भारत में आज जब गैंडों का नाम लिया जाता है तो आमतौर पर असम, उत्तर बंगाल, नेपाल और दुधवा जैसे क्षेत्रों की तस्वीर सामने आती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी उत्तराखंड की तराई भी गैंडों की मौजूदगी की गवाह रही है? कॉर्बेट पार्क पहुंचे प्रसिद्ध लेखक, स्पीकर और वाइल्डलाइफ विशेषज्ञ रजा काजमी ने गैंडों के इतिहास से जुड़ी ऐसी ही बेहद रोचक जानकारी साझा की, जिसने उत्तराखंड के वन्यजीव इतिहास को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.

रजा काजमी ने बताया कि आज गैंडों को मुख्य रूप से असम, नेपाल और नॉर्थ बंगाल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में उत्तराखंड में भी गैंडों की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं. उन्होंने बताया कि भारत में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए गैंडे के शुरुआती चित्रों में से एक उत्तराखंड में ही तैयार किया गया था.

कब थे कॉर्बेट में गैंडे?

काजमी के मुताबिक, करीब 237 साल पहले अंग्रेज चित्रकार थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल भारत भ्रमण पर निकले थे. दोनों कलाकार भारत के अलगअलग हिस्सों के भूगोल, प्रकृति और वन्यजीवों के चित्र तैयार कर रहे थे. इसी दौरान वे कोटद्वार क्षेत्र पहुंचे. यहां उन्होंने एक नदी के किनारे गैंडे को पानी पीते हुए देखा.

बताया जाता है कि दोनों चित्रकार गैंडे को देखने के लिए उसके काफी करीब पहुंचे और उसका स्केच तैयार किया. बाद में इसी स्केच के आधार पर गैंडे की पेंटिंग बनाई गई. रजा काजमी के अनुसार, उस समय गैंडे को वहां से भगाने के लिए गोली भी चलाई गई थी. उन्होंने बताया कि यह घटना इस बात का महत्वपूर्ण संकेत है कि उत्तराखंड की तराई में कभी गैंडों की मौजूदगी थी.

इतना ही नहीं, गैंडों के ऐतिहासिक विस्तार की बात करें तो पश्चिम में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र की तराई तक और उससे भी पहले मुगलकालीन दस्तावेजों में पेशावर तक गैंडों के पाए जाने का उल्लेख मिलता है.

क्या कहते हैं शोध?

शोध के आधार पर भी देखें तो वन्यजीव इतिहास पर शोध करने वाले Rhino Resource Center में प्रकाशित शोध के मुताबिक, अंग्रेज चित्रकार विलियम डेनियल ने 20 अप्रैल 1789 को कोटद्वार के पास गैंडा देखा था. वह अपने चाचा थॉमस डेनियल के साथ भारत यात्रा पर थे. दोनों उस समय नजीबाबाद के आसपास रुके हुए थे और श्रीनगर की ओर जाने की योजना बना रहे थे.

शोध में दर्ज विवरण के मुताबिक, चित्रकारों ने एक छोटी नदी के दूसरी ओर पानी के पास खड़े नर गैंडे को देखा. विलियम डेनियल ने सुरक्षित जगह से उसके करीब पहुंचकर स्केच बनाया. इसके बाद बंदूक चलाई गई और गैंडा जंगल की ओर चला गया. यह विवरण विलियम डेनियल और हॉबर्ट कॉन्टर की 1835 में प्रकाशित पुस्तक The Oriental Annual में भी मिलता है.

ऐतिहासिक प्रमाण

उत्तराखंड और आसपास के इलाकों में गैंडे पाए जाते थे… इस बात के पक्ष में ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं. भारतीय वन्यजीव संस्थान और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के National Studbook of One Horned Rhinoceros में गैंडे के ऐतिहासिक विस्तार का उल्लेख सिंधु नदी घाटी से ब्रह्मपुत्र घाटी तक मिलता है. इसमें उत्तरी भारत के बड़े भूभाग का ऐतिहासिक वितरण शामिल है.

आज गैंडों का प्राकृतिक क्षेत्र काफी सीमित हो चुका है. भारत में मुख्य रूप से असम, उत्तर बंगाल और उत्तर प्रदेश के दुधवा तथा नेपाल के कुछ क्षेत्रों में गैंडे पाए जाते हैं. ऐसे में उत्तराखंड में गैंडों की ऐतिहासिक मौजूदगी से जुड़ी यह जानकारी कॉर्बेट और इसके आसपास की जैव विविधता और वन्यजीव इतिहास की एक बेहद दिलचस्प और अनसुनी कहानी सामने लाती है.