भारत कच्चे तेल, लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस और लिक्विफाइड नेचुरल गैस का इतना बड़ा स्ट्रैटेजिक रिजर्व बनाने की योजना बना रहा है जो देश की एक महीने की घरेलू मांग को पूरा कर सके. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि फारस की खाड़ी में वॉर के कारण हुए सप्लाई शॉक जैसी स्थिति दोबारा न बने. इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, तेल मंत्रालय ने संभावित जगहों, ऑपरेटिंग मॉडल और जमीन के ऊपर व नीचे स्टोरेज के बंटवारे जैसी डिटेल्स पर स्टडी करने के लिए एक कमेटी बनाई है.

दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला यह देश ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के असर से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में से एक रहा है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट का लगभग पूरी तरह से बंद होना भी शामिल है. इस संकट ने मिडिल ईस्ट से एनर्जी इंपोर्ट पर भारी निर्भरता को तो उजागर किया ही, साथ ही उन भंडारों की सीमाओं को भी सामने ला दिया जिन्हें बफर के तौर पर काम करना चाहिए था. वैसे भारत के तेल मंत्रालय ने इस योजना को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है.

कितना है भारत के पास मौजूदा रिजर्व

नई दिल्ली के पास अभी लगभग 39 मिलियन बैरल का स्ट्रैटेजिक कच्चा तेल रिजर्व है, जो लगभग आठ दिनों के आयात को पूरा करने के लिए काफी है. यह एशिया के दूसरे बड़े ऊर्जाखपत वाले देश — चीन — के पास मौजूद भंडार का एक छोटा सा हिस्सा है, हालांकि रिफाइनर और फ्यूल रिटेलर्स के पास मौजूद स्टॉक मिलकर 70 दिनों से ज्यादा की तेल की मांग को पूरा कर सकते हैं. ईटी की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर ज़मीन के नीचे गुफाओं के ज़रिए स्ट्रैटेजिक कच्चे तेल की स्टोरेज क्षमता पहले से ही बढ़ाई जा रही है, जिससे मौजूदा रिजर्व से दोगुने से ज़्यादा भंडार हो जाएगा.

उन्होंने एक ऐसी योजना का हवाला दिया जिसके लगभग पांच वर्षों में पूरा होने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि इसका मकसद आखिरकार कम से कम 120 मिलियन बैरल का भंडार बनाना है. हालांकि, LPG और LNG का रिजर्व लगभग न के बराबर है, क्योंकि दोनों को स्टोर करने में मुश्किलें आती हैं — LPG को दबाव में लिक्विड के तौर पर स्टोर किया जाता है, जबकि LNG को बहुत कम तापमान पर रखना पड़ता है. लीक या धमाके से बचने के लिए दोनों के लिए कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल की ज़रूरत होती है.

स्टॉक बढ़ाने के निर्देश

बेंगलुरु स्थित थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के अनुसार, भारत की लॉन्गटर्म LPG स्टोरेज क्षमता सिर्फ 140,000 टन के आसपास है, जो मुख्य रूप से पूर्वी और पश्चिमी तटों पर जमीन के नीचे चट्टानी गुफाओं में है और देश की लगभग दो दिनों की खपत को पूरा करने के लिए काफी है. हालांकि रिफाइनरीज और इम्पोर्ट टर्मिनल अतिरिक्त स्टॉक रखते हैं, लेकिन स्टोरेज की जटिलता और लागत के कारण भारत लगातार इम्पोर्ट और डिस्ट्रीब्यूशन पर निर्भर रहा है. लोगों ने बताया कि तेल मंत्रालय ने पहले ही सरकारी तेल रिफाइनरीज से इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए LPG का स्टॉक बढ़ाने पर काम करने को कहा है.

गैस के मामले में स्थिति और भी मुश्किल है, क्योंकि अभी कोई स्ट्रैटेजिक रिजर्व नहीं है. पिछले साल, सरकार ने एक ड्राफ्ट पॉलिसी पेश की थी, जिसके तहत टर्मिनल ऑपरेटर्स को अपनी सामान्य ऑपरेशनल जरूरत से 10 फीसदी ज्यादा LNG स्टोरेज क्षमता बनाए रखनी होगी — जरूरत पड़ने पर सरकार इन वॉल्यूम की मांग कर सकती है. पेट्रोनेट LNG लिमिटेड जैसी LNG इंपोर्ट करने वाली कंपनियां पहले से ही नए स्टोरेज टैंक बना रही हैं.

भारत और जापान कर सकते हैं डील

ईरान संकट के चरम पर, भारत को डीजल, LPG और गैस की सप्लाई को सीमित करना पड़ा था और कमी को पूरा करने में मदद के लिए जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अन्य एशियाई खरीदारों से संपर्क करना पड़ा था, जिनके पास LPG और LNG का रिजर्व है. सुरक्षा घेरा बनाने की इसकी कोशिश — जो भविष्य के झटकों से देश को बचाने की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश है — सिंगापुर, ताइवान और पाकिस्तान जैसे क्षेत्र के अन्य देशों की तर्ज पर है, जो सभी एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए स्टोरेज बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. ‘द जापान टाइम्स’ ने रविवार को अज्ञात सूत्रों के हवाले से बताया कि जापान और भारत LNG स्टॉक पर सहयोग करने पर भी विचार कर रहे हैं. अखबार ने कहा कि जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हफ्ते नई दिल्ली में बातचीत के दौरान किसी समझौते पर पहुंच सकते हैं.