
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल को अगर उपचुनावों के आईने से देखा जाए तो तस्वीर पहली नजर में विरोधाभासी दिखाई देती है. इस दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कई लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव गंवाए, कई सीटें विपक्ष से छीनीं और कई जगह अपनी पुरानी सीट भी नहीं बचा पाई. लेकिन इन हारों में से हर हार किसी बड़ी राष्ट्रीय सत्ता-विरोधी लहर में नहीं बदली.
सबसे बड़ा उदाहरण 2018 है, जब BJP ने गोरखपुर, फूलपुर और कैराना जैसी महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों के उपचुनाव गंवाए, लेकिन अगले ही साल 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटों के साथ सत्ता में और मजबूत होकर लौटी. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि BJP कितने उपचुनाव हारी, बल्कि यह है कि उन हारों का असर उसके राष्ट्रीय वोट बैंक पर कितना पड़ा?
2014 के बाद ही BJP को झटके मिलने शुरू हो गए थे?
साल 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP ने लोकसभा चुनाव में 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था. लेकिन इसके बाद हुए विधानसभा उपचुनावों ने यह संकेत दिया कि लोकसभा की मोदी लहर को हर विधानसभा सीट पर उसी तीव्रता से दोहराना आसान नहीं है. उत्तर प्रदेश में 2014 के विधानसभा उपचुनाव इसका बड़ा उदाहरण रहे, जहां BJP को लोकसभा चुनाव की तुलना में कमजोर परिणाम मिला और समाजवादी पार्टी ने कई सीटों पर वापसी की. इसका मतलब यह नहीं था कि BJP का राष्ट्रीय समर्थन खत्म हो रहा था; बल्कि यह संकेत था कि उपचुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, राज्य सरकार के प्रति नाराजगी और स्थानीय संगठन राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग तरीके से काम करते हैं.
2015 से 2017 तक क्या BJP उपचुनावों में लगातार मजबूत हुई?
2015 से 2017 के बीच BJP के उपचुनावी परिणाम मिश्रित रहे. कुछ सीटों पर पार्टी को हार मिली, तो कुछ जगह उसने विपक्षी दलों से सीटें छीनीं. इस दौर में यह साफ होने लगा था कि उपचुनाव को केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का referendum मानना सही नहीं होगा. जिस सीट पर विधायक या सांसद की मृत्यु, इस्तीफे या पार्टी बदलने के कारण चुनाव होता है, वहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और स्थानीय समीकरण बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं. यही वजह है कि BJP कभी अपनी मजबूत मानी जाने वाली सीट हार गई और कभी विपक्ष की सीट पर कब्जा करने में सफल रही.
2018 को BJP के लिए उपचुनावी झटका क्यों माना गया?
2018 मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण उपचुनावी साल साबित हुआ. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर BJP की हार ने राजनीतिक हलकों को चौंका दिया. गोरखपुर को तो लंबे समय तक BJP का मजबूत गढ़ माना जाता था और यहां से योगी आदित्यनाथ कई बार सांसद रह चुके थे. फूलपुर भी BJP के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिनी जाती थी. इसके बाद कैराना लोकसभा सीट पर भी BJP हार गई. मई 2018 में हुए लोकसभा उपचुनावों के एक बड़े चरण में BJP केवल पालघर सीट बचा पाई, जबकि कैराना और भंडारा-गोंदिया जैसी सीटों पर उसे नुकसान हुआ.
अगर सिर्फ उपचुनावों को देखा जाता तो 2018 में ऐसा लग सकता था कि BJP के खिलाफ बड़ी राजनीतिक लहर तैयार हो रही है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया. 2019 में BJP ने 303 लोकसभा सीटें जीतीं और 2018 की उपचुनावी हारों का असर राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई नहीं दिया. यही वह बिंदु है जहां BJP के उपचुनावी प्रदर्शन और उसके कोर वोटर के बीच अंतर समझना जरूरी है. गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की हारें स्थानीय विपक्षी एकजुटता, उम्मीदवार और सीट के समीकरणों से प्रभावित थीं; वे अपने आप में BJP के राष्ट्रीय हिंदुत्व समर्थक आधार के टूटने का प्रमाण नहीं बनीं.
