शिमला। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार के फैसलों पर न्यायिक समीक्षा के बीच हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण आदेश दिया है। इस बार मामला मंत्री विक्रमादित्य सिंह के लोक निर्माण विभाग (PWD) के इंजीनियर-इन-चीफ नरिंदर पॉल सिंह चौहान को दिए गए छह महीने के सेवा विस्तार से जुड़ा है।

 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा विस्तार को अवैध, मनमाना और प्रारंभ से ही शून्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी सरकारी आदेश में केवल ‘जनहित’ लिख देने से जनहित साबित नहीं हो जाता। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ के इस फैसले से लोक निर्माण विभाग के प्रशासनिक निर्णय पर सवाल खड़े हुए हैं। अदालत ने अधिकारी को तत्काल पद छोड़ने और कार्यभार सौंपने के निर्देश दिए हैं। 

 

जनहित के नाम पर सेवा विस्तार पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी अधिकारी को सेवा विस्तार देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए असाधारण परिस्थितियां और ठोस जनहित का आधार होना जरूरी है। अदालत ने टिप्पणी की कि ‘जनहित’ कोई जादुई शब्द नहीं है, जिसके इस्तेमाल मात्र से किसी फैसले को उचित ठहराया जा सके। सरकार को यह बताना होगा कि आखिर किस जनहित में अधिकारी को सेवा विस्तार दिया गया और इसके लिए निर्धारित शर्तें कैसे पूरी हुईं।

चीफ इंजीनियर को तुरंत पद छोड़ने के आदेश

नरिंदर पॉल सिंह चौहान को 28 अप्रैल 2026 को छह महीने का सेवा विस्तार दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस अधिसूचना को अवैध, मनमाना और प्रारंभ से ही शून्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि चौहान तत्काल इंजीनियर-इन-चीफ का पद छोड़ें और अपना कार्यभार सौंप दें। इस आदेश के बाद विभाग में पदोन्नति और नए अधिकारी की नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है।

 

सेवा विस्तार के लिए तय शर्तें पूरी नहीं हुईं

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की हैंडबुक ऑन पर्सनल मैटर्स, वॉल्यूम-II के अध्याय 22 का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद सेवा विस्तार केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में दिया जा सकता है। इसके लिए जनहित का स्पष्ट आधार होना चाहिए। साथ ही दो में से कम से कम एक शर्त पूरी होनी जरूरी है—या तो पद संभालने के लिए कोई अन्य अधिकारी पर्याप्त रूप से तैयार न हो, या सेवानिवृत्त होने वाला अधिकारी असाधारण योग्यता वाला हो। अदालत के अनुसार, इस मामले में सरकार और संबंधित अधिकारियों की ओर से ऐसी शर्तों को पूरा करने का पर्याप्त आधार रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया।

 

पदोन्नति प्रक्रिया शुरू होने के बाद रोकी

मामले में अदालत ने पाया कि चौहान की 30 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित सेवानिवृत्ति के बाद इंजीनियर-इन-चीफ का पद भरने के लिए स्क्रीनिंग कमेटी गठित कर दी गई थी। पदोन्नति के लिए अधिकारियों के नामों पर विचार करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी। हालांकि, सेवा विस्तार मंजूर होने के बाद इस प्रक्रिया को रोक दिया गया और बाद में बंद कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम को अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना। अदालत के निर्देश के बाद अब सरकार को पदोन्नति संबंधी प्रक्रिया फिर से पूरी करनी होगी।

 

 

तय प्रक्रिया के तहत नहीं सेवा विस्तार

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि सेवा विस्तार के लिए निर्धारित प्रोफार्मा न तो विभाग की ओर से भरा गया और न ही सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया। राज्य सरकार के जवाब में भी ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिया गया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि सेवा विस्तार के लिए आवश्यक शर्तें पूरी की गई थीं। अदालत ने कहा कि सरकार के लिए अपने ही प्रशासनिक निर्देशों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है।

28 अप्रैल को मिली मंजूरी

फैसले में हाईकोर्ट ने 7 अप्रैल 2026 को जारी सरकारी निर्देश का भी उल्लेख किया। इस निर्देश में सेवा विस्तार और पुनर्नियोजन के प्रस्तावों पर रोक लगाने तथा संबंधित नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की बात कही गई थी। इसके बावजूद 28 अप्रैल 2026 को चौहान को छह महीने का सेवा विस्तार दे दिया गया। अदालत ने मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड और निर्धारित प्रक्रिया के पालन की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस फैसले को रद्द कर दिया।

 

पदोन्नति के लिए पात्र पाए गए तो 1 मई से मिलेगा लाभ

नरिंदर पॉल सिंह चौहान ने अपनी याचिका में सेवा विस्तार के आदेश को चुनौती देने के साथ इंजीनियर-इन-चीफ के पद पर पदोन्नति की मांग भी की थी। उनका कहना था कि वह पदोन्नति के लिए निर्धारित सेवा संबंधी मानदंड पूरे करते हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अप्रैल 2026 में शुरू की गई स्क्रीनिंग कमेटी की प्रक्रिया दोबारा शुरू कर 11 नवंबर 2026 तक पूरी करने का निर्देश दिया है।

 

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कमेटी चौहान को पदोन्नति के लिए उपयुक्त पाती है और उनके नाम की सिफारिश करती है, तो उन्हें 1 मई 2026 से पदोन्नति दी जाएगी। ऐसी स्थिति में उन्हें वरिष्ठता, वेतन निर्धारण और वास्तविक मौद्रिक लाभ सहित सभी परिणामी लाभ मिलेंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस परिस्थिति में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा।