ट्रैफिक मर्जिंग, साइन बोर्ड और ट्रैफिक मैनेजमेंट को लेकर सवाल उठ रहे हैं. टाउन प्लानर ए के जैन ने भी माना है कि ट्रैफिक के अनुमान और डिजाइन में कहीं न कहीं चूक हो सकती है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर बारापुला फेज3 पर जाम की असली वजह क्या है?

1. जिस जाम से बचाने के लिए फ्लाईओवर बना, उसी पर जाम

बारापुला फेज3 एलिवेटेड कॉरिडोर का मकसद था कि दिल्ली के इस हिस्से में ट्रैफिक का दबाव कम किया जाए. खासकर सराय काले खां, मयूर विहार, नोएडा और आसपास के इलाकों से आनेजाने वाले वाहनों को बेहतर रास्ता मिले, लेकिन मौजूदा स्थिति में मयूर विहार फेज1 की तरफ से बारापुला फेज3 पर चढ़ने के करीब 500 मीटर बाद ही वाहनों की रफ्तार धीमी होने लगती है. इसके बाद कई जगहों पर ट्रैफिक रेंगता हुआ नजर आता है. यानी जिस रास्ते से लोगों को तेजी से निकलना था, उसी रास्ते पर वाहनों की लंबी कतार लग रही है.

2. सबसे बड़ी समस्या 3 जगहों से आने वाला ट्रैफिक

बारापुला फेज3 पर जाम की सबसे बड़ी वजह ट्रैफिक का एक ही जगह पर ज्यादा मात्रा में पहुंचना बताई जा रही है. बारापुला फेज3 से आने वाला ट्रैफिक अलग है. सराय काले खां की तरफ से आने वाला ट्रैफिक अलग है. इसके अलावा नोएडा की तरफ से आने वाले वाहनों का दबाव भी इसी नेटवर्क पर पड़ता है. समस्या तब बढ़ जाती है, जब अलगअलग दिशाओं से आने वाला ट्रैफिक एक ही जगह पर आकर मिल जाता है.

आसान भाषा में समझें तो तीन अलगअलग रास्तों से आने वाला ट्रैफिक आगे जाकर सिर्फ तीन लेन के रास्ते में सिमट जाता है. यही जगह बॉटलनेक बन जाती है. जब वाहनों की संख्या ज्यादा होती है तो ट्रैफिक पुलिस को भी एकएक दिशा के वाहनों को रोककर दूसरी दिशा के वाहनों को निकालना पड़ता है. इससे कुछ समय के लिए एक तरफ का ट्रैफिक चलता है, तो दूसरी तरफ वाहनों की लाइन और लंबी हो जाती है.

3. 89 लेन का ट्रैफिक, आगे सिर्फ 3 लेन

जाम की समस्या को समझने के लिए लेन की क्षमता को समझना जरूरी है. रिपोर्ट के मुताबिक अलगअलग दिशाओं से आने वाला करीब 8 से 9 लेन का ट्रैफिक आगे जाकर बारापुला की करीब 3 लेन में सिमट जाता है. यही अंतर ट्रैफिक के दबाव को बढ़ाता है. मान लीजिए एक तरफ से 3 लेन का ट्रैफिक आ रहा है और दूसरी तरफ से भी 3 लेन के वाहन आ रहे हैं. आगे दोनों को तीन लेन में ही जाना है. इसके बाद तीसरी दिशा से आने वाला ट्रैफिक भी उसी नेटवर्क में जुड़ जाता है. ऐसे में वाहनों की संख्या सड़क की क्षमता से ज्यादा हो जाती है. नतीजा स्पीड कम, लेन बदलने की कोशिश ज्यादा और धीरेधीरे लंबा जाम.

4. दूसरा मर्जर प्वाइंट भी बना परेशानी

सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि आगे एक और मर्जर प्वाइंट है. बारापुला फेज3 से आने वाला ट्रैफिक और सराय काले खां की तरफ से आने वाला ट्रैफिक आगे जाकर पुराने बारापुला मार्ग से जुड़ता है. इसी जगह नोएडा की तरफ से आने वाला ट्रैफिक भी नेटवर्क में शामिल होता है. यानी तीन दिशाओं का ट्रैफिक एक ही जगह पर पहुंचता है. यहां भी सड़क की लेन क्षमता सीमित है. जब वाहनों की संख्या अचानक बढ़ जाती है तो ट्रैफिक पुलिस को ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए वाहनों को बारीबारी से निकालना पड़ता है. इसका सीधा असर पीछे तक दिखाई देता है. एक जगह ट्रैफिक रुका तो कुछ ही मिनट में उसके पीछे वाहनों की लंबी कतार बनने लगती है.