इसका जवाब काफी हद तक ‘हां’ में है. उपचुनाव में विपक्ष को एक सीट पर अपना पूरा संसाधन लगाने का मौका मिलता है. सत्ता विरोधी वोट एक उम्मीदवार के पीछे तेजी से इकट्ठा हो सकते हैं. कई बार BJP के खिलाफ अलग-अलग दल आम चुनाव में अलग-अलग लड़ते हैं, लेकिन उपचुनाव में एक साझा उम्मीदवार के पीछे खड़े हो जाते हैं. गोरखपुर और फूलपुर इसका उदाहरण बने. इसलिए उपचुनाव की हार को सीधे-सीधे BJP के वोट बैंक के टूटने के बराबर रखना राजनीतिक डेटा को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा.
2019-2021 के बीच BJP ने क्या खोया और क्या पाया?
2019 के बाद भी BJP को उपचुनावों में कई हार मिलीं, लेकिन इस अवधि में पार्टी ने विपक्षी दलों की सीटों पर जीत भी दर्ज की. 2020 में कोरोना महामारी के कारण कई उपचुनाव टलने के बाद चुनाव आयोग ने एक साथ बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों के लिए चुनाव कराए. 2021 में भी लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के कई चरण हुए. इन चुनावों में BJP का प्रदर्शन राज्यवार अलग रहा. कहीं पार्टी ने अपनी सीट बचाई, कहीं विपक्ष से सीट छीनी और कहीं सत्ता विरोधी माहौल में हार गई. इसलिए पूरे देश के लिए एक ही राजनीतिक निष्कर्ष निकालना मुश्किल है.
क्या 2022 विपक्ष की सीटें छीनने वालए साल रहा?
2022 में आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव खास तौर पर महत्वपूर्ण रहे. उत्तर प्रदेश में BJP ने दोनों सीटें जीतकर यह दिखाया कि उपचुनाव केवल उसके लिए नुकसान का माध्यम नहीं हैं. जिन सीटों को विपक्ष का मजबूत आधार माना जाता था, वहां BJP ने सेंध लगाई. इस तरह 2018 के बाद BJP की कहानी केवल लगातार हार की नहीं रही. पार्टी ने कई मौकों पर विपक्षी खेमे की कमजोरियों का फायदा उठाकर सीटें अपने पक्ष में कीं. यही कारण है कि 12 साल के उपचुनावी रिकॉर्ड को केवल “BJP कितनी बार हारी” के आंकड़े से समझना अधूरा होगा.
2023 तक क्या BJP का कोर वोट प्रभावित नहीं हुआ?
2023 तक उपलब्ध चुनावी पैटर्न यह दिखाता है कि BJP की कुछ उपचुनावी हारें उसके व्यापक राष्ट्रीय समर्थन में तत्काल गिरावट का संकेत नहीं बनीं. इसका एक कारण BJP का मजबूत संगठन और दूसरा कारण उसका व्यापक हिंदुत्व आधारित राजनीतिक नैरेटिव रहा. लेकिन यहां “कोर वोटर नहीं हिला” को पूर्ण सत्य की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए. उपचुनावों से यह साबित नहीं किया जा सकता कि हर BJP समर्थक हमेशा पार्टी के साथ रहा. इतना जरूर कहा जा सकता है कि कई उपचुनावी हारें राष्ट्रीय स्तर पर BJP के स्थायी वोट ट्रांसफर में तब्दील नहीं हुईं.
2024 में उपचुनाव और लोकसभा नतीजे एक दिशा में दिखे?
