पिछले कुछ दिनों में उतारचढ़ाव के बाद सोने और चांदी की कीमतों में एक बार फिर मजबूती देखने को मिली है. एक सप्ताह के भीतर दोनों कीमती धातुओं में अच्छी रिकवरी हुई है, जिससे निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अब मुनाफावसूली करनी चाहिए या लंबी अवधि के लिए निवेश बनाए रखना बेहतर होगा. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा तेजी के बावजूद जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय अपने निवेश लक्ष्य और पोर्टफोलियो का आकलन करना जरूरी है.

किन वजहों से बढ़ीं सोनाचांदी की कीमतें?
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भूराजनीतिक तनाव, डॉलर की चाल और केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों को लेकर उम्मीदों का सीधा असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ता है. हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बने सकारात्मक माहौल और सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग ने दोनों धातुओं को सहारा दिया है. यही वजह है कि हालिया गिरावट के बाद कीमतों में फिर तेजी देखने को मिली.
क्या अभी खरीदारी का सही समय है?
बाजार जानकारों का कहना है कि जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि का है, उन्हें केवल एक सप्ताह की तेजी या गिरावट देखकर अपनी रणनीति नहीं बदलनी चाहिए. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। यदि आपके पोर्टफोलियो में सोना या चांदी का हिस्सा तय सीमा से कम हो गया है, तो चरणबद्ध तरीके से निवेश बढ़ाया जा सकता है. वहीं, जिन्होंने हाल ही में ऊंचे स्तर पर खरीदारी की है, उन्हें घबराकर निवेश बेचने की जरूरत नहीं है.
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय समयसमय पर छोटीछोटी किस्तों में निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है. इससे कीमतों में उतारचढ़ाव का जोखिम कम होता है.
सोना या चांदी, किसे दें प्राथमिकता?
सोना लंबे समय से सुरक्षित निवेश का सबसे भरोसेमंद विकल्प माना जाता है, जबकि चांदी में औद्योगिक मांग भी जुड़ी होती है. इसलिए चांदी की कीमतों में उतारचढ़ाव सोने की तुलना में अधिक देखने को मिलता है. जिन निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता अधिक है, वे पोर्टफोलियो में सीमित हिस्से के रूप में चांदी को शामिल कर सकते हैं. वहीं स्थिरता चाहने वाले निवेशकों के लिए सोना बेहतर विकल्प माना जाता है.
विशेषज्ञों की क्या है सलाह?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा बाजार में घबराकर खरीदने या बेचने से बचना चाहिए. सोना और चांदी दोनों ही लंबी अवधि में पोर्टफोलियो को संतुलित रखने और जोखिम कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं. निवेशकों को अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम क्षमता और परिसंपत्ति आवंटन के अनुसार फैसला लेना चाहिए. यदि पोर्टफोलियो में कीमती धातुओं का हिस्सा तय सीमा से अधिक हो गया है तो आंशिक मुनाफावसूली की जा सकती है, जबकि कम हिस्सेदारी होने पर धीरेधीरे निवेश बढ़ाना समझदारी होगी. इस तरह संतुलित रणनीति अपनाकर निवेशक बाजार की अस्थिरता के बीच भी बेहतर रिटर्न की संभावना बनाए रख सकते हैं.