5. 38 हजार वाहनों के हिसाब से बनी व्यवस्था

बारापुला फेज3 को लेकर सामने आई एक और बड़ी चिंता ट्रैफिक के अनुमान से जुड़ी है. जानकारी के मुताबिक इस कॉरिडोर को करीब 38 हजार वाहनों के हिसाब से तैयार किया गया था, लेकिन मौजूदा समय में यहां से गुजरने वाले वाहनों की संख्या 75 हजार तक पहुंचने की बात सामने आ रही है. अगर सड़क की क्षमता से करीब दोगुना ट्रैफिक किसी नेटवर्क पर आ जाए तो जाम की स्थिति बनना स्वाभाविक है. यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था पर नहीं, बल्कि कॉरिडोर की प्लानिंग और भविष्य के ट्रैफिक अनुमान पर भी उठ रहे हैं.

6. क्या डिजाइन में हुई गलती?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बारापुला फेज3 के डिजाइन में कोई कमी रह गई? टाउन प्लानर ए के जैन ने भी माना है कि किसी फ्लाईओवर या सड़क की योजना बनाते समय सिर्फ मौजूदा ट्रैफिक को नहीं देखा जाना चाहिए. भविष्य में ट्रैफिक कितना बढ़ेगा, कहां से आएगा और किस जगह पर मर्ज होगा, इसका भी अनुमान जरूरी है. उनके मुताबिक, किसी भी फ्लाईओवर, ब्रिज या अंडरपास की क्षमता तय करते समय लंबे समय के ट्रैफिक प्रोजेक्शन को ध्यान में रखना चाहिए. उनका कहना है कि करीब 50 साल के ट्रैफिक प्रोजेक्शन के आधार पर क्षमता तय करनी चाहिए. उनके मुताबिक, बारापुला के मामले में कहीं न कहीं कैलकुलेशन में गलती हुई लगती है. यानी सवाल सिर्फ आज के जाम का नहीं है. सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में बढ़ने वाले ट्रैफिक को ध्यान में रखकर इसकी योजना बनाई गई थी?

7. छोटे और नीचे लगे साइन बोर्ड भी परेशानी की वजह

बारापुला फेज3 पर सिर्फ सड़क की क्षमता और डिजाइन ही सवालों के घेरे में नहीं है. साइन बोर्ड को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, कई जगह साइन बोर्ड काफी नीचे लगे हैं। इसके अलावा इन पर लिखे अक्षरों का आकार भी छोटा है. तेज रफ्तार से चल रहे वाहन चालक के लिए दूर से छोटे अक्षरों वाले बोर्ड को पढ़ना मुश्किल हो सकता है. अगर चालक को आखिरी समय में पता चले कि उसे किस दिशा में जाना है, तो वह अचानक लेन बदलने की कोशिश कर सकता है. इससे भी ट्रैफिक की रफ्तार प्रभावित होती है. साइन बोर्ड पर्याप्त ऊंचाई पर और बड़े फॉन्ट में हों तो वाहन चालकों को पहले से पता चल सकेगा कि उन्हें किस दिशा में जाना है.

8. गूगल मैप ने भी बढ़ाई परेशानी?

बारापुला फेज3 के शुरू होने के बाद एक और समस्या सामने आई गूगल मैप पर नए रूट की जानकारी. नए कॉरिडोर के कारण ट्रैफिक का रूट बदला है. ऐसे में मैप पर दिखने वाली जानकारी और जमीन पर मौजूद वास्तविक ट्रैफिक स्थिति के बीच अंतर होने से वाहन चालक नए रास्ते की तरफ बढ़ रहे हैं. अगर बड़ी संख्या में लोग एक ही रूट को सबसे तेज रास्ता समझकर चुनते हैं, लेकिन उसी रास्ते पर पहले से भारी जाम है, तो समस्या और बढ़ जाती है. यानी तकनीक से रास्ता खोजने की सुविधा है, लेकिन अगर लाइव ट्रैफिक की जानकारी सही तरीके से अपडेट न हो तो वही सुविधा जाम बढ़ाने का कारण भी बन सकती है.