2024 इस पूरी कहानी में महत्वपूर्ण मोड़ है. लोकसभा चुनाव में BJP 2019 की 303 सीटों से घटकर 240 सीटों पर आ गई और उसे पूर्ण बहुमत के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। इसके तुरंत बाद सात राज्यों की 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए. चुनाव आयोग के मुताबिक इन 13 सीटों में बिहार की रुपौली, पश्चिम बंगाल की चार, तमिलनाडु की विक्रवांडी, मध्य प्रदेश की अमरवाड़ा, उत्तराखंड की बद्रीनाथ और मंगलौर, पंजाब की जालंधर पश्चिम तथा हिमाचल प्रदेश की तीन सीटें शामिल थीं.
जुलाई 2024 उपचुनाव BJP के लिए warning signal थे?
ऐसा कहा जा सकता है. 2024 के इन उपचुनावों में BJP को कई सीटों पर विपक्ष से चुनौती मिली और कुछ जगह उसे अपनी पुरानी स्थिति बचाने में मुश्किल हुई. यह 2018 से इसलिए अलग था क्योंकि इस बार इससे पहले ही लोकसभा चुनाव में BJP की सीटों में बड़ी गिरावट हो चुकी थी. यानी 2018 में उपचुनावी हार के बाद 2019 में BJP का प्रदर्शन बहुत मजबूत हुआ था, जबकि 2024 में लोकसभा में सीटों की कमी के बाद उपचुनावों में भी कई जगह कमजोर प्रदर्शन दिखाई दिया. इसलिए 2024 को BJP के लिए ज्यादा गंभीर राजनीतिक warning माना जा सकता है.
2025 के उपचुनावों ने क्या कोई राष्ट्रीय पैटर्न बनाया?
2025 में भी उपचुनावी राजनीति राज्य और सीट के हिसाब से अलग-अलग रही. यही उपचुनावों की सबसे बड़ी सीमा है. किसी एक सीट पर BJP की हार को पूरे देश के BJP वोटर के व्यवहार से जोड़ना जोखिम भरा है. BJP के खिलाफ विपक्षी दलों का tactical vote transfer किसी सीट पर जीत दिला सकता है, जबकि दूसरी सीट पर वही विपक्षी एकजुटता नहीं बन पाती. इसलिए 2025 के नतीजों को भी अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक संदर्भ के साथ पढ़ना जरूरी है.
2026 में BJP के लिए उपचुनावों की तस्वीर कैसी?
2026 में मई में आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए. चुनाव आयोग के नतीजों के मुताबिक BJP ने उमरेठ, राहुरी, कोरिडांग और धर्मनगर में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस ने बागलकोट और दावणगेरे साउथ तथा NCP ने बारामती जीती. ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। यानी आठ सीटों में BJP चार जीतने में सफल रही. राहुरी में BJP उम्मीदवार अक्षय शिवाजीराव कर्डिले ने 1,40,093 वोट लेकर 1,12,587 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. धर्मनगर में भी BJP उम्मीदवार ने CPI(M) प्रत्याशी को 18,290 वोट के अंतर से हराया.
लगता तो वही है. 2026 का पहला बड़ा चरण BJP के लिए मजबूत रहा, लेकिन इसे राष्ट्रीय लहर का प्रमाण नहीं माना जा सकता. चार सीटें जीतना पार्टी के संगठन और कई राज्यों में उसके मजबूत आधार को दिखाता है, वहीं बागलकोट और दावणगेरे साउथ में कांग्रेस की जीत यह भी बताती है कि BJP हर जगह अजेय नहीं है. चुनाव आयोग के आंकड़ों में बागलकोट में कांग्रेस को 55.41 प्रतिशत और BJP को 42.90 प्रतिशत वोट मिले. इसलिए 2026 के उपचुनाव भी वही पुराना संदेश देते हैं- BJP मजबूत है, लेकिन हर सीट पर उसकी जीत सुनिश्चित नहीं है.
क्या हिंदुत्व BJP के कोर वोटर को हमेशा बांधे रखेगा?
सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि BJP की उपचुनावी हार और उसके कोर वोटर के टूटने के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता. 2018 में कई महत्वपूर्ण लोकसभा उपचुनाव हारने के बाद 2019 में BJP 303 सीटों तक पहुंची. यह बताता है कि स्थानीय उपचुनावी हार को राष्ट्रीय राजनीतिक समर्थन के टूटने के रूप में पढ़ना गलत हो सकता है. BJP के लिए हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, संगठन और welfare politics का संयुक्त प्रभाव कई चुनावों में उसके कोर समर्थन को बनाए रखने में मदद करता रहा है. लेकिन 2024 के बाद की स्थिति यह भी बताती है कि इस आधार को स्थायी और अटूट मान लेना उतना ही गलत होगा.
ऐसा भी राय बना लेना सही नहीं रहेगा. हिंदुत्व BJP की राजनीतिक पहचान और उसके समर्थक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन वोटर का फैसला केवल एक मुद्दे से नहीं होता. महंगाई, रोजगार, स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, सरकारी योजनाओं का लाभ, कानून-व्यवस्था और राज्य सरकार के प्रति नाराजगी भी मतदान को प्रभावित करते हैं. उपचुनावों में इन स्थानीय मुद्दों का वजन और बढ़ जाता है. हिंदुत्व BJP के कोर वोट को एक मजबूत ideological बेस देता है, लेकिन वह हर चुनाव में automatic vote guarantee नहीं है.
BJP के लिए खतरा उपचुनाव की हार या कुछ और?
BJP के लिए असली खतरा तब पैदा होता है जब तीन चीजें एक साथ दिखाई दें- पहली, उपचुनावों में लगातार सीटों का नुकसान; दूसरी, लोकसभा या विधानसभा के आम चुनाव में वोट शेयर और सीटों में गिरावट; और तीसरी, पुराने BJP वोटर का विपक्षी दलों के बीच tactical transfer. अकेली उपचुनावी हार को alarm bell मानना जल्दबाजी होगी. लेकिन अगर किसी क्षेत्र में BJP लगातार उपचुनाव हार रही हो, उसका vote share गिर रहा हो और विपक्ष का संयुक्त वोट उसे पछाड़ने लगे, तो वह भविष्य के आम चुनाव के लिए ज्यादा गंभीर संकेत बन जाता है.
अभी तक के के पैटर्न के अनुसार कई बार BJP को उपचुनावों ने हराया, लेकिन हर बार उसकी राष्ट्रीय राजनीतिक जमीन नहीं हिली. 2018 इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. दूसरी तरफ 2024 के बाद का दौर यह संकेत देता है कि उपचुनावी प्रदर्शन को अब पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता. BJP के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या स्थानीय स्तर की ये हारें धीरे-धीरे उसके राष्ट्रीय vote-share, युवा मतदाताओं, शहरी middle class और उसके परंपरागत हिंदुत्व समर्थक आधार में स्थायी बदलाव में बदलती हैं.
मोदी युग के उपचुनावों की कहानी BJP की हार और जीत से ज्यादा उसकी electoral resilience की कहानी है. पार्टी ने गोरखपुर, फूलपुर और कैराना जैसी सीटें गंवाईं, लेकिन 2019 में 303 लोकसभा सीटें जीत लीं. उसने कई विधानसभा उपचुनाव गंवाए, लेकिन कई राज्यों में विपक्ष की सीटें भी छीनीं. 2024 में लोकसभा सीटों में गिरावट के बाद उपचुनावों ने नए warning signals दिए और 2026 में फिर मिश्रित तस्वीर सामने आई.
साल 2014, 2019 और 2024 लोकसभा चुनाव सर्वे संकेतों के मुताबिक BJP का हिंदू समर्थन 2014 में करीब 55-60%, 2019 में 60% के आसपास और 2024 में लगभग 55% के आसपास रहा. इसलिए यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि उपचुनाव BJP के लिए खतरे की घंटी बजा सकते हैं, लेकिन घंटी बजना और सत्ता बदलना एक ही बात नहीं है. BJP के कोर वोटर की वास्तविक परीक्षा हमेशा बड़े आम चुनाव में होगी- जहां स्थानीय मुद्दों के साथ मोदी, हिंदुत्व, सरकार का प्रदर्शन और विपक्ष की एकजुटता एक साथ मतदाता के सामने आती है.



