नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के साथ जुड़ने वाले तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने आज गुरुवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के नोटिस का जवाब देने के लिए 2 और हफ्ते का समय मांगा है. ये नोटिस दलबदल विरोधी कानून के तहत बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की याचिका पर भेजे गए थे. इस मांग की वजह से संसद में उनकी स्थिति को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई और लंबी खिंचने की संभावना बढ़ गई है.

बागी सांसदों की ओर से यह नई मांग गुरुवार को की गई, जो लोकसभा स्पीकर के ऑफिस की ओर से इन सांसदों को जवाब देने के लिए तय की गई आखिरी तारीख थी.

अभी जवाब तैयार नहीं हो सकाः काकोली घोष

बागी सांसदों में से एक काकोली घोष दस्तीदार का कहना है कि सांसद इस बात पर अड़े हैं कि उनके गुट बदलने से उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती, लेकिन वे अभी अपना कानूनी जवाब तैयार नहीं कर सके हैं क्योंकि उनके वकील अभी भी डॉक्यूमेंट्स एकत्र कर रहे हैं.

घोष दस्तीदार ने समाचार एजेंसी PTI से कहा, “जवाब भेजने की हमारी समयसीमा आज खत्म होने रही है. ऐसे में हमने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर 2 और हफ्ते का समय देने की गुजारिश की है.” इन 20 सांसदों की गुरुवार को दोपहर 3 बजे कोलकाता में बैठक हुई, जिसमें नोटिस और आगे की कार्रवाई पर चर्चा की गई.

दलबदलू, मौकापरस्त, एहसान फरामोश लोगः कुणाल

दूसरी ओर, टीएमसी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल होने वाले सांसदों की ओर से और वक्त मांगे जाने की गुजारिश पर ममता बनर्जी की अगुवाई वाले TMC गुट ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और इस देरी को बागियों के खिलाफ राजनीतिक हमले के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की.

ममता समर्थक TMC नेता कुणाल घोष ने कहा, “उन्हें खुद नहीं पता कि वे अब किस पार्टी में हैं. यह बताने के लिए भी उन्हें समय चाहिए. ये दलबदलू, मौकापरस्त और एहसान फरामोश लोग बड़ीबड़ी बातें करते हैं, फेसबुक पर क्रांति करते हैं और BJPविरोधी वोटों से चुनाव में जीत हासिल करते हैं, लेकिन अब BJP के हितों के लिए काम कर रहे हैं. अब क्या वे एक नोटिस का जवाब भी नहीं दे सकते?”

स्पीकर ने सितंबर में बागी सांसदों को भेजा था नोटिस

इससे पहले स्पीकर के ऑफिस ने 25 सितंबर को इन बागी सांसदों को 8 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था. इससे पहले, 3 हफ्ते की शुरुआती मोहलत खत्म होने के बाद सांसदों ने 4 हफ्ते का समय मांगा था. सदस्यता रद्द करने की यह कार्रवाई TMC नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से 18 जून को दायर याचिकाओं की वजह से शुरू हुई है.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के 27 लोकसभा सांसदों में से 20 ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पार्टी से अलग होकर अनजान सी पार्टी NCPI का दामन थाम लिया था और फिर इस गुट ने BJP के नेतृत्व वाले NDA को अपना समर्थन का ऐलान कर दिया. हालांकि बागी नेताओं ने लोकसभा में एक अलग राजनीतिक गुट के तौर पर मान्यता मांगी है, लेकिन संसदीय रिकॉर्ड में उन्हें अभी भी TMC सदस्य ही माना जा रहा है.

स्पीकर के ऑफिस की ओर से भी उन्हें औपचारिक रूप से एक अलग संसदीय पार्टी के तौर पर मान्यता नहीं दी गई है, हालांकि मॉनसून सत्र से पहले उनके बैठने की अलग व्यवस्था कर दी गई थी.

NCPI के 17 सांसदों के बीजेपी में शामिल होने का दावा

टीएमसी में जून में हुई फूट के बारे में दोनों गुटों की अलगअलग राय है. ममता गुट ने इस कदम को एक सुनियोजित दलबदल बताया है जिस पर 10वीं अनुसूची के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, वहीं बागी नेताओं का कहना है कि उन्होंने मौजूदा TMC नेतृत्व से भरोसा उठने के बाद यह फैसला लिया और उन्हें अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने का हक है.

विवाद बढ़ा तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और देश की सबसे बड़ी अदालत ने 25 अगस्त को अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया जिसमें अयोग्यता याचिकाओं पर स्पीकर से जल्द फैसला लेने की मांग की गई है. लेकिन बागी सांसदों के नोटिस का जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय की मांग ने राजनीतिक तनातनी को बढ़ा दिया है.

इस बीच पिछले महीने, बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया की ओर से दावा किया गया था कि NCPI के 20 में से 17 सांसद इस महीने दुर्गा पूजा से पहले या बाद में BJP में शामिल होने वाले हैं. लेकिन साथी बागी नेताओं ने उनके इस दावे को खारिज कर दिया, BJP ने भी इस बात से खुद को अलग कर लिया.