9. ट्रैफिक पुलिस भी कर रही है कंट्रोल

जब अलगअलग दिशाओं का ट्रैफिक एक जगह पहुंचता है तो ट्रैफिक पुलिस को मौके पर वाहनों को नियंत्रित करना पड़ रहा है. कई जगह एक दिशा का ट्रैफिक रोककर दूसरी दिशा के वाहनों को निकाला जा रहा है. इसका मकसद बॉटलनेक को संभालना है, लेकिन इससे पीछे वाहनों की कतार बढ़ती जाती है. यानी ट्रैफिक पुलिस फिलहाल जाम को मैनेज करने की कोशिश कर रही है, लेकिन मूल समस्या सड़क की क्षमता और ट्रैफिक के दबाव से जुड़ी दिखाई दे रही है.

10. 11 साल का इंतजार, लेकिन 11 दिन में सवाल

बारापुला फेज3 का दिल्लीवासियों ने करीब 11 साल इंतजार किया. लंबे समय तक निर्माण और अलगअलग वजहों के चलते प्रोजेक्ट में देरी होती रही. 29 सितंबर को उद्घाटन के बाद उम्मीद थी कि अब पूर्वी दिल्ली, सराय काले खां और नोएडा की तरफ आनेजाने वाले लोगों को बड़ी राहत मिलेगी, लेकिन आम लोगों के लिए खुलने के कुछ ही दिनों बाद जाम की तस्वीर सामने आने लगी. यही वजह है कि अब लोगों के मन में सवाल है क्या प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले ट्रैफिक मर्जिंग और क्षमता का पर्याप्त परीक्षण किया गया था?

11. एक लेन बंद होने से स्थिति और बिगड़ी

मयूर विहार से आश्रम की दिशा में एक लेन बंद होने की स्थिति ने भी ट्रैफिक व्यवस्था को प्रभावित किया. इस दौरान वाहनों को पीछे जाकर मुख्य लेन में मर्ज करना पड़ा. पहले से ही जिस सड़क पर अलगअलग दिशाओं से ट्रैफिक आ रहा हो, वहां एक लेन कम होने से वाहनों के मर्जर का दबाव और बढ़ जाता है. नतीजा यह हुआ कि पहले से मौजूद बॉटलनेक पर ट्रैफिक का दबाव और बढ़ गया.

क्या हो सकता है समाधान?

  • बारापुला फेज3 पर जाम कम करने के लिए सबसे पहले सभी मर्जर पॉइंट की समीक्षा करनी होगी.
  • तीनों दिशाओं से आने वाले ट्रैफिक को अलगअलग तरीके से डायवर्ट करने की संभावना देखनी होगी.
  • जहां सड़क की क्षमता अचानक कम हो रही है, वहां इंजीनियरिंग समाधान तलाशना होगा.
  • तेज टर्न वाले हिस्से की डिजाइन की समीक्षा करनी होगी.
  • साइन बोर्ड को ऊंचा, बड़ा और ज्यादा स्पष्ट करना होगा.
  • लेन मार्किंग को बेहतर करना होगा.
  • ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था को ट्रैफिक के वास्तविक दबाव के हिसाब से बदलना होगा.
  • सबसे जरूरी, भविष्य में बढ़ने वाले ट्रैफिक को ध्यान में रखकर स्थायी समाधान तैयार करना होगा.

सवाल सिर्फ जाम का नहीं, प्लानिंग का भी

बारापुला फेज3 का मकसद ट्रैफिक को आसान बनाना था, लेकिन अगर अलगअलग रास्तों का ट्रैफिक एक ही जगह पर आकर फिर उसी सीमित क्षमता वाली सड़क पर फंस रहा है, तो यह पूरी ट्रैफिक प्लानिंग पर सवाल खड़े करता है. अब जरूरत इस बात की है कि ट्रैफिक विशेषज्ञ पूरे कॉरिडोर का दोबारा अध्ययन करें. यह देखा जाए कि कहांकहां ट्रैफिक मर्ज हो रहा है, किस प्वाइंट पर कितने वाहन पहुंच रहे हैं और भविष्य में वाहनों की संख्या कितनी बढ़ सकती है.

क्योंकि सिर्फ जाम को ट्रैफिक पुलिस के जरिए नियंत्रित करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा. अगर मूल वजह डिजाइन, लेन क्षमता और मर्जर प्वाइंट हैं तो उसका समाधान भी उसी स्तर पर करना होगा. बारापुला फेज3 से दिल्ली को राहत मिलेगी या यह खुद दिल्ली के लिए नया ट्रैफिक बॉटलनेक बन जाएगा, अब इसका जवाब आने वाले दिनों में होने वाले ट्रैफिक अध्ययन और सुधारों से ही मिलेगा.