एक शाम बिजली चली गई तो एक छोटी बच्ची अपने दादाजी को मोमबत्ती जलाते हुए देखने लगी. थोड़ी देर बाद उसने देखा कि मोमबत्ती धीरेधीरे छोटी हो रही है. उसने पूछा, दादाजी, यह छोटी क्यों हो रही है? दादाजी बोले, क्योंकि यह हमें रोशनी दे रही है. बच्ची कुछ देर सोचती रही. फिर पूछा, तो यह थोड़ी मोम कल के लिए क्यों नहीं बचा लेती? दादाजी मुस्कुराए, लेकिन कुछ बोले नहीं. सवाल छोटा था, पर उसमें जीवन की एक ऐसी सच्चाई छिपी थी जिसे समझने में कई बार पूरी उम्र निकल जाती है. हम अपने बीते हुए दिन बचाकर नहीं रख सकते. हम हंसें, रोएं, प्यार करें या दुखी रहें, जिंदगी हर पल थोड़ीथोड़ी बीतती रहती है.

हम अक्सर ऐसे जीते हैं जैसे समय को संभालकर बाद में इस्तेमाल कर सकते हैं. सोचते हैं, काम थोड़ा कम होगा तो किसी से मिलने जाएंगे. किसी से माफी मांगनी है, लेकिन इंतज़ार करते हैं कि पहले वह बात करे. बच्चों से कहते हैं कि कल खेलेंगे. सोचते हैं, रिटायर होने के बाद जिंदगी का आनंद लेंगे. लेकिन कल अपनी नई जिम्मेदारियां लेकर आ जाता है.

चिंता में बिताया दिन भी चला जाता है?

समय की अजीब बात यह है कि हम उसका उपयोग करें या न करें, वह बीतता रहता है. चिंता में बिताया दिन भी चला जाता है और अपनों के साथ हंसते हुए बिताया दिन भी. घड़ी कभी नहीं पूछती कि हमने सचमुच जिंदगी जी भी है या नहीं. लेकिन सचमुच जीने का मतलब क्या है? क्या हर दिन कोई बड़ा काम करना जरूरी है? क्या दुनिया को हमारा नाम याद रहना चाहिए? एक मां को देखिए, जो पूरी रात अपने बीमार बच्चे के पास बैठी रहती है. या उस बुजुर्ग को, जो अकेले रहने वाले पड़ोसी की बातें धैर्य से सुनता है. इन छोटी बातों की कोई तारीफ नहीं करता.

अखबार में खबर नहीं छपती. लेकिन किसी के लिए यही पल बहुत मायने रखते हैं. एक मोमबत्ती को पूरे शहर में उजाला करने की जरूरत नहीं होती. कभीकभी किसी अंधेरे कोने का डर दूर कर देना ही काफी होता है.

हम प्यार जताने से क्यों रुक जाते हैं?

शायद इससे भी गहरा सवाल यह है कि हमारे भीतर प्यार होते हुए भी हम उसे जताने से क्यों रुक जाते हैं? किसी की याद आती है, लेकिन फोन नहीं करते. किसी को माफ करना चाहते हैं, लेकिन नाराजगी पकड़े रहते हैं. किसी को परेशानी में देखते हैं, लेकिन सोचते हैं कि कोई दूसरा मदद कर देगा. कभी हमारा अहंकार रोकता है, कभी डर. कभी लगता है कि मौका फिर मिल जाएगा. ऐसा नहीं कि हमारे भीतर प्यार या दया की कमी है. कई बार हम बस उसे जताना कल पर छोड़ देते हैं.

दो भाइयों में पिता की जमीन को लेकर झगड़ा

मान लीजिए, दो भाइयों में पिता की जमीन को लेकर झगड़ा हो गया. दोनों ने बात करना बंद कर दिया. साल बीत गए. दोनों को झगड़े की कहानी अलगअलग याद थी. दोनों चाहते थे कि माफी पहले दूसरा मांगे. एक शाम छोटे भाई ने संदेश लिखा, क्या हम मिल सकते हैं? उसने कई बार पढ़ा, लेकिन भेज नहीं पाया. सोचा, कल भेज दूंगा. अगली सुबह संदेश वहीं पड़ा था. कुछ नहीं बदला था, सिवाय इसके कि जिंदगी का एक और दिन बीत गया. शायद रिश्तों में दूरी हमेशा गुस्से से नहीं बढ़ती. कई बार इसलिए बढ़ती है क्योंकि कोई पहला कदम उठाने की हिम्मत नहीं करता.

भलाई भी बोझ नहीं बननी चाहिए

लेकिन इस विचार का एक दूसरा पहलू भी है. क्या दूसरों को रोशनी देने का मतलब अपनी पूरी जिंदगी उन्हें खुश करने में लगा देना है? बिल्कुल नहीं. जो व्यक्ति कभी आराम नहीं करता, अपनी जरूरतें नहीं बताता और हमेशा अपनी खुशी छोड़ता रहता है, एक दिन भीतर से थक सकता है. भलाई भी बोझ नहीं बननी चाहिए. दूसरों से प्यार करने का मतलब खुद को भूल जाना नहीं है. कभी अपनी देखभाल करने का अर्थ मना करना, आराम करना या ऐसी बात से दूर हो जाना भी है जो हमें भीतर से दुख पहुंचा रही हो. अपने मन को अंधेरे में रखकर हम हर किसी की जिंदगी रोशन नहीं कर सकते.

व्यस्त रहने और सचमुच जीने में फर्क

व्यस्त रहने और सचमुच जीने में भी फर्क है. हम फोन उठाते हैं, बैठकों में जाते हैं, जिम्मेदारियां निभाते हैं और अगले दिन की तैयारी करते हैं. रात को थक जाते हैं. लेकिन जब सोचते हैं कि आज ऐसा क्या हुआ जिससे मन खुश हुआ, तो कई बार कुछ याद नहीं आता. सारे काम पूरे हो गए, लेकिन उस दिन को जीना ही भूल गए. शायद हम जिंदगी को संभालने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उसे महसूस करना भूलते जा रहे हैं.

हमारी मोमबत्ती कितनी देर जलेगी?

हम नहीं जानते कि हमारी मोमबत्ती कितनी देर जलेगी. लेकिन आज जो रोशनी हमारे पास है, उसका क्या करना है, यह हम तय कर सकते हैं. शुरुआत किसी छोटी बात से हो सकती है. किसी को फोन कर लीजिए. किसी को माफ कर दीजिए. किसी का धन्यवाद कर दीजिए. या किसी ऐसे व्यक्ति के पास थोड़ी देर बैठ जाइए जिसे आपके साथ की जरूरत है.

बच्ची आखिरकार दादाजी के पास ही सो गई. मोमबत्ती जलती रही. वह बिना यह पूछे रोशनी देती रही कि कोई उसे देख भी रहा है या नहीं. जब हमारी जिंदगी का एक और दिन बीत जाएगा, तो क्या हमें याद रहेगा कि उस दिन हमने क्या जिया था, या केवल यह कि क्याक्या हम कल के लिए टालते रहे?