घर खरीदने के लिए लोग अपनी जिंदगीभर की कमाई लगा देते हैं, लेकिन इसके बाद भी अगर फ्लैट का मालिकाना हक न मिले, तो उनकी परेशानी आसानी से समझी जा सकती है. ऐसी ही मुश्किलों का सामना पार्श्वनाथ के घर खरीदार भी लंबे समय से कर रहे हैं. अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम अंतरिम निर्देश जारी किए हैं. कोर्ट ने उन खरीदारों को बड़ी राहत दी है, जिन्हें फ्लैट का कब्जा मिल चुका है, लेकिन अभी तक मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं मिले हैं.

दरअसल, पार्श्वनाथ डेवलपर्स का विवाद किसी एक प्रोजेक्ट से शुरू नहीं हुआ, बल्कि कंपनी की कई हाउसिंग परियोजनाओं में देरी और फ्लैट का कब्जा नहीं मिलने की वजह से धीरेधीरे बढ़ा. कंपनी ने दिल्लीNCR समेत कई शहरों में रिहायशी प्रोजेक्ट लॉन्च किए थे. लोगों ने घर खरीदने के लिए लाखों और करोड़ों रुपये जमा किए, लेकिन कई खरीदारों को तय समय पर फ्लैट नहीं मिले. कुछ मामलों में निर्माण अधूरा रह गया, तो कुछ खरीदारों को कब्जा मिलने के बाद भी जरूरी डॉक्यूमेंट्स का इंतजार करना पड़ा.

डॉक्यूमेंट जारी करने की अनुमति

अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी हो चुकी परियोजनाओं के उन खरीदारों के पक्ष में कन्वेयंस डीड यानी मालिकाना हक हस्तांतरण के डॉक्यूमेंट जारी करने की अनुमति दी है, जिन्हें फ्लैट का कब्जा मिल चुका है. हालांकि, इसके लिए खरीदारों के आवंटन का वैरिफिकेशन जरूरी होगा. कोर्ट ने साफ किया है कि इस अनुमति का इस्तेमाल किसी तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने के लिए नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने 13 जुलाई को खातों को फ्रीज करने के अपने पुराने आदेश में भी राहत दी है.

500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया

अब बिजली के बिल और कर्मचारियों के बकाये का भुगतान किया जा सकेगा. इसके लिए वित्तीय संस्थान रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को पर्याप्त रकम उपलब्ध कराएंगे, ताकि जरूरी कामकाज जारी रह सके. पार्श्वनाथ ने रिफंड और सौदे को पूरा करने के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया है. हालांकि, घर खरीदारों का कहना है कि उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कम से कम 2,000 करोड़ रुपये की जरूरत है. दूसरी तरफ, 5,179 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों वाले छह संस्थागत लेनदार दिवालिया प्रक्रिया जारी रखने के पक्ष में हैं.

कुछ प्रोजेक्ट 70 से 90% तक पूरे हुए

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि पार्श्वनाथ की अलगअलग परियोजनाओं की स्थिति एक जैसी नहीं है. कुछ प्रोजेक्ट 70 से 90 फीसदी तक पूरे हो चुके हैं, कुछ में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और कुछ अधूरी या सिर्फ कागजों पर हैं. कोर्ट इस बात पर भी विचार कर रहा है कि घर खरीदारों को राहत देने के लिए दिवालिया प्रक्रिया से बाहर की कंपनियों की संपत्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं. वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने भी घर खरीदारों को अपनी बात रखने का स्वतंत्र अधिकार देने वाली व्यवस्था का सुझाव दिया है.

प्रोजेक्ट समय पर पूरी नहीं हो पाईं

इस मामले की शुरुआत तब शुरू हुई जब पार्श्वनाथ डेवलपर्स की कई हाउसिंग परियोजनाओं में घर खरीदने वाले लोग लंबे समय से अपने फ्लैट और मालिकाना हक के लिए इंतजार कर रहे हैं. कंपनी की कई प्रोजेक्ट समय पर पूरी नहीं हो पाईं, जबकि बड़ी संख्या में खरीदार अपनी रकम जमा कर चुके हैं. इस वजह से घर खरीदारों और कंपनी के बीच विवाद बढ़ा और मामला दिवालिया प्रक्रिया यानी CIRP तक पहुंच गया.

जुलाई में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

2021 में खरीदारों ने हरियाणा RERA का दरवाजा खटखटाया. प्राधिकरण ने बिल्डर को देरी के लिए 9.3 फीसदी सालाना ब्याज देने का निर्देश दिया. इसके बावजूद खरीदारों को राहत मिलने में परेशानी हुई. जुलाई 2026 में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने बिल्डर और सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए.