सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक नई दिल्ली के जंतर मंतर पर कई दिनों से भूख हड़ताल पर हैं. दिल्ली पुलिस ने उन्हें जंतरमंतर से हटाकर नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है. वे देश की युवा पीढ़ी की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं आदि में आए दिन आने वाली समस्याओं को हल करने की मांग का समर्थन कर रहे हैं. सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. बस एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह सोनम के स्वास्थ्य जांच की निगरानी की व्यवस्था करे. उनकी सेहत को देखते हुए जो भी जरूर कदम हो उठाए.

आइए, इस संदर्भ में समझते हैं कि भूख हड़ताल की कानूनी स्थिति क्या है? इलाज कराना सरकार की मजबूरी है या यह जरूरत है? क्या सरकार के पास गिरफ्तारी का भी अधिकार है?
क्या भूख हड़ताल करना गैरकानूनी है?
हर भूख हड़ताल अपनेआप में गैरकानूनी नहीं होती. शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का हिस्सा है. संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को बोलने, विचार रखने और शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है. लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है. सरकार सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा, यातायात, स्वास्थ्य और दूसरों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ प्रतिबंध लगा सकती है.
डॉक्टरों का दावा है कि हड़ताल के बाद सोनम वांगचुक के ऑर्गन फेल्योर का खतरा बढ़ गया है.
यदि भूख हड़ताल शांतिपूर्ण है, किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रही है और कानूनव्यवस्था नहीं बिगाड़ रही है, तो केवल विरोध करने के कारण उसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए. परंतु यदि प्रदर्शन से सड़क जाम हो, हिंसा हो, सरकारी कामकाज बाधित हो या भीड़ भड़कने का खतरा बने, तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है.
क्या भूख हड़ताल आत्महत्या की कोशिश मानी जाएगी?
यह विषय पहले बहुत विवादित रहा है. पुराने भारतीय दंड संहिता में आत्महत्या के प्रयास को अपराध बनाने का प्रावधान था. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। अब भारतीय न्याय संहिता लागू हो चुकी है और कानून का दृष्टिकोण काफी बदला है. आज मानसिक तनाव, गंभीर परिस्थितियों या स्वास्थ्य संकट में आत्महत्या के प्रयास को केवल अपराध की नजर से नहीं देखा जाता. मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम भी यह मानता है कि गंभीर तनाव में व्यक्ति को सहायता और उपचार की जरूरत हो सकती है.
फिर भी भूख हड़ताल और आत्महत्या के प्रयास को एक जैसा नहीं माना जा सकता. भूख हड़ताल अक्सर राजनीतिक या सामाजिक विरोध का माध्यम होती है. इसमें व्यक्ति सरकार या समाज का ध्यान अपनी मांगों की ओर खींचना चाहता है. इसलिए हर भूख हड़ताल को आत्महत्या की कोशिश कहना उचित नहीं होगा. हालांकि, यदि किसी मामले में व्यक्ति साफ तौर पर जान देने की मंशा जताता है, इलाज से पूरी तरह इनकार करता है और जीवन को तत्काल खतरा है, तब प्रशासन और डॉक्टर अलग तरह से हस्तक्षेप कर सकते हैं.
भूख हड़ताल का शरीर पर ऐसे असर होता है
सरकार या पुलिस के पास गिरफ्तारी का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार मनमाना नहीं है. गिरफ्तारी के लिए कानून में उचित आधार होना चाहिए. केवल सरकार की आलोचना करने या मांग रखने के कारण किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. पुलिस निम्नवत स्थितियों में कार्रवाई कर सकती है.
- सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो.
- प्रदर्शन से हिंसा फैलने का खतरा हो.
- किसी निषेधाज्ञा या वैध प्रशासनिक आदेश का उल्लंघन हो.
- सड़क, अस्पताल, रेलवे, सरकारी कार्यालय या अन्य जरूरी सेवाएं बाधित हो रही हों.
- भीड़ नियंत्रण से बाहर हो रही हो.
- व्यक्ति के जीवन को तत्काल गंभीर खतरा हो.
क्या सरकार जबरन इलाज करा सकती है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है. इसमें व्यक्ति की गरिमा और अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भी शामिल माना जाता है. सामान्य तौर पर कोई सक्षम वयस्क व्यक्ति इलाज स्वीकार करने या मना करने का निर्णय ले सकता है. डॉक्टर बिना सहमति के इलाज नहीं कर सकते, लेकिन यह सिद्धांत हर परिस्थिति में एक जैसा लागू नहीं होता. यदि व्यक्ति बेहोश है, निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है या मानसिक रूप से तत्काल निर्णय लेने में सक्षम नहीं है, तब डॉक्टर जीवन बचाने के लिए जरूरी उपचार कर सकते हैं. आपात स्थिति में चिकित्सा सहायता देना प्राथमिक कर्तव्य माना जाता है. भूख हड़ताल के मामले में भी डॉक्टर पहले व्यक्ति को समझाने की कोशिश करते हैं. स्वास्थ्य की नियमित जांच की जाती है. पानी, नमक, ग्लूकोज, दवा और अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी जाती है. जब हालत बहुत बिगड़ जाती है, तब प्रशासन अदालत से दिशानिर्देश लेने का रास्ता भी अपना सकता है.
सोनम वांगचुक
जबरन भोजन देना कितना सही है?
जबरन खाना खिलाना या नली के जरिए पोषण देना अत्यंत गंभीर कदम है. इसमें व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता, गरिमा और सहमति का प्रश्न जुड़ा होता है. इसलिए यह फैसला केवल राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं होना चाहिए. डॉक्टरों को चिकित्सा नैतिकता का पालन करना चाहिए. पहले यह देखना जरूरी है कि व्यक्ति निर्णय लेने में सक्षम है या नहीं. उसकी इच्छा क्या है? उसकी हालत कितनी गंभीर है? क्या कम दखल वाले उपाय उपलब्ध हैं? जबरन उपचार अंतिम विकल्प होना चाहिए. इसका उद्देश्य केवल जान बचाना होना चाहिए, न कि विरोध खत्म कराना. किसी व्यक्ति को दंडित करने, अपमानित करने या उसकी राजनीतिक आवाज दबाने के लिए चिकित्सा का उपयोग नहीं किया जा सकता.
अदालतों का नजरिया क्या रहा है?
भारतीय अदालतों ने कई मामलों में कहा है कि जीवन की रक्षा राज्य का महत्वपूर्ण दायित्व है. राज्य केवल कानूनव्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकता. गंभीर स्वास्थ्य संकट में उसे व्यक्ति की सुरक्षा के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं. साथ ही अदालतों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी बहुत महत्व दिया है. राज्य किसी नागरिक के शरीर और विचारों पर बिना उचित कारण नियंत्रण नहीं कर सकता, इसलिए भूख हड़ताल के मामले में संतुलन जरूरी है. अदालत आमतौर पर यह देख सकती है कि प्रशासन की कार्रवाई जरूरी थी या नहीं. क्या व्यक्ति की जान को वास्तविक खतरा था? क्या कम कठोर उपाय उपलब्ध थे? क्या पुलिस ने सही प्रक्रिया अपनाई? क्या इलाज चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर किया गया?
सरकार की जिम्मेदारी क्या है?
सरकार की पहली जिम्मेदारी संवाद करना है. भूख हड़ताल को केवल कानूनव्यवस्था की समस्या मानना सही तरीका नहीं है. प्रदर्शनकारी की मांग सुनना, वार्ता करना और तथ्य सार्वजनिक करना अधिक लोकतांत्रिक उपाय हैं. सरकार को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए. एंबुलेंस, डॉक्टर, प्राथमिक जांच और अस्पताल की व्यवस्था होनी चाहिए. परिवार को स्थिति की जानकारी मिलनी चाहिए. किसी भी कार्रवाई का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए. सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इलाज की आड़ में विरोध को खत्म करने की कोशिश न हो. प्रदर्शन का अधिकार और जीवन का अधिकार, दोनों की रक्षा जरूरी है.
#WATCH | Delhi: The police took activist Sonam Wangchuk, who had been on a hunger strike at Jantar Mantar for the past 20 days, to the hospital
DCP New Delhi tweeted, “As per orders of Honble High Court and on expert medical advise due to the deteriorating health condition of pic.twitter.com/o8HxPSzu0f
— ANI July 18, 2026
भूख हड़ताल करने वाले के अधिकार
भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति के भी कई अधिकार हैं. शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार. अपनी मांग रखने का अधिकार. सम्मानजनक व्यवहार का अधिकार. स्वास्थ्य जांच और चिकित्सा सलाह पाने का अधिकार. गिरफ्तारी की स्थिति में कानूनी जानकारी पाने का अधिकार. परिवार और वकील को सूचना देने का अधिकार. अनावश्यक बल और अपमानजनक व्यवहार से सुरक्षा का अधिकार.
संक्षेप में कहें तो भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी बन सकती है. सरकार के पास कानूनव्यवस्था और जीवन की रक्षा के लिए सीमित अधिकार हैं. वह गंभीर खतरे की स्थिति में व्यक्ति को अस्पताल पहुंचा सकती है और आवश्यक कानूनी कदम उठा सकती है, लेकिन सरकार का अधिकार असीमित नहीं है. केवल विरोध करने के कारण गिरफ्तारी उचित नहीं है. जबरन इलाज भी सामान्य नियम नहीं हो सकता. हर मामले में व्यक्ति की गरिमा, सहमति, स्वास्थ्य की गंभीरता और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखना सरकार की जिम्मेदारी है. सबसे बेहतर रास्ता संवाद, संवेदनशीलता और कानून का संतुलित प्रयोग है. लोकतंत्र में विरोध की आवाज सुनी जानी चाहिए और किसी की जान भी खतरे में नहीं पड़नी चाहिए.



